भरोसे का अहसास

यदि भारतीयों ने अगस्त 1947 में राजनीतिक आजादी हासिल की थी तो जुलाई 1991 में उन्हें आर्थिक आजादी मिली, लेकिन मई 2014 में उन्होंने अपनी गरिमा हासिल की। यह नरेंद्र मोदी की अभूतपूर्व जीत के महत्व को दर्शाता है। भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है जब नव मध्य वर्ग को अपनी उम्मीदों और आकांक्षाओं की पूर्ति का भरोसा जगा है। मोदी ने लाखों लोगों का विश्वास जगाया है कि उनका भविष्य बेहतर है और इस मामले में किसी तरह से पूर्वाग्रही होने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि अपने कामों से स्थिति को बदला जा सकता है। एक बेहतरीन पुस्तक बुजरुआजी डिग्निटी में देरद्रे मैक्लॉस्की ने बताया है कि 19वीं शताब्दी और 20वीं सदी की शुरुआत में भी हालात कुछ ऐसे ही थे जब पश्चिम एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा था। उस समय औद्योगिक क्रांति के चलते मध्य वर्ग का उदय हुआ, जिसने पश्चिमी समाज के मूल र्ढे को बदलकर रख दिया। मोदी की जीत से जहां लोगों का उत्साह बढ़ा था वहीं कुछ सप्ताह बाद उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में दो लड़कियों के साथ दुष्कर्म के बाद उनकी हत्या करके पेड़ पर टांगे जाने की घटना से लोगों का उत्साह कमजोर हुआ। यह एक जाति विशेष के साथ अपराध था, जो हमें बताता है कि एक बार फिर उत्तर प्रदेश देश के शेष हिस्सों से पीछे छूट रहा है। यह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की कानून विहीन सरकार पर भी सवालिया निशान खड़े करता है।
 
अपराध की यह घटना समूचे भारत को यह बताने के लिए काफी है कि क्यों उत्तर प्रदेश में मोदी को इतनी प्रचंड जीत मिली। बदायूं कांड में शामिल लोगों की मानसिकता के उलट नरेंद्र मोदी को चुनने वाले विशिष्ट मतदाता जाति के विचार से प्रभावित नहीं थे और न ही वे हिंदू राष्ट्रवादी थे। यह युवा और मध्य वर्ग से संबंधित लोग थे, जो कुछ समय पूर्व ही गांवों से छोटे शहरों-कस्बों में आए थे। उन्होंने जीवन में पहली बार नौकरी पाई और हाथों में पहली बार मोबाइल थामा। वे अपने पिता की तुलना में कहीं अधिक बेहतर जीवन की आकांक्षा से प्रेरित थे। एक सामान्य कद-काठी के, अपने दम पर आगे बढ़े और स्टेशन पर कभी चाय बेचने वाले व्यक्ति ने उन्हें विकास का संदेश सुनाकर और सुशासन की बात कहकर प्रेरित कर दिया। नतीजतन जाति, धर्म और अपने गांव को भुलाकर लोगों ने मोदी के पक्ष में वोट दिया। ये युवा इस बात से आश्वस्त हुए कि उनकी लड़ाई अपने अन्य भारतीयों से नहीं, बल्कि एक ऐसे राज्य के खिलाफ है जो बिना पैसा दिए उन्हें जन्म प्रमाणपत्र भी नहीं देता।
 
इतना ही नहीं नरेंद्र मोदी ने इस समूह के मन में मध्य वर्ग की अन्य असुरक्षाओं को भी समाप्त किया। युवाओं ने यह पाया कि दूसरों की तुलना में आगे बढ़ने के लिए उन्हें अंग्रेजी की ग अधिक जरूरत नहीं है। उन्हें लगा कि अंग्रेजी नहीं बोलने वाला एक चाय वाला यदि देश का नेतृत्व कर सकता है तो इस भाषा में पारंगत न होना कोई गलती नहीं है। इससे युवाओं ने महसूस किया कि अपनी मातृभाषा में बोलने के बावजूद वे आधुनिक हो सकते हैं। जब उन्होंने अपनी टीवी पर मोदी को बनारस के दशाश्वमेध घाट पर गंगा की आरती करते हुए देखा तो यह बात उन्हें दिल तक छू गई। अचानक ही हिंदू होने पर उनका शर्मिदगी का भाव जाता रहा। अंग्रेजी भाषा में बात करने वाला सेक्युलर बुद्धिजीवी तबका उन्हें सदैव अंधविश्वासी कहकर चोट करता रहा और किसी तरह भी उन्हें क्षुद्र अथवा कमतर होने का अहसास कराता रहा। राजनीतिक मंचों पर अपने लंबे चुनाव अभियानों में मोदी ने उनके औपनिवेशिक मनोमस्तिष्क को बदलने और गौरवान्वित महसूस कराने की कोशिश की।
 
