स्कूलों को नहीं छात्रों को फंड दे सरकारः निसा

- राजधानी में जुटे देशभर के निजी 'बजट' स्कूल संचालक, गिनाई आरटीई की विसंगतियां
 
नई दिल्ली। देशभर के निजी स्कूल असोसिएशनों का मानना है कि शिक्षा के अधिकार (आरटीई) के तहत स्कूल फीस भरने में असमर्थ आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों को दाखिला देने के ऐवज में स्कूलों को फंड दिए जाने की बजाए यदि इसे सीधे छात्रों को दिया जाए तो योजना अधिक प्रभावी साबित होगी। असोशिएशन के प्रतिनिधियों के मुताबिक फंड सीधे छात्रों को दिए जाने से न केवल शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा बल्कि छात्रों को पसंद के स्कूल में दाखिला लेने का विकल्प मिलेगा। ये असोसिएशन देशभर के निजी स्कूल संचालकों के वार्षिक सम्मेलन व कैपेसिटी बिल्डिंग वर्कशॉप में सम्मिलित होने दिल्ली आए थे। कार्यक्रम का आयोजन नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल अलाएंस (निसा) व थिंकटैंक सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) द्वारा आयोजित किया गया था। वाइएमसीए परिसर में 17-18 अप्रैल को आयोजित इस दो दिवसीय वर्कशॉप में 14 राज्यों के स्कूल असोसिएशनों ने हिस्सा लिया था।  
 
वार्षिक सम्मेलन व कैपेसिटी बिल्डिंग वर्कशॉप के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल अलाएंस (निसा) के अध्यक्ष आर.सी. जैन ने कहा कि शिक्षा का अधिकार कानून के कारण निजी स्कूल संचालकों के समक्ष तमाम ऐसी समस्याएं उत्पन्न हो गई है जिससे उबरना उनके लिए असंभव हो गया है। परिणाम स्वरुप देशभर के सभी राज्यों में बड़ी तादात में छोटे स्कूल या तो बंद हो गए हैं या फिर बंद होने की कगार पर खड़े हैं। उन्होंने कहा कि आरटीई में वर्णित प्रावधानों के कारण स्कूल बंद होते हैं तो सबको शिक्षा प्रदान कराने का सरकार की मंशा अधूरी रह जाएगी।
 
निसा के उपाध्यक्ष कुलभूषण शर्मा ने कहा कि आरटीई के प्रावधानों के अतिरिक्त अलग अलग राज्यों के अपने अलग अलग कानून हैं। उन्होंने कहा कि दोहरे प्रावधानों के कारण स्कूलों को मान्यता प्राप्त करने में अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। कुलभूषण शर्मा ने कहा कि सरकार को इस जल्द से जल्द बाबत कॉमन मिनिमम प्रोग्राम बनाना चाहिए। उन्होंनें मांग की कि स्कूलों को अपने पसंद के बोर्ड से मान्यता प्राप्त करने की भी आजादी मिलनी चाहिए।
 
इस दौरान महाराष्ट्र, तमिलनाडू, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब, हरियाणा, केरल व कर्नाटक के स्कूल असोसिएशनों की तरफ से मांग की गई कि आरटीई के तहत गरीब परिवार के बच्चों को दाखिला दिए जाने के ऐवज में स्कूलों को मिलने वाला फंड सीधे छात्रों के खाते में हस्तांतरित किया जाना चाहिए। असोसिएशनों के मुताबिक एलपीजी सिलेंडर की तर्ज पर डायरेक्ट फीस ट्रांसफर से छात्रों को मनचाहे स्कूल में दाखिला लेने का विकल्प प्राप्त हो जाएगा। ऐसी दशा में स्कूलों के बीच प्रतिस्पर्धा की भावना पैदा होगी जिससे शिक्षा की गुणवत्ता व अन्य आधारभूत सुविधाओं में सुधार होगा। स्कूल असोसिएशनों ने लैंड नार्म्स को स्कूलों की मान्यता का दुश्मन बताते हुए इसे स्पष्ट और आसान करने की मांग भी की।
 
 
- आजादी.मी

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