नई भूमिका में सरकार

- बदले माहौल में सरकार को अंपायर की भूमिका में होना जरूरी मान रहे हैं केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा

हमारे पास विकासशील दुनिया का नेतृत्व करने का अवसर है और केंद्र सरकार इसके लिए सारे प्रयास भी कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने यह बात बार-बार कही है कि हमारी सरकार गरीबों के हितों वाली है। संसाधनों पर देश के गरीबों का पहला हक है और हमारे सभी प्रयास भारत में गरीबी हटाने के इर्द-गिर्द केंद्रित होने चाहिए। यह हमारी सिर्फ राजनीतिक जरूरत नहीं है, बल्कि हमारा नैतिक उत्तरदायित्व और राजधर्म भी है। हम गरीबों के हितों को पूरा करने वाली सरकार के साथ बाजार के हितों को पूरा करने वाली सरकार भी हैं। सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि हमारे बाजार ठीक से विकसित हों, प्रतिद्वंद्विता वाली नीतियों का हम अनुसरण करें और हमारी कंपनियां दुनिया भर में प्रमुख बनें।

जब हमारे बाजार बढ़ेंगे, उद्यमी बड़ी कंपनियां बनाएंगे, अपने युवाओं के लिए लाखों रोजगार का सृजन करेंगे और पर्याप्त कर राजस्व जुटाएंगे तब ही हम अपने गरीबों की सेवा में सक्षम हो पाएंगे और अपने देश से गरीबी और भुखमरी के अभिशाप खत्म कर पाएंगे। 1हमारी नीतियां गरीबों के हितों वाली और बाजार-समर्थक हैं इसलिए हमें माई-बाप सरकार होने से अंपायर सरकार बनने की तरफ जाना होगा। माई-बाप सरकार आजाद भारत में अधिकतर समय सत्ताधारियों का सिद्धांत रहा है। यह सिद्धांत भारत के राजाओं, महाराजाओं, नवाबों और सुल्तानों के लंबे इतिहास से उभरा है। दूसरे शब्दों में यह सामंती और वंशवादी शासन से संबद्ध है। हमें इस रूढ़िवादिता को चुनौती देनी ही चाहिए, क्योंकि माई-बाप सरकार न तो नागरिकों की सेवा कर रही है, न देश की ही।

आज देश की अधिकतर विकास गतिविधियां अपने को बनाए रखने और मनरेगा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और इंदिरा आवास योजना जैसे कार्यक्रमों पर अमल पर केंद्रित हैं। सैकड़ों अध्ययनों ने दिखाया है कि ये कार्यक्रम योजना के अनुरूप नहीं चल रहे। आजादी के सात दशक बाद भी करोड़ों लोग अत्यंत गरीबी में रह रहे हैं, 40 प्रतिशत से अधिक बच्चे कुपोषित हैं, गुणात्मक रोजगार पाने को लेकर हमारा युवा चिंतित है, हम बीमारियों के जरिये सार्वजनिक स्वास्थ्य की तबाही ङोल रहे हैं और हमारे शहर ऐसे बन रहे हैं जो रहने लायक नहीं हैं। सरकार भी दबाव में है। चूंकि अधिकांश नागरिक गरीबी के जाल में फंसे हुए हैं इसलिए इन विकास कार्यो के लिए खर्च बढ़ाने का राजनीतिक दबाव लगातार बना रहता है। उधर बहुमूल्य टैक्स रेवेन्यू गंवाया भी जा रहा है। लोग इसलिए टैक्स देने से आनाकानी करते हैं, क्योंकि वे महसूस करते हैं कि उन्हें पर्याप्त सार्वजनिक सेवाएं नहीं मिल रही हैं। राजकोषीय घाटा बढ़ते ही जाने से रक्षा और बुनियादी ढांचे जैसी प्रमुख राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को पूरा करने में मुश्किलें बनी रहती हैं। बाजार और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां इन कमजोरियों से वाकिफ हैं, क्योंकि मैक्सिको और ब्राजील जैसे कई अन्य देश इस तरह की दुविधाओं के कारण ही छटपटाते रहे। दरारों वाले पात्रता कार्यक्रम इन सरकारों के लिए भारी बोझ बन गए।

