निर्भर करता है - जॉन ग्रे

खुली बाजार व्यवस्था नैतिकता के कुछ पहलुओं को बर्बाद भी करती है और कुछ को बेहतर भी बनाती है। अब इसके नतीजे अच्छे हैं या बुरे या संतुलन में हैं, यह काफी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि अच्छी जिंदगी को कोई किस तरह से देखता है।

बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है कि क्या कोई यह मानने के लिए तैयार है या नहीं कि दूसरी आर्थिक व्यवस्था अच्छा कर सकती है। इस सवाल का सही जवाब केवल तभी मिल सकता है, जब हम उनकी तुलना असल विकल्पों से करें और समझें कि किस तरह अलग-अलग व्यवस्था अलग-अलग तरह के मानवीय चरित्र का विकास करती है।

यह महत्वपूर्ण है कि हम आदर्श मॉडल के बारे में सोचने से परहेज करें। हाल के दिनों में सोचने की आदत हो गई है कि अर्थव्यवस्ता में सरकारी दखल खत्म करते ही खुली बाजार व्यवस्था अचानक से उभर आती है। लेकिन खुले बाजार का मतलब सिर्फ सरकार की गैरमौजूदगी नहीं है। बाजार एक व्यवस्था से चलता है, जो यह तय करती है कि किस चीज का व्यापार हो सकता है और किसका नहीं। दासप्रथा, ब्लैकमेल, और चाइल्ड पोर्नोग्राफी जैसी चीजों की आज की अर्थव्यवस्था में कोई जगह नहीं हैं। खुली बाजार व्यवस्था में इस तरह के नैतिक मूल्य हमेशा होते हैं, जिसकी निगरानी सरकार करती है। यूं समझें कि खुली बाजार व्यवस्था संपदा अधिकार पर निर्भर करती है, जिसे अक्सर सरकार ही बनाती है और लागू भी करती है।

मध्य विक्टोरिया कालीन इंग्लैड में जो खुली बाजार व्यवस्था थी, वह इसलिए वजूद में नहीं आई क्योंकि सरकार ने अर्थव्यवस्था से अपने हाथ खींच लिए थे बल्कि इसलिए कि सरकारी ताकत का इस्तेमाल जमीन का निजीकरण करने और कई तरह के साझा मालिकाना हक दिलाने में हो रहा था। बगैर सरकारी नियंत्रण के निजी कंपनियों के कारोबार वाली अर्थव्यवस्था 19वीं शताब्दी में कुछ दशक के लिए इंग्लैंड में अस्तित्व में इनक्लोजर एक्ट के जरिए आई थी।

संसद की मंजूरी से यह व्यवस्था 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में शुरु हुई थी। उस दौरान वहां कंट्रीसाइड वाले इलाके से किसानों को हटाकर उद्योग धंधों के लिए काम करने वालों का एक तबका तैयार किया गया। यह खुली बाजार व्यवस्था का मानवीय आधार था। लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में जब लोकतांत्रिक मताधिकार पद्धति का विकास हुआ तो इन कामगारों ने आर्थिक गतिबिधियों को कंट्रोल करने के लिए नियम-कायदे की बात करनी शुरु कर दी। आखिर नतीजा एक संगठित बाजार के तौर पर आया, जो आज ब्रिटेन और दुनिया के कई अन्य देशों में दिखाई देता है।

इसे ऐतिहासिक नजरिए से देखना भी उपयोगी होगा क्योंकि इसके जरिए हम यह जान सकेंगे कि आर्थिक व्यवस्था भी किसी जिंदा प्राणी की तरह ही होती है। सच पूछिए तो बाजार शायद ही अर्थवेत्ताओं के बनाए मॉडल के हिसाब से चलती है। कभी उसमें उतार आता है तो कभी चढाव कभी वह छलांग लगाता है तो कभी धड़ाम से गिरता है। यह केवल अर्थशास्त्र की किताबों में ही लिखा है कि बाजार खुद पर नियंत्रण रखते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो अर्थशास्त्र और नैतिकता के बीच के संबंध को और साफ तरीके से देखा जा सकता है। खुली बाजार व्यवस्था में चरित्र के जिस पहलु को सबसे ज्यादा इनाम मिलता है, वह है उद्यमी के तौर पर बिंदासपन और पूर्वभास, जुआ लगाने की ताकत और नए अवसरों को बनाने और उन्हें पाने की क्षमता। यहां यह जानना जरुरी है कि इन खासियतों की परंपरावादी तारीफ नहीं करते।

हो सकता है धीर-गंभीर, मितव्ययी और जाने-पहचाने तरीके से जिंदगी को धीरे-धीरे आगे ले जाने का स्वभाव ताऱीफ के काबिल हो लेकिन खुली बाजार व्यवस्था में सामान्यतया वह कामयाबी नहीं दिला पाती है।

सच्चाई तो यह है कि जब बाजार में जोरदार उतार-चढाव चल रहा हो, उस वक्त इस तरह का स्वभाव बर्बाद कर सकता है। अपने हुनर का विकास करना, एक जगह से दूसरी जगह जाकर काम करना, करियर का फील्ड बदल लेना, खुली बाजार व्यवस्था में लोगों के बने रहने और आगे बढने में काफी मददगार साबित होता है। लेकिन इस तरह जोखिम मोल लने की आदत परंपरागत मूल्यों के साथ तालमेल बिठा पाए, यह मुमकिन नहीं।

