क्या नक्सलियों के वर्चस्व वाले इलाकों में समरसता, समानता और समृद्धि की बयार बह रही है?

प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा-माओवादी ने दैनिक जागरण की ओर से उठाए गए सवालों के जैसे जवाब दिए हैं उनसे यह और अच्छे से साबित हो रहा है कि नक्सली नेता वैचारिक रूप से बुरी तरह पथभ्रष्ट हो चुके हैं और वे अपनी ही बनाई दुनिया में रह रहे हैं। वे लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त कर न केवल सत्ता हथियाने का मंसूबा पाले हुए हैं, बल्कि ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे उन्होंने सत्ता संचालन का अधिकार वैधानिक तरीके से अर्जित कर लिया है। यदि वे इस खुशफहमी में नहीं होते तो सगर्व यह नहीं कह रहे होते कि फिरौती-उगाही करना इसलिए जायज है, क्योंकि उन्हें इतने बड़े तंत्र को चलाना पड़ रहा है। वे जिसे अपना तंत्र बता रहे हैं वह माफियागीरी के अलावा और कुछ नहीं। बेहतर हो कि वे यह स्पष्ट करें कि उन्होंने अपने तथाकथित तंत्र के जरिये क्या हासिल किया है? क्या नक्सलियों के वर्चस्व वाले इलाकों में समरसता, समानता और समृद्धि की बयार बह रही है? यदि उन्होंने अपने दबदबे वाले इलाके में एक गांव का भी अपने तरीके से कायाकल्प कर दिया होता तो शायद उनके तर्क किसी के गले उतरते।

माओवादी अपने हिंसक और अराजक कारनामों को चाहे जितना महिमामंडित करें उनका रास्ता बर्बादी का है। खुद को सही और शेष दुनिया को गलत मानने की उनकी मान्यता ने अब एक सनक का रूप ले लिया है। यही कारण है कि वे निरीह-निर्दोष लोगों को मारने के पक्ष में कुतर्क पेश कर रहे हैं। आखिर उन्हें यह अधिकार कहां से मिला है कि वे जिसे चाहें उसे अपना शत्रु या पुलिस-प्रशासन का मुखबिर घोषित कर मौत के घाट उतार दें? यह हास्यास्पद है कि जब पुलिस के हाथों उनके साथी मारे जाते हैं तो वे मानवाधिकारों के उल्लंघन का सवाल उठाते हुए कथित शोषणमूलक व्यवस्था को कोसते हैं, लेकिन जब वे स्वयं सुरक्षा बलों के जवानों को निर्मम तरीके से मारते हैं तो उसे न्यायसंगत बताते हैं। यदि माओवादी यह समझ रहे हैं कि आतंक के भय से लोग उनके कुतर्को को सही मानने लगेंगे तो ऐसा कदापि संभव नहीं। जो न्यायसंगत नहीं है उसे कोई भी सभ्य समाज किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं कर सकता। परिवर्तन उस तरह से बिलकुल भी नहीं आ सकता जैसे नक्सली संगठन चाह रहे हैं।

लोकतांत्रिक व्यवस्था एवं उसके संचालन में कुछ खामियां हो सकती हैं और वे हैं भी, लेकिन नक्सलियों की व्यवस्था तो विनाश का पर्याय है। वह मानवीय मूल्यों का निरादर और सभ्य समाज के तौर-तरीकों का दमन करने वाली है। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि प्रारंभ में नक्सली संगठनों ने शोषण और असमानता के खिलाफ आवाज उठाने के साथ देश का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि विकास के नाम पर किस तरह निर्धन तबके की घोर अनदेखी हो रही है, लेकिन अब तो वे खुद ही विकास के सबसे बड़े शत्रु बन गए हैं। वे स्कूलों, पुलों, रेल पटरियों आदि को ध्वस्त तो कर ही रहे हैं, यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि विकास और जनकल्याण की कोई भी योजना आगे न बढ़ने पाए। चूंकि नक्सलियों के पास अपनी विजातीय-विचित्र विचारधारा के पक्ष में कोई ठोस तर्क नहीं इसीलिए वे बातचीत के हर प्रस्ताव से भी दूर भागते हैं या ऐसी शर्ते लेकर आ जाते हैं कि वार्ता संभव ही न हो सके।

साभारः दैनिक जागरण