किसी आंदोलन के कारण सुप्रीम कोर्ट को पार्लियामेंट द्वारा पारित पॉलिसी पर रोक लगानी चाहिए?

सार: 138 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश के किसी एक प्रांत अथवा राज्य में होने वाले आंदोलन की तीव्रता को पूरे देश की जनता इच्छा के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।

मान लिया कि एनडीए सरकार द्वारा लागू किये गए कृषि कानूनों के कारण बड़ी तादाद में किसान विशेषकर पंजाब और हरियाणा जैसे देश के उत्तरी राज्यों के किसान उद्वेलित हुए हैं लेकिन इन कानूनों को वृहद परिपेक्ष्य में देखने वालों का मानना है कि पार्लियामेंट द्वारा पारित इन विधेयकों को तैयार करने और लागू करने की सरकार की इस सोच के पीछे का औचित्य एक दम स्पष्ट है।

वृहद परिपेक्ष्य में देखें तो इस बात का आर्थिक रूप से कोई औचित्य नहीं बनता कि किसान केवल गेंहू और चावल उगाते रहें और एमएसपी के लिए जिद करते रहें। वह भी तब जब कि भारतीय खाद्य निगम (फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया) के गोदामों में संग्रहित खाद्यान्नों की मात्रा आवश्यक सीमा से लाखों टन अधिशेष है।

वृहद परिपेक्ष्य में देखें तो, जैसा कि गुरचरन दास ने भी द टाइम्स ऑफ इंडिया के 2 दिसंबर के संस्करण में संपादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित अपने लेख ‘डॉन्ट किल द सेकेंड ग्रीन रिवॉल्यूशन’ में भी इंगित किया था, नए कानून, किसानों को केवल एपीएमसी मंडियों के एकाधिकार युक्त संघों में अपने उत्पाद बेचने की बाध्यता से मुक्ति दिला कर उसे कहीं भी बेचने की आजादी देते हैं। इसके अतिरिक्त ये कानून किसानों को अपने उत्पादों के भंडारण की आजादी और अनुबंध आधारित कृषि का विकल्प भी देते हैं जो कि सारा जोखिम व्यापारी के उपर हस्तांतरित करता है।

दास आगे लिखते हैं कि आंदोलन के पीछे आढ़ती (एपीएमसी मंडी में खाद्यान्नों की खरीद करने वाले एजेंट जिनकी बतौर कमीशन प्रतिवर्ष 1500 करोड़ की आय का नुकसान होगा) और पंजाब के वे प्रभावशाली किसान जो कि देश के उन 6 प्रतिशत किसानों में से हैं जिन्हें एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) का लाभ प्राप्त है, दोनों हैं।

मान लिया कि, सरकार को इस प्रक्रिया में विपक्ष सहित सभी कृषि क्षेत्र के सभी साझेदारों को शामिल करना अधिक बुद्धिमतापूर्ण कार्य होता। विमर्श जितना अधिक होता है, पार्लियामेंट या राज्य के विधानसभाओं के द्वारा पास कानूनों के प्रति स्वीकार्यता उतनी ही अधिक होती है। मान लिया कि, दिसंबर के पहले हफ्ते में आंदोलन कर रहे किसानों के प्रति सरकार की शुरुआती प्रतिक्रिया इस हद तक अशिष्ट और दमनकारी थी कि ‘दिल्ली चलो’ रैली में आंसू गैस छोडे़ गए, लाठी चार्ज किया गया और जमा देने वाली सर्दी में वाटर कैनन से पानी की बौछार तक की गई।

फिर भी, क्या सुप्रीम कोर्ट को (जैसा कि नेशनल न्यूज चैनलों और ऑनलाइन मीडिया में सुप्रीम कोर्ट के हवाले से सरकार को कहते हुए दिखाया जा रहा है) यह कहना चाहिए कि ‘हमें बताइए कि आप इन कानूनों को स्थगित करेंगे या हमें ऐसा करना पड़ेगा’। सुप्रीम कोर्ट के पास कानूनों को स्थगित करने का अधिकार है फिर भी क्या इसे आर्थिक नीतियों को बनाने के लिए जवाबदेह तत्कालीन सरकार और उन नीतियों को पारित कर कानून की शक्ल देने वाले पार्लियामेंट, दोनों की अवहेलना करनी चाहिए? नए कृषि कानूनों की पुनर्समीक्षा के लिए कृषि विशेषज्ञों की एक और कमेटी गठित करने की बात कह कर, क्या सुप्रीम कोर्ट नीति निर्माण के कार्यक्षेत्र में प्रवेश कर रहा है? क्या सुप्रीम कोर्ट यह कह रहा है कि केंद्र की सरकार ने नए कृषि कानूनों को बनाते समय कृषि विशेषज्ञों की राय नहीं ली और पार्लियामेंट के चुने गए सदस्यों ने इस कानून को पास करते हुए और इसे लागू करते हुए इस खामी की और ध्यान नहीं दिया? क्या एक नए कमेटी के गठन की बात करना ऐसा कहने के बराबर नहीं होगा कि आर्थिक नीतियों को बनाने और समाप्त करने का कार्य न तो चुन कर आई देश की सरकार करेगी और न ही पार्लियामेंट करेगी बल्कि सुप्रीम कोर्ट करेगा।