अमेरिकी विदेश विभाग के एक पूर्व कर्मचारी डॉ. वाल्टर एंडरसन ने बताया कि मोदी ने कम से कम पांच सौ बार विकास शब्द का प्रयोग किया। एक युवा, जो उत्तरवर्ती सुधार की पीढ़ी से जुड़ा हो और जो अपने खुद के प्रयासों और कठिन परिश्रम से बड़ा हुआ हो, उसके लिए प्रतिस्पर्धी बाजार व्यवस्था में विकास का सूत्रवाक्य अवसर पाने का एक जरिया है। अर्थशास्त्र के जनक एडम स्मिथ भी इसे स्वातंत्र्य अथवा आजादी की प्राकृतिक प्रणाली मानते थे। यह प्रणाली गुजरात में फली-फूली और कोई आश्चर्य नहीं कि यह राज्य स्वतंत्रता सूचकांक के मामले में भारत के अन्य सभी राज्यों से बेहतर है। इस तरह की प्रणाली में सरकार का काम एक ऐसे माहौल का सृजन करना होता है जिसमें सभी व्यक्ति बिना किसी बाधा के अपने हितों के अनुकूल पारदर्शी बाजार व्यवस्था में काम कर सकें। ऐसी व्यवस्था के बाद एक अदृश्य हाथ धीरे-धीरे लोगों को गरिमापूर्ण तरीके से मध्य वर्गीय जीवन और बेहतर जीवन दशाओं की ओर अग्रसर करता है। आखिर गरिमा ही वह स्वतंत्रता है जो हमें बदलती है। कुल मिलाकर इस प्रक्रिया में आर्थिक निर्णयों में राजनीतिक कार्यालयों का दखल हटा और नौकरशाहों का स्थान बाजार ने लिया। जब मोदी कहते हैं कि हमें विकास को जनांदोलन बनाना होगा, तो वह क्रोनी कैपिटलिज्म के बजाय नियम आधारित पूंजीवाद को वैधता देते हैं। इस मामले में वह मार्गरेट थैचर और देंग की तरह दिखते हैं जिन्होंने जनविश्वास को बाजार से जोड़ा। मनमोहन सिंह से इसकी अपेक्षा थी, लेकिन वह कुछ नहीं कर सके। मोदी को उनकी विफलता से सीख लेनी चाहिए और आरएसएस को हिंदुत्व के एजेंडे के बजाय विकास के एजेंडे के लिए तैयार करना चाहिए।
 
इस क्रम में हम बदायूं में दो लड़कियों के खिलाफ क्रूर हिंसा को नहीं भुला सकते। यह घटना बताती है कि हम सभ्य समाज से अभी भी कितने दूर हैं। हमें नहीं मालूम कि उत्तर प्रदेश और शेष भारत में दुष्कर्म की कितनी घटनाएं होती हैं और प्रतिदिन ऐसे कितने ही मामलों को शर्मवश दफना दिया जाता है, जिसमें जाति आधारित प्रशासन अहम भूमिका निभाता है। मोदी सभी समस्याओं को हल नहीं कर सकते, लेकिन वह अखिलेश यादव जैसे सत्ता में बैठे लोगों को जवाबदेह अवश्य बना सकते हैं। जब अखिलेश यादव से कानपुर में एक महिला पत्रकार ने इस दुष्कर्म के मामले में सवाल पूछा तो उन्होंने जवाब दिया कि आप तो सुरक्षित हैं? उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने भी मुंबई में रह रहे चार युवाओं को दुष्कर्म के मामले में अदालत द्वारा मौत की सजा सुनाए जाने पर कुछ ऐसा ही बयान दिया था। उन्होंने ऐसा इसलिए कहा, क्योंकि दोषी व्यक्ति एक ऐसे समुदाय से थे, जिससे वह वोट चाहते थे। पश्चिम की तरह अब भारत में भी लोगों की अपेक्षाएं बढ़ रही हैं। मोदी को चुनने के बाद गरिमापूर्ण जीवन के लिए जूझ रहा नया मतदाता वर्ग आत्मविश्वास से भरा हुआ है, लेकिन वह अधीर और निर्मम भी है। यदि नरेंद्र मोदी ने विकास और सुशासन का अपना वादा पूरा नहीं किया तो आगामी चुनावों में उन्हें दरकिनार करने में यह वर्ग संकोच नहीं करेगा।
 
- गुरचरन दास
(लेखक प्रख्यात स्तंभकार हैं)
गुरचरण दास

Add new comment

Filtered HTML

  • Lines and paragraphs break automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <blockquote> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.

Plain text

  • No HTML tags allowed.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Lines and paragraphs break automatically.