आर्थिक सुधारों की चुनौती

प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को नई आर्थिक ऊंचाई पर पहुंचाने और उसे वैश्विक समुदाय में विशिष्ट दर्जा दिलाने की बात कह कर हमारी अपेक्षाओं को बढ़ा दिया है। मोदी ने हाल ही में तीन देशों की यात्र की जहां उन्हें न केवल अनिवासी भारतीयों, बल्कि जी-20 देशों से भी अप्रत्याशित समर्थन मिला। इस बारे में उन्हें यह भी समझना होगा कि उनसे लोगों को बहुत सी अपेक्षाएं हैं और इन्हें पूरा करने के लिए बहुत मेहनत करने की आवश्यकता होगी। हालांकि विश्वास यही है कि वह इस काम को पूरा कर सकेंगे। हम 1.2 अरब लोग इस बात को लेकर बहुत उत्साहित हैं, लेकिन थोड़ा-बहुत चिंतित अथवा शंकालु भी हैं। हालांकि पूर्व में भी इस तरह की उम्मीदों का एक लंबा इतिहास रहा है, लेकिन इन्हें धरातल पर उतारने की दिशा में कुछ खास नहीं किया जा सका। इस क्रम में हम 1962, 1975, 1989, 1996, 2004 के साथ-साथ 2009 को देख सकते हैं। बढ़त की वर्तमान स्थिति के बाद यदि हमें एक बार और गिरावट देखने को मिली तो इसके परिणाम बहुत ही खराब होंगे। ऐसा इसलिए, क्योंकि वर्तमान की तरह पूर्व में कभी भी इस तरह की उम्मीदें, अपेक्षाएं और विश्वास नहीं रहा है।
 
प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों की उम्मीदों को बहुत अधिक बढ़ा दिया है। इन उम्मीदों पर खरा उतरने में समय लगेगा। सवाल यही है कि क्या इस बार हम इसे हासिल कर सकेंगे? मोदी अक्सर सुधारों की बात करते हैं और इसे गरीबों के लिए अनिवार्य रूप से फायदेमंद बताते हैं, लेकिन इस काम को लोगों के समर्थन से ही किया जा सकता है। इन बातों से हम घरेलू सुधारों के एजेंडे को आगे बढ़ाने के उनके नजरिये को समझ सकते हैं। सुधारों के प्रति लोगों का समर्थन हासिल करने पर जोर दिया जाना पूर्व की नीतियों से बिल्कुल अलग है जब सुधारों के काम को चोरी-छिपे अथवा चुपचाप अंजाम दिया जाता था। वर्तमान में तीव्र राजनीतिक स्पर्धा वाले हालात में मीडिया के जबरदस्त प्रभाव को देखते हुए यह जरूरी है कि सुधार से संबंधित कदमों को लेकर व्यापक तौर पर विचार-विमर्श किया जाए और जनता का भी समर्थन हासिल किया जाए। लोकप्रियता और महज अलंकारिक बातों से जनता को अधिक लंबे समय तक नहीं लुभाया जा सकता। राजनीतिक नेतृत्व और वरिष्ठ नौकरशाह मोदी का अनुकरण कर रहे हैं। लोक कल्याण के हित में और इसे बढ़ाने के उद्देश्य से बाजार संबंधी सुधार तात्कालिक रूप से लोगों को लाभकर नहीं प्रतीत होंगे।
 
सुधारों के पक्ष में लोगों को तैयार करना एक बहुत ही दुष्कर काम है और मोदी भारत में इस जटिल वास्तविकता को अच्छी तरह समझते हुए ही कदम उठा रहे हैं। यदि वह इस काम में सफल होते हैं तो वह दुनिया के उन कुछ चुनिंदा वैश्विक नेताओं में शामिल होंगे जिन्होंने अपने देश के भाग्य को बदला। उन्हें इस बात को समझना होगा कि भारत अपने साहसिक प्रयासों से ही बाजार नियंत्रित व्यवस्था के माध्यम से निजी क्षेत्र के नेतृत्व में एक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में तब्दील हो सकता है। देंग श्याओ पिंग, मार्गरेट थैचर, ली कुआन यू जैसे नेताओं को अपने साथ जनता को लेने की आवश्यकता नहीं हुई और जितना अधिक हो सका वह सुधारों की लंबी प्रक्रिया में अंतिम समय सकारात्मक अथवा बेहतर परिणाम देते रहे। मोदी को समझना होगा कि उन्हें उतनी अधिक स्वतंत्रता हासिल नहीं है। मजबूत भारतीय मीडिया और राज्यों के चुनावों में कोई भी नकारात्मक जनादेश इस तरह के सुधारों को बीच समय में ही रोक सकता है। इसलिए यह आवश्यक है कि वह सुधारों के लिए अनिवार्य रूप से जनमत को तैयार करें और लोगों को बताएं कि ये सुधार देश की एक बड़ी आबादी के लिहाज से फायदेमंद हैं। यदि उनके ही शब्दों को आगे बढ़ाएं तो लोग सुधारों के काम को आगे नहीं बढ़ने देंगे और इस सबके परिणामस्वरूप विरोध के स्वर और गहरे होंगे तथा राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष बढ़ेगा।
 