सवाल यह भी पूछा जा सकता है कि सरकार से ‘हमें बताइए कि आप इन कानूनों को स्थगित करेंगे या हमें ऐसा करना पड़ेगा’ पूछने वाले सुप्रीम कोर्ट ने उस समय हस्तक्षेप क्यों नहीं किया जब इंदिरा गांधी सरकार द्वारा 25 जून 1975 से थोपे गए 19 महीने लंबे आपात काल के दौरान लोगों के मौलिक अधिकारों को कुचला जा रहा था। वयोवृद्ध पत्रकार कूमी कपूर ने अपनी किताब ‘द एमरजेंसी’ में इस बात की व्याख्या की है कि किस प्रकार पूरे देश में हजारों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया था। अपने पत्रकार पति से संबंधित घटना विशेष को उद्धृत करते हुए उन्होंने लिखा है कि किस प्रकार उन्हें सिर्फ इसलिए जेल में डाल दिया गया क्योंकि उन्होंने यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के द्वारा एमरजेंसी विरोधी नारे लगाने वाले एक किशोर की पिटाई का विरोध किया था। घटना 1 नवंबर 1975 की है जब कॉमनवेल्थ पार्लियामेंटरी कॉन्फ्रेंस में शामिल होने आए विदेशी प्रतिनिधि मंडल के लिए लालकिले में एक नागरिक अभिनंदन समारोह का आयोजन किया गया था। 

28 अप्रैल 1976 को एक 4-1 फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एमेरजेंसी के दौरान गिरफ्तार किये गए लोगों के बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका को खारिज कर दिया था जबकि देश के 9 हाई कोर्ट्स ने इंदिरा गांधी सरकार द्वारा आरोपित मीसा (मेंटनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी) के आदेश को संविधान के अधिकारातीत पाते हुए ठुकरा दिया था। इन 9 हाई कोर्ट्स ने संविधान के आर्टिकल 21 के तहत उन अधिकारों को बरकरार रखा था जिसके अनुसार बिना कानूनी प्रक्रिया के किसी व्यक्ति को जीवन या स्वतंत्रता के अधिकार, जिसमें अदालतों में याचिका दायर करने का अधिकार भी शामिल है, से वंचित नहीं किया जा सकता है। जिसके बाद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील किया था।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान, असहमत न्यायाधीश एच आर खन्ना ने संविधान के आर्टिकल 21 की प्रधानता को बरकरार रखते हुए, तत्कालीन अटॉर्नी जनरल नितिन डे से पूछा था कि यदि किसी पुलिस अधिकारी के द्वारा व्यक्तिगत दुश्मनी के तहत किसी व्यक्ति की हत्या कर दी जाती है तो क्या ऐसी स्थिति में कोई न्यायिक उपचार बरकरार रहेगा। अटॉर्नी जनरल द्वारा दिया गया जवाब अत्यंत आश्चर्यजनक था, ‘जब तक एमेरजेंसी लागू है तब तक ऐसे मामलों में कोई न्यायिक उपचार नहीं होगा। यह आपकी अंतःचेतना के लिए झटका हो सकता है, यह मेरी अंतःचेतना के लिए झटका हो सकता है, लेकिन दृढ़ता पूर्वक मेरा निवेदन है कि ऐसे मामलों में कोर्ट में कोई सुनवाई हो सकती है।’

