प्रशासनिक सुधारों की है आवश्यकता

अन्ना हजारे ने देश के लिए एक बहुत बड़ी जंग जीत ली है, लेकिन असल चुनौती अब शुरू होती है। तेरह दिनों के अनशन के बाद उन्होंने सरकार को तो अपनी अधिकतर मांगों के समक्ष झुकने को विवश कर दिया, लेकिन यदि अब वे अपनी राष्ट्रचेता की भूमिका में बरकरार रहना चाहते हैं, तो उन्हें फूंक-फूंककर कदम रखने होंगे।

लोकपाल बिल ने देश की उम्मीदें जगा दी हैं, लेकिन मुझे लगता है कि बड़े पैमाने पर प्रशासनिक सुधारों के बिना लोकपाल बेअसर ही साबित होगा। टीम अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का अगला एजेंडा यही होना चाहिए।

दो तरह के भ्रष्टाचार होते हैं: कपटपूर्ण और शोषणपूर्ण। कपटपूर्ण भ्रष्टाचार वह होता है, जब घूस लेने और देने वाले आपसी सांठगांठ से लेनदेन करते हैं और पीछे कोई सबूत नहीं छोड़ते। जैसे करदाता की बुक में गलत एंट्री पाने के बावजूद घूस की उम्मीद से उसे नजरअंदाज कर देने वाला कर अफसर।

इस तरह के भ्रष्टाचार के मामले में लोकपाल ज्यादा कुछ नहीं कर सकता। दूसरी तरफ शोषणपूर्ण भ्रष्टाचार वह है, जहां कोई अधिकारी अपनी स्थिति का दुरुपयोग करते हुए किसी नागरिक के राशन कार्ड, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, होम कंप्लीशन सर्टिफिकेट जैसे जरूरी दस्तावेज रोक लेता है और फिर घूस की मांग करता है।

इस तरह के मामलों की आम तौर पर शिकायत दर्ज कराई जाती है। भारत में भ्रष्टाचार के अनेक मामले इन शिकायतों के माध्यम से ही प्रकाश में आते हैं। यदि लोकपाल सक्रियतापूर्वक साक्ष्य जुटाए तो वह इस मामले में जरूर कुछ कर सकता है, मिसाल के तौर पर भ्रष्ट अधिकारी को रंगेहाथों पकड़ने के लिए ट्रैप करना।

अफसोस की बात यह है कि अनेक शिकायतें पूरी तरह सही नहीं होतीं और कुछ मौकों पर उनका उद्देश्य अपने प्रतिद्वंद्वी को तंग करना होता है। जब सीवीसी ने अधिकारियों के विरुद्ध शिकायतें आमंत्रित की थीं तो इतनी मात्रा में शिकायतें आई थीं कि यह पता लगाना मुश्किल हो गया था कि इनमें से किसे गंभीरता से लिया जाए और किसे नहीं।

ऐसी स्थिति में लंबी जांच के बिना मामले की तह तक पहुंचना मुमकिन नहीं था। जनलोकपाल बिल का अधिकार क्षेत्र बहुत बड़ा है और इसमें सभी श्रेणी के लोकसेवक सम्मिलित हैं। ऐसी स्थिति में लोकपाल के पास शिकायतों का अंबार लग जाएगा और उसकी कार्यक्षमता निष्प्रभावी हो जाएगी।

इस संदर्भ में अरुणा रॉय का लोकपाल संस्करण अधिक व्यावहारिक है। सिस्टम में सुधार के लिए दोषियों की धरपकड़ के साथ ही भ्रष्टाचार की संस्कृति से लड़ना भी जरूरी होगा। हर्षद मेहता घोटाले के दौरान सीवीसी ने कहीं अधिक सफलता पाई थी और उसके बाद सार्वजनिक क्षेत्र को कंप्यूटराइजेशन करने और अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाने को विवश होना पड़ा था। जब बैंक के लेनदेन ऑनलाइन दर्ज होने लगे तो हजारों करोड़ रुपयों पर प्रबंधकों का विवेकाधीन नियंत्रण स्वत: समाप्त हो गया।

इसलिए भी एक सशक्त और प्रभावी लोकपाल बनाना बहुत जरूरी है। लेकिन इसके साथ ही यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि लोकपाल के फैसले ठोस हों। सीवीसी अगर पर्याप्त प्रभावी सिद्ध नहीं हो पाता है तो इसीलिए कि वह कार्रवाई की अनुशंसा तो करता है, लेकिन कार्रवाई नहीं कर सकता।

हमें सुनिश्चित करना होगा कि कहीं लोकपाल की भी यही स्थिति न हो जाए। जनता का भरोसा जीतने और अपनी विश्वसनीयता सिद्ध करने का इससे बेहतर तरीका कोई दूसरा नहीं है कि किसी गलती को जल्दी से सुधार लिया जाए। सौभाग्य से जनलोकपाल और यहां तक कि सरकार के लोकपाल में भी कुछ ऐसे प्रावधान हैं, जो इस दिशा में प्रभावी सिद्ध हो सकते हैं। लेकिन इसके साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कहीं हम लोकपाल से बहुत ज्यादा उम्मीदें न रखने लगें।

लोकपाल भ्रष्टाचार को नहीं रोक सकता। लोकपाल एक ऐसी दवाई की तरह है, जो मरीज को बीमारी के समय दी जाती है। भ्रष्टाचार की नकेल कसने के लिए प्रशासनिक सुधारों की दरकार है। हमें अधिकारियों की निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता और विश्वसनीयता का समावेश करना होगा, विवेकाधीन अधिकारों में कटौती करनी होगी, काम में देरी पर संबंधित व्यक्ति को दंडित करना होगा, ताकि भ्रष्टाचार के अवसर समाप्त किए जा सकें। प्रशासनिक तंत्र के इंसेंटिव सिस्टम में भी इसी तरह बदलाव लाया जा सकता है।

पदोन्नति का एकमात्र आधार हो अच्छा प्रदर्शन। ये विचार नए नहीं हैं। पिछले पचास साल में हर प्रशासनिक सुधार आयोग ने इस तरह के विचारों की वकालत की है। लेकिन न्यस्त स्वार्थो के गढ़ों और किलों ने इन विचारों की घेराबंदी कर दी। अन्ना हजारे ने जिस तरह लोकपाल को राष्ट्रीय फलक पर लाने में सफलता पाई है, उसे देखते हुए यह उम्मीद की जा सकती है कि वे प्रशासनिक सुधारों के लिए भी कुछ कर सकते हैं।

अन्ना हजारे के आंदोलन के दीर्घकालीन परिणाम क्या रहेंगे, यह तो अभी साफ नहीं है, लेकिन मैं मानता हूं कि उनके आंदोलन ने पहले ही बहुत कुछ अर्जित कर लिया है। अन्ना के आंदोलन को मध्य वर्ग से जो समर्थन मिला, उससे कई लोग हतप्रभ हैं। आज देश की लगभग एक तिहाई आबादी मध्य वर्ग से संबद्ध है।

एक लंबे समय तक भारतीयों ने स्वयं को कार में घूमने वाले अफसरों के प्रशासनिक दंभ और लालफीताशाही के समक्ष अवमानित महसूस किया है, जो उन्हें या तो अपने दफ्तरों में घंटों बैठाए रखते हैं या उनसे कई बार चक्कर लगवाते हैं। भारत का नया मध्य वर्ग अब यह सब बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। अन्ना हजारे के लिए भी असल चुनौती यहीं से शुरू होती है।

-गुरचरन दासGurcharan Das

गुरचरण दास