मोदी की रणनीति को इस रूप में क्रियान्वित नहीं किया जाना चाहिए कि देश में धीमे, आंशिक और क्रमिक सुधारों के लक्ष्य को चुना जाए। मोदी जानते हैं कि फिलहाल भारत में अभी बिजनेस पर्याप्त और साहसिक नहीं है। लीक से हटकर कदम उठाकर ही आगामी 15 सालों तक प्रति वर्ष के हिसाब से लगातार 1.2 करोड़ रोजगारों का सृजन किया जा सकता है। हालांकि इन साहसिक कदमों और सुधारों के लाभ को प्रचारित करना होगा और जनता के बीच इसे स्वीकार्य बनाना होगा। नरेंद्र मोदी इस काम को निजी क्षेत्र के नेतृत्व में, बाजार आधारित व्यवस्था के माध्यम से और पारदर्शी शासन द्वारा संभव बना सकते हैं। पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी ने केंद्र नियोजित समाजवादी अर्थव्यवस्था को लागू करने के लिए जिस तरह की दृढ़ता और व्यवहार कुशलता से काम किया था कुछ उसी तरह मोदी को भी काम करना होगा। यदि वे दोनों निजी उद्यमिता की सदियों पुरानी व्यवस्था को देश में लागू कर सके थे तो कोई कारण नहीं कि मोदी भी कुछ उसी तरह निजी क्षेत्र के समर्थन से खुली बाजारवादी अर्थव्यवस्था को लागू नहीं कर सकें।
 
इस संदर्भ में एक उदाहरण देना उपयोगी होगा। अब यह भलीभांति साफ है कि सर्वसम्मति से संसद से पारित किया गया वर्तमान स्वरूप वाला भूमि अधिग्रहण कानून देश में विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ाने में एक बड़ी बाधा है। यहां नहीं भूलना चाहिए कि संसद में महज भयंकर जनादेश के बल पर इस कानून में आवश्यक सुधार करना भी खतरनाक होगा। एक बेहतर संवादकर्ता होने के बावजूद मोदी अपने रेडियो कार्यक्रम मन की बात और दूसरे अन्य संबोधनों के माध्यम से राष्ट्र के समक्ष यह स्पष्ट कर सकते हैं कि प्रस्तावित सुधारों पर अमल से विनिर्माण क्षमता का विस्तार होगा और लोगों के लिए वास्तविक रोजगार का सृजन करना संभव होगा। इसके साथ ही उनकी पार्टी के प्रवक्ता भी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से इस संदेश को प्रसारित करें। इस तरह से न्यूनतम राजनीतिक लागत पर बदलाव संभव हो सकेगा।
 
यह समय अधिक से अधिक संसाधनों को जुटाने और लोगों के बीच सुधार के लिए समुचित माहौल बनाने का है। सुधारों को गति देने की इच्छा रखने वालों को महज आलोचना, विरोध और चापलूसी के बजाय इस काम में सरकार का साथ देना चाहिए और लोगों को इसके लिए तैयार करना चाहिए। आर्थिक सुधारों को तेजी से लागू करने के लिए ठोस और सामूहिक पहल की आवश्यकता है, क्योंकि पिछले छह दशकों से भारतीयों को निजी क्षेत्र पर अविश्वास करना सिखाया गया और केंद्र नियोजित अर्थव्यवस्था को ही आगे बढ़ाया गया। निजी क्षेत्र को भी अपनी भूमिका निभानी चाहिए। इसके लिए स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी चाहिए कि वह निजी क्षेत्र के भारतीय व्यवसायियों को समझाएं अथवा तैयार करें कि अच्छी तरह व्यवस्थित और पारदर्शी बाजार अर्थव्यवस्था को क्रोनी कैपिटलिज्म के बजाय लोगों का कहीं अधिक समर्थन हासिल हो सकता है।
 
 
- राजीव कुमार (लेखक सेंटर फॉर पॉलिसी र्सिर्च में सीनियर फेलो हैं)
साभारः दैनिक जागरण