नई सरकार इतनी चुप क्यों है

यहां नई सरकार के प्रदर्शन का आकलन नहीं किया जा रहा है। सरकार को सत्ता में आए एक माह हो गया है और इतना समय किसी सरकार के आकलन या इसके प्रदर्शन का कोई सार्थक विश्लेषण करने के लिए पर्याप्त नहीं है। हालांकि, एक माह सरकार की निर्णय प्रक्रिया और कार्यशैली में झांककर देखने के लिए काफी है। कुछ घोषणाएं और कुछ विवादों से हमें आगामी महीनों और वर्षों में सरकार के संभावित कामकाज और रुख की झलक मिलती है। 
 
सरकार की नीतियों का पहला सार्थक विश्लेषण 10 जुलाई को संभव होगा जब सरकार नया बजट पेश करेगी। सत्तान्यत: बजट इतनी महत्वपूर्ण घटना नहीं होना चाहिए पर सरकार की नीतियों का पहला खुलासा होने से इसमें हमें उसकी सोच के बहुत से सबूत मिलेंगे। यदि इसे कोई छाप छोडऩी है तो इसे कारोबर के हित में कुछ मूलभूत घोषणाएं करनी होंगी। कारोबार हितैषी घोषणाओं का यहां मतलब है कि इनसे एक अरब डॉलर वाले एफडीआई निवेशक से लेकर नई कंपनी खोलने की इच्छा रखने वाले कॉलेज के युवा तक हर उद्यमी को मदद मिलनी चाहिए। टैक्स, नियमों और सरकारी हस्तक्षेप में कमी से मदद मिल सकती है। इसी तरह छोटे शहरों में कामकाज शुरू करने को प्रोत्साहन देने से भीतरी क्षेत्रों में विकास होगा और बड़े शहरों पर दबाव में कमी आएगी। जो भी हो, देखते हैं 10 जुलाई का दिन क्या लेकर आता है। 
 
फिलहाल तो पिछले एक माह में सरकार ने जो संकेत दिए हैं उन पर बात करते हैं। पहली बात तो यह कि लोगों को जितनी अपेक्षा थी, सरकार उससे कहीं अधिक मौन नजर आती है। चुनाव प्रचार के शोरगुल, कुछ अरसे पहले की 'आप' की सरकार चलाने की मुखर तथा तमाशा खड़ा करने की शैली और पूर्व प्रधानमंत्री के मौन की भाजपा ने जैसी आलोचना की थी उसे देखते हुए लोगों को लगा था कि नई सरकार कुछ ज्यादा ही मुखर होगी पर वास्तव में वह लोगों से इतना संवाद साधती नजर आई नहीं। अब यह अच्छा है या बुरा? अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। मौन गुण भी हो सकता है जैसा इस उक्ति में कहा गया है कि 'बातें कम, काम ज्यादा'। मौन लोगों के ध्यान और जवाबदेही से बचने का तरीका भी हो सकता है, जैसा हमने पूर्ववर्ती सरकार में देखा था। मौन या मुखर होना वह कसौटी है जो हर मामले में अलग से और हफ्ते दर हफ्ते लगाकर देखनी होगी। फिलहाल तो मुझे लगता है कि भाजपा में अचानक छाए मौन से लोग थोड़े चकित हैं। वह भाजपा जिसे अभी दो माह पहले तक लगता था कि कांग्रेस कुछ भी करे तो उस पर टिप्पणी करने की जरूरत है। 
 
दूसरी बात, सरकार और बाबू लोगों के हलकों में शासन के रौब और अनुशासन का आभामंडल तैयार किया गया। सरकारी कर्मचारियों से वक्त पर आने, फाइलें निपटाकर मेज साफ रखने और आमतौर पर बेहतर काम करने के निर्देश दिए गए। क्या यह अच्छी बात है? हां, काफी हद तक तो यह ठीक ही है। भारतीय मध्यवर्ग जिन बातों के लिए नरेंद्र मोदी को पसंद करता है उनमें एक बात यह भी थी कि वे ढर्रे में काम करने वाले आलसी बाबुओं पर डंडा चलाएंगे। हालांकि, हमारे बाबुओं को लेकर जो छवि है वह वाकई सच है। हमारे बाबुओं का प्रदर्शन सामान्य से कम इसलिए नहीं है कि कोई उन पर डंडा नहीं चलाता। इसकी वजहें ये हैं : काम के लिए प्रोत्साहन देने का ढांचा विकृत है। मनमाने तबादलों की व्यवस्था तकलीफदेह है और फिर बाबुओं में भीतर ही भीतर राजनीतिक वर्ग के लिए तिरस्कार और अविश्वास की भावना है। जब तक इनमें से कुछ मुद्दे हल नहीं किए जाते सरकारी कर्मचारियों की कार्यक्षमता सुधरने से रही। डराकर मैनेजमेंट चलाना उतना ही काम आता है, जितना अब तक नजर आया है।
 
