करोड़पति प्रत्याशियों को संदेह से क्यों देखते हैं

देश के पांच राज्यों में लोकतंत्र का पर्व धूमधाम से मनाया गया। इस दौरान चुनावी रणभूमि में अपना भाग्य आजमाने वाले नेताओं ने नियमानुसार अपनी चल-अचल संपत्ति का ब्यौरा भी दिया। समस्या यह है कि संपत्ति की जानकारी मिलते ही हंगामा शुरू हो जाता है कि फलां उम्मीदवार के पास इतनी संपत्ति है, कहां से उसके पास इतना पैसा आ गया? जिसके पास संपत्ति अधिक दिखती है, नैतिकतावादी उसे घेरने लगते हैं, जैसे उसने चोरी की हो, घोटाला किया हो या लूटकर संपत्ति बनाई हो। यह क्या बात हुई? 1991 के बाद आर्थिक उदारीकरण के चलते देश तेजी के साथ बदला। करोड़पतियों की तादाद बढ़ने की खबरें हम लगातार पढते-सुनते ही हैं। नए उद्यमी सामने आ रहे हैं। उन परिवारों से भी, जहां पहले कभी कोई उद्यमी नहीं रहा। इस आलोक में किसी के करोड़पति होने पर एतराज जताना कहां तक जायज है?

मानसिकता का सवाल

लगता है, धनी शख्स का सार्वजनिक जीवन में आना हमारे समाज को पसंद नहीं है। लेकिन हम इस तथ्य को नजरअंदाज कर देते है कि महात्मा गांधी निर्धन परिवार से नहीं थे। पंडित नेहरू खासे संपन्न परिवार से थे और नेताजी सुभाष चंद्र बोस का संबंध भी धनी परिवार से था। क्या संपन्न परिवार से रिश्ता रखना या ईमानदारी से धन कमाना पाप है ? क्या यह राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आता है? वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करके देश के गरीब-गुरबा के हक में एक बड़ा काम किया। वे तो राजा थे। महान समाजवादी नेता और चिंतक राममनोहर लोहिया भी आर्थिक दृष्टि से मजबूत परिवार से आते थे। मतलब साफ है कि समृद्ध परिवार से आने वाले लोग भी देश के मेहनतकश इंसान से लेकर हर वर्ग के पक्ष में सोच सकते हैं। सारा मामला मानसिकता से जुड़ा है।

आर्थिक मामलों के जानकार मानते हैं कि आपका बैंक बैलेंस या अचल संपत्ति में निवेश हर पांच साल में दोगुना हो जाता है। अगर दिल्ली या देश के बड़े शहरों-महानगरों की प्रॉपर्टी वैल्यू की बात करें तो यहां पर दो-तीन कमरे का फ्लैट भी 50 लाख से डेढ़ करोड़ रुपये या इससे भी अधिक कीमत का हो चुका है। इसके चलते आपकी चल-अचल संपत्ति तो ज्यादा दिखती ही है। इन स्थितियों में जिस शख्स की चल-अचल संपत्ति एक करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर ले, उसे क्या भ्रष्ट की श्रेणी में रखा जाएगा? इन दिनों भारत का मध्यवर्ग पूरी दुनिया की शिखर कंपनियों को अपनी तरफ खींच रहा है। इस वर्ग के पास खर्च करने के लिए ठीक-ठाक पैसा है। अगर मध्यवर्ग और धनी परिवारों से संबंध रखने वाले सियासत भी करें तो इसमें हाय-तौबा क्यों मचती है? अगर किसी की संपत्ति में इजाफा होता है तो उसे संदेह की नजरों से देखना कहां तक वाजिब है?

देश बदल रहा है। कारों-मोबाइलो और दूसरे लक्जरी सामान का इस्तेमाल करने वाले लोगों की तादाद देश में तेजी से बढ़ रही है। ऐसा न होता तो हमारे यहां का ऑटो और टेलीकॉम सेक्टर इतना आगे न बढ़ रहा होता। यह सब देश के नए उद्यमियों के अपने प्रयास और संघर्ष का परिणाम है। बदलता भारत नौजवानों को अपनी प्रतिभा साबित करने के भरपूर मौके दे रहा है। आंतरप्रेनरशिप के अंतर्गत प्रतिभावान युवाओं को खुला माहौल उपलब्ध कराया जा रहा है, ताकि वे नई संभावनाओं को तलाश कर उन्हें साकार रूप दे सके। इसके सुखद परिणाम भी सामने आ रहे हैं। आने वाले समय में देश में हजारों-लाखों नए उद्यमी सामने आएंगे। देश के आकार और जनसंख्या के हिसाब से यहां करोड़ों प्रतिभाएं है। इन्हीं नौजवानों में से अगर कुछ सियासत करें तो उनका स्वागत होना चाहिए। जब ये अपनी संपत्ति का ब्यौरा दें तो उसको लेकर शक करने की कोई वजह नहीं होनी चाहिए। दरअसल आंतरप्रेनरशिप को केवल बिजनेस से ही जोड़कर देखा जाता है, जबकि इसकी जरूरत हर क्षेत्र में है।

युवा उद्यमियों को टिकट

समस्याओं के बीच संभावना तलाशते लोगों को अगर मौका दिया जाए तो वे असंभव को संभव करने की ताकत रखते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, संस्कृति, समाजसेवा सहित अनेक ऐसे कार्यक्षेत्र हैं जहां युवाओं ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। बेहतर होगा कि राजनीतिक दल नए विचारों से लबरेज युवा उद्यमियों को भी अपने साथ जोड़ें। इन्हें टिकट देकर चुनाव लड़वाएं। देश के निजी क्षेत्र ने आंतरप्रेनरशिप को प्रोत्साहित करने की ओर कदम बढ़ाया है। कई बड़ी कंपनियों ने वेंचर कैपिटल के जरिए इसको आगे बढ़ाने की पहल की है। विभिन्न क्षेत्रों में शोध के जरिए सामने आ रहे नए विचारों को मौका दिया जा रहा है। इसका सबसे बेहतरीन परिणाम सॉफ्टवेयर और ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में देखा जा सकता है। वक्त का तकाजा है कि अब नैतिकतावदियों को भी समझाया जाए कि वे नए उद्यमियों का राजनीति के मैदान में स्वागत करें और हरेक को शक की नजर से देखना बंद करें।

 

- विवेक शुक्ला

साभारः नवभारत टाइम्स

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