जन्मदिन मुबारक नानी पालखीवाला 16 जनवरी 1920

- हम अमीर सरकार वाले गरीब देश के निवासी है
- गरीबी उन्मूलन के लिए लाई जाने वाली सरकारी योजनाएं गैरकानूनी और काला धन बनाने का स्त्रोत होती हैं
- यदि समाजवाद के प्रति हमारी सनक बरकार रहती है तो देश का भविष्य अंधकारमय ही रहेगा

16 जनवरी 1920 को मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) के पारसी परिवार में पैदा हुए पद्मविभूषण नानाभाई अर्देशिर पालखीवाला उर्फ नानी पालखीवाला उदारवादी विचारक, अर्थशास्त्री और उत्कृष्ट कानूनविद् थे। नानी पालखीवाला की आर्थिक समझ और विशेषज्ञता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यूनियन बजट पर उनकी प्रतिक्रिया को सुनने के लिए लोग लालायित रहते थे। दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर सहित तमाम शहरों के बड़े बड़े स्टेडियम में उनका व्याख्यान आयोजित कराया जाता था जहां हजारों की हुजूम उन्हें सुनने आती थी।  

नानी पालखीवाला को उनकी संवैधानिक और कानूनी समझ के अलावा समाजवाद के घोर विरोधी के तौर पर भी याद किया जाता है। समाजवाद से प्रेरित सरकारी योजनाओं आदि के वे प्रखर आलोचक थे। उनका मानना था कि समाजवाद का लबादा ओढ़, भारत कभी भी आर्थिक तरक्की हासिल नहीं कर सकता। राजनेताओं की लच्छेदार भाषणों पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा था कि, ‘राजनेताओं के बहकावे में आकर मासूम जनता अनजाने में छद्म गर्व का भाव ओढ़े हुए घूमती है और इस मुगालते में जीती है कि उनका देश जबरदस्त तरक्की कर रहा है।’ समाजवादी व्यवस्था की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा था कि ‘समाजवाद के प्रति सनक के कारण देश के हालात, निकट भविष्य में सुधरते प्रतीत नहीं होते हैं।’

माना जाता है कि वर्ष 1988-89 के यूनियन बजट पर उनके द्वारा दी गई कड़ी प्रतिक्रिया के परिणामस्वरूप ही पी.वी नरसिम्हा राव की सरकार ने वैश्विकरण को आत्मसात करते हुए देसी बाजार के दरवाजे विदेशी निवेशकों के लिए खोलने का फैसला लिया था। हालांकि विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर सहमति नहीं है।

समाजवादी नीतियों के प्रति उनकी राय ‘समाजवाद ने यूरोप में जन्म लिया और यूरोप में ही समाप्त हो गया, क्योंकि किसी अन्य देश ने उसे नहीं अपनाया। लेकिन हमारे देश के नीति निर्धारक समाजवाद के सच्चे समर्थक होने पर गर्व महसूस करते हैं’, स्पष्ट होती है।      

नानी पालखीवाला सामाजिक बदलाव के कार्यों में गैरलाभकारी संस्थानों की भूमिका के प्रति अत्यंत आशान्वित थे। किसानों के लिए शुरू की जाने वाली एक योजना पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा था, ‘मैं नहीं मानता कि किसानों की सहायता के लिए चलाई जाने वाली सरकारी योजनाएं वास्तव में किसानों का हित करती हैं। चूंकि योजना के तहत सहायता राशि मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी या रामकृष्ण मिशन या अन्य संगठनों द्वारा वितरित नहीं की जाती बल्कि सरकारी अधिकारियों के द्वारा बांटी जाती हैं। इस प्रकार सहायता राशि इतने हाथों से होकर गुजरती है कि अधिकांश धनराशि बिचौलियों और राजनेताओं द्वारा हजम कर ली जाती है।’

सरकार के शाहखर्ची को भी वे सही नहीं मानते थे। उन्होंने भारत को अमीर सरकार वाला एक गरीब देश बताते हुए देश के भविष्य को खतरे में बताया था। एक पब्लिक मीटिंग में उन्होंने कहा था कि, ‘भारत का भविष्य अंधकारमय है क्योंकि यह अमीर सरकार वाला एक गरीब देश है। जिस प्रकार से हमारे देश की सरकार खर्च करती है उससे यह प्रतीत होता है जैसे यह दुनिया की सबसे अमीर सरकार हो।’

‘गरीबी उन्मूलन के लिए सरकार द्वारा चलायी जाने वाली योजनाएं इसके सरपरस्तों के लिए बहुत अधिक मुनाफा दिलाने वाला उद्योग बन चुकी हैं। ऐसी योजनाएं गैरकानूनी और काला धन कमाने का सबसे बड़ा स्त्रोत बन चुकी हैं’, यह बयान भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुके सरकारी तंत्र पर उनका करारा प्रहार था। उन्होंने जनता को आगाह करते हुए कहा था कि ‘यदि आप समाचार पत्र में गरीबी उन्मूलन की योजना से संबंधित खबर पढ़ें तो सचेत हो जाएं और ऐसी योजनाओं के द्वारा इसके सरपरस्तों को पहुंचाए जाने वाले लाभ वाली बात को याद रखें।’ सरकारी योजनाओं के सुचारु वितरण की अक्षमता के बारे में अपने विचार को प्रकट करते हुए उन्होंने कहा था कि, ‘गरीबी उन्मूलन वाली योजनाओं की लगभग 80% तक की धनराशि गरीबों के हाथों तक कभी पहुंच ही नहीं पाती हैं और ऐसी योजनाओं के प्रभारियों द्वारा हजम कर ली जाती हैं।’

सरकार द्वारा अटॉर्नी जरनल का पद के प्रस्ताव को ठुकराने वाले नानी पालखीवाला सरकार नाम की संस्था के ही आलोचक थे, उन्होंने कहा था कि ‘मैं यह नहीं कहता कि ऐसा सिर्फ भारत में ही होता है। दरअसल, सरकार की परिभाषा ही ऐसी संस्था का होना है जहां यदि जनता अत्यंत सचेत नन रहे तो परिस्थितियां ठीक उसी प्रकार खराब होती जाती हैं जैसा कि किसी कंपनी के वरिष्ठ प्रबंधकों और हितधारकों के सचेत न रहने पर उस कंपनी का होता है।’  
 

- संपादक (यूनियन बजट 1988-89 पर नानी पालखीवाला की प्रतिक्रिया से उदघृत)

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