आखिर इस मर्ज की दवा क्या है?

14वर्ष तक की आयु के बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए 2009 में शिक्षा का अधिकार कानून लागू किया गया। इस कानून के आने के बाद स्कूलों में छात्रों का नामांकन वैश्विक स्तर (औसतन 95%) के लक्ष्य के पास तो पहुंच गया लेकिन सीखने के परिणामों के मामले में स्तर रसातल में पहुंच गया।

गैर सरकारी संगठन प्रथम द्वारा जारी वार्षिक रिपोर्ट ‘असर’ के मुताबिक वर्ष 2008 में सरकारी स्कूलों के लगभग 85 प्रतिशत विद्यार्थी कक्षा 2 की किताब पढ़ सकते थे, जबकि 2018 में इनकी संख्या घटकर लगभग 73 प्रतिशत हो गई। 8वीं कक्षा के 56 प्रतिशत छात्र दो संख्याओं का आपस में भाग नहीं दे सकते। पांचवी कक्षा के लगभग आधे छात्र दूसरी कक्षा के पाठ पढ़ने में असक्षम हैं और 72.2 फीसदी छात्र दो संख्याओं का भाग नहीं कर सकते हैं। अन्य अध्ययनों के मुताबिक भी छठी कक्षा के 74% छात्र अपनी हिन्दी पाठ्य पुस्तक से एक पैराग्राफ नहीं पढ़ सके, 46% छात्र दूसरी कक्षा के स्तर की साधारण कहानी नहीं पढ़ सके और 8% छात्र अक्षरों को नहीं पहचान पाए।

दुनिया भर की शिक्षा व्यवस्था के मूल्यांकन के लिए वैश्विक स्तर पर आयोजित होने वाले वार्षिक प्रोग्राम फॉर इंटरनेशनल स्टूडेंट असेसमेंट (पीसा) टेस्ट 2010 में भारत कुल 73 प्रतिस्पर्धी देशों की सूची में 72वें स्थान पर रहा। पीसा परिणाम से आहत भारत ने शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के उपाय करने की बजाए इस प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लेना ही बंद कर दिया।

कहने का तात्पर्य यह कि शिक्षा की गुणवत्ता बद से बदतर हुई है लेकिन शिक्षा के मद में होने वाले खर्चों में लगातार वृद्धि हुई है। उदाहरण के लिए वर्ष 2010-11 में, 4,435 सरकारी स्कूलोँ के शिक्षकोँ के वेतन पर 486 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। इन सभी स्कूलोँ में 14,000 शिक्षक अधिक थे जबकि इन सभी 4,435 स्कूलोँ में पढ़ने वाले बच्चोँ की कुल संख्या करीब शून्य थी।

वर्ष 2015-16 में, यह खर्च घटकर 152 करोड़ रुपये हो गया। शिक्षकोँ की संख्या घटकर 6,961 हो गई, यानि की इनकी संख्या में 50% तक गिरावट आ गई, जबकि सरकारी स्कूलोँ की संख्या में 5,044 की बढ़ोत्तरी हुई।

2010 से 2015 के बीच पूरे पांच साल में, सरकार ने ऐसे स्कूलोँ पर 1,000 करोड़ रूपये से भी अधिक खर्च किया, जहाँ छात्र ही नहीँ थे। शिक्षकोँ को ऐसी कक्षाएँ अटेंड करने के लिए वेतन दिया जाता रहा जिनमेँ कोई शिष्य ही नहीं थे। राज्यों ने वर्षोँ तक खाली कक्षाओँ पर पैसे खर्च किए। ऐसे में न सिर्फ नियुक्त शिक्षकोँ की कुशलता बेकार गई, बल्कि तमाम राज्य सरकारोँ द्वारा ऐसे स्कूलोँ की हालत सुधारने के लिए कोई उपाय भी नहीं किया गया जहाँ छात्रोँ की संख्या लगातार कम हो रही थी।

2010-11 से लेकर 2015-16 के बीच, बहुत सारे राज्योँ के सरकारी स्कूलोँ में छात्रोँ के पंजीकरण में गिरावट दर्ज की गई है। आंध्र प्रदेश, जहाँ के आधे बच्चे सरकारी स्कूलोँ में एनरोल्ड थे वहाँ भी पिछ्ले पांच वर्षोँ में सरकारी स्कूलोँ में छात्रोँ की संख्या में 0.8 मिलियन की गिरावट आई है। असम और बिहार के सरकारी स्कूलोँ में जहां कि नामांकन का प्रतिशत सर्वाधिक है, वहाँ इस संख्या में बढ़ोत्तरी देखी गई। असम में जहाँ 0.05 मिलियन बच्चे बढ़े वहीँ बिहार में नामांकन में 2 मिलियन की बढ़ोत्तरी हुई। स्पष्ट है, यह संख्या आरटीई की सफलता की गारंटी नहीं हैं, क्योंकि लर्निंग आउटकम की रिपोर्ट बिहार में सरकारी शिक्षा की खराब हालत दिखाते हैं। गुजरात में भी बदलाव धीमी गति से आ रहा है, पिछले 5 सालोँ में यहाँ के सरकारी स्कूलोँ में छात्रोँ की संख्या में 0.1 मिलियन की कमी आई। छत्तीसगढ़ में कुल एनरोलमेंट में 0.5 मिलियन की कमी आई।

कई अन्य राज्योँ में भी पिछ्ले पांच वर्षोँ के दौरान छात्रोँ के एनरोलमेंट में काफी गिरावट आई। हरियाणा में 0.4 मिलियन की, हिमाचल प्रदेश में 0.16 मिलियन की, जम्मू और कश्मीर में 0.18 मिलियन की, झारखंड में 0.86 मिलियन की, केरल में 0.21 मिलियन की, मध्य प्रदेश में 2.6 मिलियन की, महाराष्ट्र में 1.4 मिलियन की, ओडिसा में 0.6 मिलियन की, पंजाब में 0.09 मिलियन की और कर्नाटक में 2010-11 से 2015-16 के बीच 0.5 मिलियन की गिरावट आई।