माई-बाप सरकार की अव्यवस्था से निकलने का तरीका है कि हम अंपायर सरकार जैसी व्यवस्था से शासन तंत्र की भूमिका को नए तरीके से परिभाषित करें। सरकार अंपायर की तरह व्यवहार करे। पिच तैयार हो जाने, स्कोर बोर्ड लग जाने, मैदान सज जाने, सारी व्यवस्था हो जाने, दर्शकों के आकर बैठ जाने के बाद अंपायर मैदान में आते हैं। खिलाड़ियों को सारे नियम बता दिए जाते हैं। खेल शुरू होता है और अंपायर का काम सिर्फ यह देखना होता है कि नियमों का पालन ठीक तरह से हो। यही काम सरकार को करना है। नागरिकों के हाथ में खेल की कमान देनी होगी। सरकार का काम कानून को कायम करना और उन्हें लागू करना होगा। हमें न्यूनतम सरकार, अधिकतम सुशासन की तरफ बढ़ना होगा। सरकार को कानून, संपत्ति और खेती-किसानी अधिकार के पालन और देश में हर गांव, झुग्गी बस्ती तथा मोहल्ले के वित्तीय समावेशन को सुनिश्चित करना होगा। निश्चित तौर पर हमारी सरकार देश भर में न्यायपालिका और पुलिस को मजबूत कर रही है। इसके साथ ही हमारी रेगुलेटरी संस्थाओं को मजबूत करने की आवश्यकता है और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वे स्वतंत्र रहें। सरकार को निवेश और भूमि अधिग्रहण के जरिये आवश्यक सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को सुनिश्चित करना चाहिए।

हमारी सरकार सड़कों, हाईवे, पुलों, रेलवे और डिजिटल संपर्क में भारी निवेश बढ़ाने के जरिये यह कर रही है। अंपायर सरकार बाजार विकास में सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बाजार का ऐसा विकास उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण होता है। बाजार विकसित होता है जब महत्वपूर्ण पब्लिक गुड्स उपलब्ध कराया जाता है। पब्लिक गुड्स या बाजार के बुनियादी ढांचे से मेरा मतलब है कि ऐसी वस्तुओं का पूरा लाभ केवल वही लोग नहीं उठा सकते हैं जो उसमें पैसा लगाते हैं। यह बिजली आदि सेवाओं के मूल्य निर्धारण के लिए पारदर्शी कानूनों या स्वास्थ्य व्यवस्था में कुछ नई प्रक्रियाओं के प्रशासन के लिए नियम बनाने जैसी कई चीजों के लिए सच है। इसलिए बाजार का विकास करने और सभी उद्योगों को मदद करने के लिए सरकार और निजी कंपनियों के बीच तालमेल की जरूरत है। तालमेल के अभाव के कारण बाजार के विकास के लिए जरूरी कुछ पूंजी व्यवहार में नहीं आ पाती।

माई-बाप सरकार बनने की तुलना में अंपायर सरकार बनना बहुत मेहनत का काम है। लेकिन इससे नागरिकों के साथ सम्मान का व्यवहार होता है, भ्रष्टाचार काफी कम हो जाता है और राजकोषीय स्थिति नाटकीय ढंग से बेहतर होती है। सरकार वैल्यू एडेड टैक्स पर केंद्रित हो गई है। यह सरकार की सही भूमिका है और देश को महान बनाने का एकमात्र रास्ता भी। भारत नई स्थितियों में सरकार की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करने के लिए नमूना प्रस्तुत कर रहा है। हम नियम और टेक्नोलॉजी आधारित सरकार चलाएंगे जो पूर्ण नियंत्रित प्रतिद्वंद्विता के जरिये बाजार को चलने देती है। इस तरह भारत वैश्विक विकास के लिए नई प्रेरणा देने को तैयार है। हम आइटी सेवाओं, जेनेरिक दवाओं, छोटी कारों, मोटरसाइकिलों के प्रमुख उत्पादक हैं। इसके साथ ही हम इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा सामग्रियों के उत्पादन की धुरी बनने वाले हैं। पूरी विकासशील दुनिया में हम अपने किफायती और आइटी उद्योगों का निर्यात करेंगे तो हम उन देशों में भी विकास को तेज करेंगे। भारत का विकास मॉडल विशिष्ट तौर पर नए किस्म का, किफायती और ग्रीन है। दूसरे देश इस मॉडल को अपनाएंगे तो यह पूरी दुनिया के लिए न्यायसंगत विकास की गाथा लिखेगा।

- (सिंबायोसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के 12वें दीक्षांत समारोह में दिए गए भाषण का संपादित अंश)

साभारः दैनिक जागरण

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