असहमति वाले अपने फैसले में न्यायाधीश खन्ना ने वोल्फगैंग फ्रीडमैन द्वारा रचित ग्रंथ ‘लॉ इन ए चेंजिंग सोसायटी’ को उद्धृत करते हुए कहा था किः “विशुद्ध औपचारिक अर्थों के हिसाब से आदेशों के पदानुक्रम (हायरार्की) पर आधारित मानदंडों वाली प्रणाली में तो नाज़ियों के दौर की संगठित तरीके से की गई जन हत्या (मास मर्डर) भी कानून के तौर पर मान्य हो जाएगी”। सूप्रीम कोर्ट के द्वारा एमेरजेंसी के दौरान हुई गिरफ्तारियों के संबंध में दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज करने के कदम की व्याख्या कूमी कपूर ने बतौर ‘मौलिक अधिकारों का दिल तोड़ने के कारण देश के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक के तौर पर ’ किया है।

मान लिया कि 47 दिनों से जारी किसानों का आंदोलन कोरोना वायरस वाली महामारी के चरम के दौर में आयोजित हो रही है जहां भारत संक्रमितों की संख्या (10,466,595) के मामले में दूसरे (अमेरिका के बाद) स्थान पर है और इस कारण हुई मौतों (151,160) के मामले में तीसरे (अमेरिका और ब्राजील के बाद) स्थान पर है।

मान लिया कि चूंकि जारी किसान आंदोलन के दौरान सामाजिक दूरी का ख्याल नहीं रखा जा रहा है और टीवी पर प्रसारण के दौरान दिखाया गया है कि अनेक प्रदर्शनकारी मास्क भी नहीं पहन रहे हैं इसलिए वायरस के प्रसार को लेकर काफी चिंता व्यक्त की जा रही है। मान लिया कि प्रदर्शनकारियों को शांति पूर्ण तरीके से प्रदर्शन करने का अधिकार है। लेकिन क्या उस आंदोलन को शांति पूर्ण माना जा सकता है जहां राजधानी की तरफ आने व जाने वाले नेशनल हाई वे को प्रदर्शनकारियों के द्वारा अवरुद्ध कर दिया गया हो। क्या उस आंदोलन को शांति पूर्ण माना जा सकता है जब किसी एक कंपनी विशेष को निशाना बना कर पंजाब में उसके टेलीकॉम टॉवर को बल पूर्वक तोड़ा जा रहा हो और जान बूझ कर तारों को काटा जा रहा हो?

क्या आंदोलनरत किसी एक राज्य या क्षेत्र के किसान ये फैसला ले सकते हैं कि एक कानून जो किसानों को अपने उत्पादों को एपीएमसी मंडी के बाहर बेचने का विकल्प देता हो उसे देश में कहीं भी लागू न होने दिया जाए। वैसे भी, पंजाब की कांग्रेसी सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नए कृषि कानून राज्य में लागू नहीं होंगे। कुछ अन्य राज्यों ने भी इसका अनुकरण किया है।

138 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश के किसी एक प्रांत अथवा राज्य में होने वाले आंदोलन की तीव्रता को पूरे देश की जनता इच्छा के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। देश की जनता की इच्छा समय समय पर होने वाले राष्ट्रीय चुनावों के माध्यम से तय होते हैं न कि किसी एक राज्य या क्षेत्र में होने वाले आंदोलनों के आधार पर जहां हाईवे को बल पूर्वक अवरुद्ध कर दिया जाता है और दूर संचार को जान बूझ कर बाधित किया जाता है। इसलिए, इस प्रकार के किसी भी तीव्रता वाले आंदोलनों को प्रशासनिक और न्यायिक प्रतिक्रिया देने की जरूरत नहीं है।

यदि आंदोलनों पर प्रशासनिक और न्यायिक प्रतिक्रिया व्यक्त की जाने लगेगी तो

देश में कभी कोई सुधार नहीं होगा।

- रघु कृष्णन

(डिस्क्लेमरः इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इस लेख में प्रस्तुत तथ्य और विचार www.azadi.me के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं। इस लेख का प्रकाशन मूल रूप से इकोनॉमिक टाइम्स में अंग्रेजी भाषा में किया गया था। आजादी.मी पर इस लेख का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किया गया है। अनुवाद के दौरान सभी एहतियात बरते गए हैं इसके बावजदू अनजाने में कुछ त्रुटियां संभव हैं। पाठकों के द्वारा त्रुटियों के प्रति ध्यानार्षण कराए जाने पर हम उनमें सहर्ष बदलाव करेंगे।) मूल लेख को https://bit.ly/3pkG4Yh पर पढ़ा जा सकता है।

- साभारः www.economictimes.com

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