डाक क्षेत्र में एकाधिकार समाप्त हो...

केंद्र सरकार के एक कार्यसमूह द्वारा देश के डाक सेवा क्षेत्र में बेहतर परिणाम के लिए डाक विभाग के एकाधिकार को समाप्त करने का सुझाव दिया गया है। डाक क्षेत्र में सेवा की गुणवत्ता बढ़ाने के संदर्भ में कार्यसमूह द्वारा दिया गया यह सुझाव कई मायनों में स्वागत योग्य है। कार्य समूह की इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को और बढ़ाने और डाक विभाग के एकाधिकार को खत्म करने की सिफारिश इसलिए भी सराहनीय है क्योंकि इस संदर्भ में जो कानून चला आ रहा है वह अंग्रेजी शासन काल का है और ११० साल से भी अधिक पुराना है। वैश्विकरण के दौर में यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि सेवा के किसी क्षेत्र में वांछनीय गुणवत्ता की प्राप्ति तबतक नहीं हो सकती जबतक कि वहां खुली प्रतियोगिता की संभावना न के बराबर हो। बदकिस्मती से देश की डाक सेवा प्रणाली में वर्तमान में एकाधिकार की सी ही स्थिति है। यहां भारतीय डाकघऱ अधिनियम १८९८ के प्रभावी होने के कारण सरकारी डाक विभाग को छोड़ अन्य निजी कंपनियों के लिए करने को कुछ भी नहीं। जबकि डाक विभाग की कार्य संपादन में सुस्ती जगजाहिर है। इसके अतिरिक्त आजादी के बाद विशेषकर वैश्विकरण के युग में अब ११ दशक पुराने उस अधिनियम का व्यवहारिक रूप से कोई औचित्य नहीं रह जाता है जिसमें प्रतियोगिता की कोई गुंजाईश ही नहीं है। हालांकि कार्यसमूह की ओर से यह सलाह उस समय आई है जबकि केंद्रीय संचार मंत्री कपिल सिब्बल डाकघरों को बैंक के रूप में तब्दील कर यहां कार्य में गुणवत्ता बढ़ाने की तैयारियों में जुटे हुए है।

डाक सुधार पर सुझाब देने के लिए केंद्र सरकार द्वारा गठित कार्यसमूह ने इस क्षेत्र में डाकघरों के एकाधिकार को समाप्त करने की सिफारिश की है। समूह का मानना है कि कार्य में सुधार तबतक संभव नहीं है जबतक कि इस क्षेत्र में काम करने वाले फर्मों (कूरियर सेवा) को काम करने के समान अवसर नहीं प्रदान किए जाते हैं। कार्यसमूह के मुताबिक डाक क्षेत्र में किसी कंपनी का एकाधिकार नहीं होना चाहिए। हालांकि समूह यह मानता है कि बाजार में किसी एक कंपनी का दबदबा हो सकता है लेकिन उनका यह मानना है कि इस दबदबे का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए और इस पर लगाम लगाने की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए। गौरतलब है कि उद्योग जगत काफी समय से भारतीय डाक विभाग के विभिन्न कार्यों को अलग-अलग करने की मांग करता रहा है। उद्योग जगत के मुताबिक कार्यों के अलग अलग बंटवारें से जहां काम करने के समान अवसर पैदा होंगे वहीं इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा भी बढ़ेगी। एक समाचार एजेंसी से बातचीत में फिक्की के अतिरिक्त निदेशक राजपाल सिंह ने भी डाक विभाग के नीति निर्माण, नियमन व सेवा प्रदान करने के कार्यों को अलग-अलग करने की मंशा जाहिर की है। राजपाल सिंह के मुताबिक डाक विभाग की तीनों शाखाओं को अलग-अलग करने की जरूरत है ताकि काम करने के समान अवसर पैदा किए जा सकें। विदित हो कि भारतीय डाक विभाग डाक क्षेत्र में नीति निर्माता, नियामक व सेवा प्रदाता के तौर पर कार्य कर रहा है। फिलहाल इंडिया पोस्ट को छोड़कर कोई अन्य फर्म देश में वाणिज्यिक तौर पर किसी किस्म की चिट्ठी पहुंचाने का काम नहीं कर सकता है। यह स्थिति भारतीय डाकघर अधिनियम १८९८ कानून के प्रभाव में होने के कारण है। यदि कार्यसमूह की सिफारिशों पर अमल किया जाता है तो इस सौ साल से अधिक पुराने कानून में संशोधन करने की आवश्यकता होगी।

- अविनाश चंद्र