नहीं भी और हां भी - माइकल नोवाक

अमेरिका के पैदा होने के समय अधिकतर समाज या तो जमींदारों के दबदबे में था या फिर सैन्य व्यवस्था के अधीन। अमेरिका के निर्माताओं ने इन मॉडल्स को खारिज करते हुए तर्क दिया कि एक ऐसी सोसायटी बनाई जाए, जहां व्यापार की छूट हो और जो जहां के लोग अपने कानून को मानें। इस तरह का समाज सत्ता की चाहत के लिए नहीं, बल्कि हर चीज को अधिकता में पाने के लिए समर्पित होगी। एलेक्जेंडर हेमिल्टन ने फेडरेलिस्ट-12 - में लिखा है ‘बड़े राजनयिक इस बात को अच्छे से समझ गए हैं और मानते हैं कि वाणिज्य की खुशहाली देश की समृद्धि का सबसे उपयोगी और लाभदायक स्रोत है। राजेनेताओं ने इसे अपने करियर का सबसे बड़ा मकसद बना लिया है।’वाणिज्य इंसान को बंटवारे और अलगववाद के पिछले स्रोत्रों से अलग करता है। उनकी दिलचस्पी राजनीति से हटकर बाजार की गतिविधि हो जाती है और खुली बाजार व्यवस्था के लिए जो उत्साह जरुरी है, वह धीरे-धीरे उनकी वफादारी एक बड़े गणराज्य के लिए कर देती है।

एक कारोबारी समाज गरीबों के लिए कहीं ज्यादा अच्छा होता है। इसका जनता और निजी नैतिकता पर असर भी काफी फायदेमंद होता है। निर्माताओं ने इतिहास से यह सबक लिया कि जो समाज सेना के अधीन के होता है, वह कहीं ज्यादा संवेदनशील और अजीबोगरीब तरीके से ( अपने चोट खाए सम्मान की रक्षा करने के लिए लड़ने को तैयार ) व्यवहार करता है और इस सबकी कीमत गरीबों को चुकानी पड़ती है। पीढियों ने देखा है कि गरीबी के चलते प्रगति काफी कम होती है। राजा-महाराजा और शासकों के बीच सम्मान और बदले की लड़ाई ने एक नहीं, कई बार गरीबों द्वारा विकास के लिए की गई छोटी-छोटी कोशिशों को बर्बाद कर दिया।

अभिजात्य वर्ग के लोगों के दरबार में तमाशा, मनोरंजन, बुराइयां आदि शामिल हो गए थे और उससे नीचे जाने की शुरुआत हो गई थी। कुछ ऐसे उदारवादी सामंत भी थे, जिन्होंने अपनी सेना तक बना ली थी लेकिन कुल मिलाकर उनकी जिंदगी उदासीन ही थी। वे मोटे तौर पर अपनी दौलत और गरीबों की कमाई के बूते जिंदगी जी रहे थे। उन्होंने सेना को इस तरह प्रशिक्षण दिया कि खेती से होने वाले सरप्लस की खपत हो सके । उस जमाने में बेहद खराब सड़कें और कानून-व्यवस्था की कमी उस सरप्लस उत्पादन को उत्पादक वाणिज्य संसाधन बनाने से रोक देता था।

अमेरिका के निर्माता इस नतीजे पर पहुंच चुके थे कि एक गणराज्य के लिए एरिस्टोक्रैसी और सैनिक शासन एक नए समाज में लागू करना किसी भी तरह से सुरक्षित नहीं होगा। एक गणराज्य को स्वतंत्र, खुद से बनाया हुआ, आविष्कारक, सृजनात्मक और अपने ऊपर कीच़़ड़ उछलने से निडर, कड़ी मेहनत करने वाला और नए तरीके इजाद करने के लिए प्रतिबद्ध लोगों की जरुरत है। अमेरिका जैसे नवजात आजाद गणराज्य के लिए आजादी और नए तरीके एक वाणिज्यिक समाज का नतीजा माने जा सकते हैं, जिनसे आम आदमी को भला होता।

इससे भी आगे अमेरिका के निर्माताओं ने सोचा कि वाणिज्य आधारित समाज बनाने का नतीजा होगा कि कानून के सामने हर व्यक्ति की एक जिम्मेदारी होगी। कानून न मानने वाला एक समाज जिसे आपसी करार को लागू करने से व्यवस्था से कुछ उम्मीद हो, भला कारोबार कैसे कर सकता है और जोखिम उठा सकता है, जबकि उसे मेहनत के पूरे पैसे नहीं मिलते हों। न्यू इंग्लैंड से जो जहाज एशिया चाय लेने के लिए जाते हैं, उन्हें सामान लाने से और चाय की बिक्री से पहले ही पैसा देना होता था। उन्हें समुद्री डाकुओं से भी लड़ना होता था। इसके लिए सिर्फ कोई लिखा कानून नहीं था, बल्कि समुद्र की उफनती लहरों पर ब्ंदूक के सामने जो करने के लिए कहा जाता था, वही कानून था।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि उस जमाने में दुनिया की वाणिज्यिक राजधानियों में से एक एम्सटरडम उन लोगों के लिए कर्मिशियम एट पेक्स (कॉमर्स पोस्टर पीस) था। पड़ोसियों में एक-दूसरे की बीच शांतिपूर्वक आदान-प्रदान (न कि युद्ध में हासिल की हुई चीजें) ही तो व्यापार है।