तीसरी बात, जनता से संवाद साधने में कुछ गलतियां भी नजर आई हैं। बड़ा उदाहरण रेल किराये में वृद्धि और इसकी घोषणा के तरीके का है। साफतौर पर यहां दो मुद्दे हैं- किराये में बढ़ोतरी और इसकी घोषणा। रेलवे घाटे में है और किराये में वृद्धि लंबे समय से बाकी और उचित थी। हालांकि, एकदम से 15 फीसदी की वृद्धि और मुंबई लोकल ट्रेन के पास रातोंरात 100 प्रतिशत महंगे करना और वह भी बिना किसी पूर्व सूचना के, इसे शायद ही बेहतर राजनीतिक पहल कहा जा सकता है। न तो इसके लिए कोई ज्यादा स्पष्टीकरण दिए गए और न कोई खेद जताया गया। गौरतलब है कि न तो बढ़ोतरी चरणबद्ध रूप से नहीं की गई और न रेलवे की आमदनी बढ़ाने के कोई अन्य उपाय सुझाए गए। मसलन, रेलवे के पास अरबों रुपए की जमीन है। यदि रेलवे की जमीन बेचने का कोई कार्यक्रम बनाया गया होता तो काफी नकदी पैदा की जा सकती थी। फिर रेलवे को अपने लागत ढांचे को भी तर्कसंगत बनाने की जरूरत है। इनमें से किसी पर चर्चा नहीं हुई। हमें तो सिर्फ इतना कहा गया कि 'कड़वी दवा' जरूरी है, इसे समझदारी और करुणा के साथ नहीं दिया जाएगा। इसे तो लोगों के गले में धकेला जाएगा।
 
जैसी अपेक्षा थी, फैसले का अच्छा असर नहीं हुआ। पार्टी के सांसद ही बढ़ोतरी की वापसी चाहते हैं। नई सरकार की किस्मत अच्छी है कि इसके 'नई बहू' के दर्जे को ध्यान में रखकर लोगों ने ज्यादा शोर नहीं मचाया। फिर इसे कांग्रेस जैसे असाधारण रूप से कमजोर विपक्ष और इसके शुभंकर राहुल गांधी होने का फायदा भी मिला है। यदि विपक्ष संगठित होता तो सरकार के इस कदम का पूरा फायदा उठाता। सिर्फ इसलिए कि आपको बाजार से संचालित अर्थव्यवस्था चाहिए (हम में से कई लोगों को चाहिए, मैं भी इसमें शामिल हूं), आप लोगों पर जबरन अपनी नीतियां नहीं थोप सकते। बड़ा मुद्दा तो यह है कि एक नई सरकार से जनसंपर्क के मोर्चे पर ऐसी विनाशक गलती हुई कैसे? क्या किसी ने उठकर यह कहा कि मुंबई में रातोंरात किराये में दोगुनी वृद्धि भयानक कदम होगा? क्या किसी ने यह सुझाव नहीं दिया कि हर तिमाही में 3.5 फीसदी वृद्धि एक बार में 15 फीसदी वृद्धि जितनी ही होती है? या यह नहीं कहा कि ऐसा करने की बजाय रेलवे की कुछ जमीन बेच दी जाए? यह नहीं कहा कि यदि हम चाहते हैं कि लोग अधिक किराया चुकाएं तो पहले हमें उन्हें अधिक और बेहतर सेवाएं देने का प्रस्ताव रखना चाहिए? मामला क्या है? क्या सरकार को अपने फैसले पर इतना यकीन था, वह इतनी आत्मसंतुष्ट थी कि जहां तक दीर्घावधि के लिए फैसला सही है तो संदेश किस तरह पहुंच रहा है इसकी परवाह करने की जरूरत नहीं है? या बात कुछ और ही है? जो पार्टी विभिन्न मतों को प्रोत्साहित करती थी, क्या वह अब धीरे-धीरे वही करने लगी है, जो इसके विरोधी करते थे। चुप रहो और सत्ता का लुत्फ उठाओ? अभी तो किसी को इन सवालों के जवाब मालूम नहीं हैं। यह तो वक्त ही बताएगा। एक बात बिल्कुल पक्की है। आपके सत्ता में होने से जनता की राय को अनुकूल बनाने की जरूरत खत्म नहीं हो जाती। कांग्रेस से पूछकर देखिए, क्योंकि नई बहू या नई सरकार हमेशा नई नहीं रहती। हनीमून अब खत्म हो गया है। उसके बाद बहू या सरकार को न सिर्फ अपने कामकाज बल्कि अपेक्षाओं को भी मैनेज करना होगा।
 
 
- चेतन भगत (अंग्रेजी के प्रसिद्ध युवा उपन्यासकार)
साभारः दैनिक भास्कर