नक्सलवाद का दर्द

वस्तुतः नक्सलवाद की नींव रखने वाले चारू मजुमदार और कनु सान्याल के मन में सत्ता के खिलाफ सशस्त्र आन्दोलन शुरुआत करने का विचार तभी आया होगा जब उन्होंने संभवतः यह महसूस किया होगा कि भारतीय मजदूरो और किसानो की दुर्दशा के लिए सरकारी नीतिया जिम्मेदार है,और उसी के कारण उच्च वर्गों का बोलबाला हो गया है.

और शायद सौ फीसदी वे गलत भी नहीं है. अतः निश्चय ही आज ये सशस्त्र विद्रोह नक्सलवाद का उग्र रूप धारण कर चुका है, जो देश के लिए एक सबसे बडा खतरा बनकर मंडरा रहा है.

कितने दुख की बात है कि हमारे सामाजिक तत्व ही समाज विरोधी बन रहे हैं, और वो सब कुछ करने को तैयार है जो राष्ट्र  हित में नहीं है, चाहे कारण जो भी हो? मगर प्रश्न ये है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन? क्यों उठा ऐसा तूफान? क्या ये भी सच नहीं कि रक्षक की भक्षक बने बैठे हैं? अब विडम्बना ऐसी है कि  केंद्र सरकार ने नक्सलवाद के खात्मे के लिए  40000 जवान तैयार किये हैं, और दूसरी तरफ विकास के नाम पर 7300  करोड का प्रावधान किया है .

गृह सचिव पिल्लै जी ने तो ये भी कह डाला कि एक महीने के भीतर जंगलो की सफाई, स्कूल, स्वास्थय आदि की व्यवस्था हो जाएगी. साथ ही नागरिक शासन भी बहाल हो जाएगा. पर क्या आपको नहीं लगता कि इतने कम समय में नक्सलीयों को खदेडना तथा जंगलो को साफ करना नाको चने चबाने के बराबर होगा?

इतिहास गवाह है कि नक्सलियों के खिलाफ सुरक्षाकर्मियों को कभी भी बडी कामयाबी नहीं मिली. नक्सलियों ने जिस तरह फरवरी में  बंगाल में चौबीस जवानो की जाने ली, अप्रैल में बारूदी सुरंग विस्फोट, मई में आठ जवानो की बेदर्दी से मौत, और फिर उसी माह रेल पटरियों से उतार कर डेढ़ सौ लोगो के मौत का कारण बने और हाल में पुलिस कर्मियों को बंधक बनाया, यह उनकी विजय को दर्शाता है.

परन्तु इसके बावजूद मनमोहन सिंह जी ने इसे आंतरिक खतरा मात्र कहा. जबकि सत्य तो यही है कि कल जाकर यही नक्सली 26 /11 जैसी किसी बड़ी घटना की पृष्टभूमि तैयार करेगें.

अंत मे यही कहा जा सकता है कि सरकार बंदूक के दम पर नक्सलवाद को खत्म करने का सपना देखना बंद कर दे, क्योकि सेना तो देश को बाहय खतरे से बचाने के लिए होती है और यदि इस तरह वे देशवासियो को ही मारते रहे तो सामाजिक अस्थिरता  उत्पन्न हो जाएगी.

- सावन कुमार झा