हमारे पूर्वजों को यकीन था कि वाणिज्यिक सोसायटी अपने सभी सदस्यों को कड़ी मेहनत, नियमितता और नए प्रयोग के लिए निर्देश देगी। यह अमेरिकियों को खतरे मोल लेने में निडर (न्यू इंग्लैंड के समुद्री कैप्टन की तरह), कम लालची, मुनाफा कमाने के लिए अपने लाभ को फिर से निवेश करने में थोड़ा संयम देगी। यह प्रणाली पुरानी जमींदारी से अलग एक दूसरी व्यवस्था होगी। एक व्यावसायिक सोसायटी ईमानदार, जिम्मेदार, अपने हितों को पीछे रखने वाला और भविष्य को लेकर चिंतित नागरिकों को प्रोत्साहन देती है। इस तरह के लोग गणराज्य को कानून से चलने वाला और समृद्ध बनाने में मदद करते हैं।

क्योंकि वाणिज्यिक सोसायटी की जड़ कहीं-न-कहीं यहूदी और क्रिस्चियन धर्म से जुड़़ी हैं, इसलिए अमेरिका के निर्माताओं को यह जानने में ज्यादा वक्त नहीं लगा कि अर्थव्यवस्था में धर्म और व्यावसायिक प्रकृति को कम करने में नैतिकता का कितना बड़ा रोल है और उन्हें खुद को हद में रखने और अपने आप को तबाह करने से कैसा रोका जा सकता है। टोक्योविले ने सही ही लिखा है –कई चीजें ऐसी होती हैं, जिन्हें करने से नागरिकों को कानून नहीं रोक सकता लेकिन अमेरिका में धर्म रोक सकता है।

दूसरी तरफ वाणिज्यिक गणराज्य की सफलता के चलते ओवरटाइम और कई ऐसी बातों का जन्म हुआ, जिनकी वजह से समाज में नैतिकता का पतन हुआ। पूर्वजों के बलिदान से जो समृद्धि आज के नौजवानों को मिली, वे उसे हल्के में लेने लगे। कुछ लोग वाणिज्यिक गणराज्यों के नियम कानून से भागना चाहते थे तो कुछ अपने पूर्वजों के संयमित तौर-तरीकों का अनादर करना चाहते थे। कड़ी मेहनत और स्वशासन से जीनेवाली पीढ़ी अगली पीढ़ी को रास्ता दिखाती है, जिसका अपना एक अलग ही राग होता है, जो बगावत करना चाहती है और जो कड़ी मेहनत करने की बजाय आराम और ऐशवाली जिंदगी बिताना चाहती है। कल के लिए बचाकर चलनेवाली पीढ़ी की जगह एक ऐसी पीढ़ी ले लेती है, जो बिना किसी दिशा के बस आज को जीना चाहती है। इन तरीकों के जरिए वाणिज्यिक गणराज्य की सफलता नौजवानों की नैतिकता को कम करने लगती है। सोशॉलजिस्ट डेनियल बेल समय के इस बदलाव को पूंजीवाद के सांस्कृतिक विरोधाभास की संज्ञा देते हैं। दूसरे शब्दों में - कड़ी नैतिकता अंदर और कमजोर नैतिकता बाहर। हम सब अपने चारों तरफ नैतिकता में पतन के मौकों में हो रही वृद्धि को देख सकते हैं। लेकिन नैतिकता में इस तरह का पतन सिर्फ एक संभावित नतीजा है, न कि निश्चित तौर पर होनेवाला बदलाव। वेल इसे लेकर हमें चेतावनी देते हैं। हम इस तरह के आकर्षण से पार पाने के लिए कुछ अ्लग प्रयास कर सकते हैं। कर्मशियल सोसायटी के लिए सबसे बड़ी चुनौती नैतिक और सांस्कृतिक पैठ बनाना, आध्यात्मिक जड़ों की तरफ लौटना है। हमारे पूर्वज इसे -दिव्य ज्ञान- कहते हैं। नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री रॉबर्ट फॉजिल ने जो राह दिखाई है, उसके बाद अमेरिका चौथी बार जागृत होने की तरफ है। इसकी पहचान बुनियादी चीजों की तरफ वापस लौटना, परिवार के मूल्यों पर जोर, युवाओं में मजबूत चरित्र के विकास के लिए प्रयास जैसी चीजें हैं। इस तरह के युवा हमारे गणराज्य में आजादी और वाणिज्यिक गतिविधयों की सबसे बड़ी उम्मीद हैं।

(माइकल नोवाक अमेरिकन इंटरप्राइज इंस्टिट्यूट में रिलिजन, फिलॉसफी एंड पब्लिक पॉलिसी के जॉर्ज फेडरिक जुइट स्कॉलर हैं। वह 25 से ज्यादा किताबें लिख चुके हैं।)