खुली बाजार अर्थव्यवस्था के जनकों में से एक एडम स्मिथ भी वाणिज्यिक समाज के बहुत बडे आलोचक थे। स्मिथ को इस बात का डर था कि उनके समय में जो बाजार अर्थव्यवस्था उभर रही थी, वह कामगारों को बीच शहर में ऐसे नहीं छोड़ दे कि उनका सामुदायिक जुड़ाव नहीं हो पाए। जैसे उन्होंने सोचा था, बाजार किस-किस चीज को तबाह कर सकता है उसे बाजार की जगह देखकर तय किया जाना चाहिए। खुली बाजार व्यवस्थाबहुत ज्यादा इधर-उधर आने-जाने के साथ-साथ, मुनाफा नहीं दे पाने वाले रिश्तों से बहुत जल्दी बाहर निकलने की मांग करती है। एक ऐसी सोसायटी जिसमें लोगों को एक जगह से दूसरी जगह आना-जाना लगा रहता है, वह स्थायी परिवार वाली सोसायटी कैसे बन सकती है... उससे नियम-कानून मानने की कितनी उम्मीद की जा सकती है।

आखिरकार इस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि कोई अच्छी जिंदगी को किस तरह से देखता है। परंपरावादी जिसे परिवार का टूटना कहते हैं, हो सकता है उदारवादी उसे निजी आजादी का नाम दें। उदारवादियों के लिए निजी पसंद अच्छी जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा है... जबकि परंपरावादी मूल्यों और संस्थाओं के संरक्षण को सबसे ज्यादा अहमियत दे सकते हैं। समकालीन पश्चिमी समाज के परिप्रेक्ष्य में मैं उदारवादी नजरिए का हिमायती हूं। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि इन दोनों में कोई कौन-सी राह चुनता है, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण हैखुली बाजार व्यवस्था कुछ नैतिक मूल्य का विकास करती है लेकिन कुछ को कम भी करती है। अगर वह निजी पसंद को बंधनों से मुक्त करती है तो वहीं दूसरी तरफ कुछ परंपरागत मूल्यों को बर्बाद भी करती है। किसी के पास सब कुछ नहीं हो सकता है।

खुली बाजार व्यवस्था के नैतिक खतरों का मतलब यह नहीं है कि अर्थव्यवस्था की  दूसरी प्रणाली बेहतर है। एकीकृत व्यवस्था ने भी नैतिकता को काफी बर्बाद किया और कर्मठता और उत्पादकता के हिसाब से उसके फायदे भी मुकाबले में कम थे। पूर्व सोवियत संध की नियोजित अर्थव्यवस्था कुछ हद तक कामयाब रही क्योंकि उसमें ब्लैक और ग्रे मार्केट की पहेली उलझी हुई थी। भ्रष्टाचार हर जगह फैला हुआ था।

मार्क्स के मॉडल के हिसाब से बाजार में लालच के चलते फैलने वाली कुव्यवस्था को दूसरों के हितों की रक्षा के लिए बनाई अच्छी योजना से बदल दिया गया। लेकिन हकीकत में सोवियत समाज में जिंदगी सरकारी नियंत्रण से बाहर निजी बाजार व्यवस्था जैसी ही थी। वह एक ऐसी व्यवस्था थी, जिसमें हर एक आदमी ऊपर बने रहिए संघर्ष कर रहा था।

--इंसान के लिए इंसान भेड़िया—नियम था । दूसरों के हितों की रक्षा अपवाद थी। ऐसी हालत में केवल वे लोग अच्छा कर पाए जिनके अंदर खराब स्थिति में भी खुद को बचाने की क्षमता थी और अंदर नैतिकता कम थी।

कोई भी आर्थिक व्यवस्था नैतिकता के हर पहलू को बढ़ा नहीं सकती। हर व्यस्था की अच्छाई बुराई बहुत कुछ उसके उद्देश्य पर निर्भर करती है, जिसकी नैतिकता पर सवाल उठाए जा सकते हैं। लालच और र्इर्ष्या बुरी बातें हो सकती है लेकिन वे भी आर्थिक विकास में उत्प्रेरक का काम करते हैं। एक आर्थिक व्यवस्था तब तक अच्छी है, जब वह इंसान की कमजोरियों का इस्तेमाल मानव कल्याण के लिए करती हैं। पसंद खुली बाजार अर्थव्यवस्था और सेंट्रल प्लैनिंग के बीच नहीं है। इतिहास भी गवाह है कि इन मॉडलों की जैसी कल्पना की गई थी, वैसे मॉडल कहीं नहीं लागू हो पाए। असली पसंद बाजार और व्यवस्था के अलग-अलग खासियत को एक जगह लाने में हैं, जिससे नुकसान होने के डर कम से कम हो। अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए एक आदर्श मॉडल को लागू कर एक संजीदा मॉडल नहीं बनाया जा सकता है। अलग-अलग ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में अलग-अलग चीजों को जोड़कर एक अच्छी अर्थव्यवस्था बनाई जा सकती है। लेकिन एक बात साफ है कि एक आधुनिक बाजार अर्थव्यवस्था नैतिकता का पतन किए बगैर नहीं चल सकती।

(जॉन ग्रे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में एमेरिटस प्रोफेसर हैं।)