हालांकि, अगर कुल संख्या पर गौर किया जाए तो ऐसा लगता है अधिक आबादी वाले महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्योँ में इस तरफ अधिक ध्यान भी नहीं दिया गया। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में क्रमशः 3.08 मिलियन और 2.29 मिलियन छात्रोँ की कमी आई है। हालांकि, 2015-16 के आखिर में उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में 19 मिलियन और 13 मिलियन से भी अधिक एनरोलमेंट हुए थे, जो कि छात्रोँ की संख्या में आई कमी के मुकाबले 5 गुना अधिक है।

सरकारी स्कूलोँ में छात्रोँ की संख्या बड़ी चिंता का विषय है। साल 2010-11 में, करीब एक तिहाई स्कूलोँ में 50 से भी कम छात्र थे। अनुमान के मुताबिक, एक मिलियन से भी अधिक सरकारी स्कूलोँ की मौजूदगी में ऐसे स्कूलोँ की संख्या करीब 350,000 है। अकेले 2011 में, 50 से कम छात्र संख्या वाले स्कूलोँ के शिक्षकोँ के वेतन का खर्च 21,000 करोड़ रुपये से अधिक था। वर्ष 2015-16 के बीच ऐसे स्कूलोँ की संख्या बढ़कर कुल स्कूलों की संख्या के 40% तक पहुंच गई और खर्च लगभग दोगुना यानि 48,340 करोड़ हो गया।

लेकिन आश्चर्य की बात है कि वह मुद्दा जो हमारी आने वाली पीढ़ी और देश का भविष्य निर्धारित करता है, जिसके लिए आए दिन कुल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) के 6 प्रतिशत खर्च करने की बात की जाती है वह राजनैतिक दलों के लिए चुनावी मुद्दा तक नहीं बन पाता है। जनता भी रोजगार, सब्सिडी, मुफ्त बिजली-पानी, बेरोजगारी भत्ता आदि के नाम पर वोट तो देती है लेकिन गुणवत्तायुक्त शिक्षा का मुद्दा उनके लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं होता।

विश्लेषण करने पर इसके कुछ संभावित कारण भी समझ में आते हैं जिनमें सर्वप्रमुख है

शिक्षा का संविधान की समवर्ती सूची में होना। अर्थात् शिक्षा का विषय केंद्र व राज्य सरकार दोनों के अधिकार क्षेत्र में आता है और इस बाबत नीतियां बनाने का अधिकार दोनों के पास है। टकराव की स्थिति में केंद्र की नीतियों के लागू होने का प्रावधान है। स्पष्ट है कि असफलता का ठीकरा केंद्र द्वारा राज्यों पर व राज्यों के द्वारा केंद्र पर फोड़ने का विकल्प सदैव उपलब्ध रहता है और इस प्रकार जवाबदेही से बचा जा सकता है।'

दूसरा कारण, शिक्षा से संबंधित नीतियों का प्रभाव दीर्घावधि में दिखना। यदि शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव के लिए काम किए जाते हैं तो चुनाव के दौरान उन्हें गिना पाना चुनौतीपूर्ण होता है। इसलिए राजनैतिक दल शिक्षा की बजाए ऐसे क्षेत्र में कार्य करना पसंद करते हैं जहां परिणाम तत्काल दिखाई दे।

तीसरा सबसे महत्वपूर्ण कारण निजी स्कूलों द्वारा बेहतर विकल्प बन कर उभरना भी है। अर्थात, बच्चों के लिए गुणवत्ता युक्त मनपसंद शिक्षा दिलाने की चाह रखने वाले अभिभावकों की जरूरतें निजी स्कूलों से पूरी हो जाती हैं। और इस प्रकार उन्हें वे मुद्दे ज्यादा उद्वेलित करते हैं जिनका बेहतर विकल्प उपलब्ध नहीं होता है, जैसे कि सड़क, परिवहन, बिजली, रोजगार इत्यादि।

चौथा, देश में शिक्षक लॉबी अत्यंत मजबूत और अपने हितों को लेकर काफी सजक है। सरकारी नीतियों और योजनाओं के प्रचार प्रसार में शिक्षकों की भूमिका काफी अहम होती है। गांवों और कस्बों में तो शिक्षकों की साख इतनी मजबूत होती है कि ओपिनियन लीडर के तौर पर उनकी राय लोगों को खूब प्रभावित करती हैं। चूंकि चुनावों के दौरान शिक्षकों की तैनाती पोलिंग स्टेशनों पर होती है और उनकी नाखुशी का मतलब वोटों से हाथ धोने के रूप में देखने को मिल सकता है। इसलिए राजनैतिक दल शिक्षकों की जवाबदेही तय करने में कम रूचि दिखाते हैं।

इसे शिक्षक लॉबी की ताकत का ही प्रभाव कहा जाएगा कि पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन एवं विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर द्वारा आधार नंबर के कारण देश में 80 हजार से ज्यादा फर्जी शिक्षकों (एक ही शिक्षक द्वारा एक से अधिक स्कूलों में कार्यरत होने) की पहचान किए जाने की बात संसद में कबूली गई थी। लेकिन इसके बावजूद उन फर्जी शिक्षकों के खिलाफ कोई कार्रवाई तक नहीं की गई।

- अविनाश चंद्र, संपादक www.azadi.me

फोटोः साभार 'द क्विंट'