किसान आंदोलनः सख्त फैसलों को विनम्रता से लागू करें

आंदोलन कर रहे किसानों की छवि संतों अथवा पापियों के रूप में गढ़ी जा सकती है। 1960 के दशक में जब देश भुखमरी की समस्या से जूझ रहा था तब उन्होंने हरित क्रांति की अगुवाई करके न केवल भारत को खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर बनाया बल्कि एक निर्यातक देश के तौर पर भी स्थापित किया। इसके लिए उन्हें नायक कहा जाना बिल्कुल उचित था।

लेकिन कम वर्षा वाले राज्य में चावल जैसे अत्यधिक पानी की जरूरत वाले फसलों को उगा कर पंजाब के किसानों ने भू जल स्तर को नाटकीय ढंग से कम कर दिया। इससे छोटे किसानों के कम गहरे ट्यूबवेल सूख गए। छोटे किसानों और भू जल स्तर को नुकसान पहुंचा जबकि गहरे ट्यूबवेल से युक्त अमीर किसानों ने मुनाफा कमाया। इसके अतिरिक्त, अब उन्होंने गेंहू की फसल की जल्दी बुआई के लिए अक्टूबर नवंबर के महीनों में फसल काटने के बाद खेतों में बची पराली को भी जलाना शुरु कर दिया है। इससे होने वाले धुंए और प्रदूषण के कारण दिल्ली और आस पास के हजारों लोग बीमार होते हैं और अपनी जान गंवाते हैं। महज कुछ अतिरिक्त पैसों के लिए किसान जान बूझ कर प्रदूषण फैलाने को न्यायसंगत मानते हैं जो कि नैतिक रूप से अपराध है।

पंजाब के किसान राजनीति में अच्छा खासा दबदबा रखते हैं और बड़े पैमाने पर सब्सिडी प्राप्त करते हैं जिसे जनता देख नहीं पाती है। अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी के द्वारा किये गए खुलासे के मुताबिक पंजाब के किसान बिजली के लिए प्रति वर्ष 8,275 करोड़ रुपये की सब्सिडी प्राप्त करते हैं और उर्वरक की सब्सिडी के तौर पर उन्हें 5000 करोड़ रुपये प्राप्त होते है। कृषि कार्य योग्य जमीन वाले प्रति व्यक्ति के हिसाब से यह औसतन 1.22 लाख रुपए पड़ता है। इसके अलावा, उन्हें सस्ते दर पर उधार और प्रधानमंत्री किसान अनुदान भी प्राप्त होता है। कृषि कार्य से होने वाले उच्च आय के कारण उनके जमीन की कीमत भी काफी अधिक हो जाती है और यह 50 लाख रुपये से 100 लाख रुपये प्रति एकड़ तक पहुंच जाती है। जमीन के अत्यधिक महंगे होने के कारण पंजाब में उद्योगों के क्षेत्र में निवेश काफी कम होता है।

भारत में प्रति व्यक्ति कृषि योग्य भूमि की उपलब्धता औसतन केवल एक एकड़ ही है। अतः समृद्धि हासिल करने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि किसान कृषि कार्य से निकल कर उद्योग और सेवा के क्षेत्र में कार्य करे। लेकिन पंजाब में एक हैक्टर जमीन की कीमत 1.25 करोड़ रुपये से 2.5 करोड़ रुपये तक होती है! भले ही यह उन्हें दिखाई न दे, लेकिन दिल्ली के आस पास के आंदोलनकारी किसान प्रति वर्ष मिलने वाली सब्सिडी के हिसाब से लखपति हैं और संपत्ति के आधार पर करोड़पति।

चीन के जैसी निरंकुश शासन व्यवस्था में ऐसे आंदोलनकारियों को कुचल दिया जाता। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंदोलनकारियों को गोलियों से उड़ाया नहीं जाता। यदि आंदोलनकारियों की संख्या बड़ी है और वे चुनावों में अपना प्रभाव रखते हैं तो ऐसी स्थिति में राज्य उनके साथ समझौता कर लेते हैं। यही कारण है कि किसान यूरोप, अमेरिका, जापान और कोरिया जैसे देशों में भारी सब्सिडी हासिल करते हैं। ऐसा करने वाला भारत इकलौता देश नहीं है। 

पंजाब के आंदोलनकारी किसान चाहते हैं कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी कृषि सुधार के लिए लाए गए तीनों कानूनों को निरस्त कर दें। लेकिन ये अत्यधिक समझदारी भरे कानून हैं। इनमें से एक कानून किसानों को उनकी उपज भारत में कहीं भी बेचने की अनुमति देता है न कि सिर्फ सरकारी मंडियों में जहां उन्हें कर चुकाना पड़ता है और कमीशन देना होता है। दूसरा कानून अनुबंध आधारित कृषि के लिए ढांचे को तैयार करता है जो कि स्वेच्छा पर आधारित है और परस्पर लाभकारी है। तीसरा कानून उस आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन करता है जो ऐतिहासिक तौर पर कृषि उत्पादों को राज्यों से बाहर ले जाने और व्यापारियों को अपने पास भंडारण करने से रोकने का कार्य करता था। इस प्रावधान ने व्यापारियों के लिए वैश्विक स्तर के वेयरहाउसों के निर्माण को असंभव बना दिया था। उत्पाद भंडारण की मात्रा सीमित करने से संबंधित राज्य सरकारों की कोई भी घोषणा वेयरहाउसों के मालिकों को तत्काल अपराधी बना देती हैं। कृषि उत्पादों को देश में कहीं भी बेचने की आज़ादी कृषि कार्य के मौलिक अधिकारों में शामिल किया जाना चाहिए। और भंडारण की सीमा के निर्धारण को समाजवादी डायनासोर के तौर पर देखा जाना चाहिए जो आधुनिक वेयरहाउस सिस्टम को बर्बाद करता है। मोदी को इन तीनों कानूनों के साथ खड़े रहना चाहिए।

सरकार द्वारा गेंहू और चावल को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीदने के कार्य ने पंजाब के किसानों को लाभान्वित किया है। ऐसा अन्य फसलों के साथ नहीं किया गया। केवल 6 प्रतिशत भारतीय किसानों को ही एमएसपी का लाभ मिलता है, जिनमें से अधिकतम पंजाब के हैं और अपना दबदबा रखते हैं। मोदी ने आश्वासन दिया है कि नए सुधारों के बावजूद एमएसपी जारी रहेगा लेकिन किसानों को डर है कि नए प्रावधान एमएसपी समाप्त करने की राह में पहला कदम है और इसलिए वे चाहते हैं कि कानूनों को समाप्त कर दिया जाए। चावल और गेंहू का सरकारी भंडारण पहले से ही आवश्यक भंडारण क्षमता के तीन गुने से भी अधिक है। चौंकाने वाली बात यह है कि लेखा परीक्षण में सरकारी गोदामों से प्रति वर्ष लाखों टन अनाज चोरी होने अथवा चूहों द्वारा बर्बाद किये जाने की जानकारी भी लगातार सामने आती रहती है।

जब तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) वैश्विक कीमतों से कम होगा तब तक अधिशेष निर्यात किया जा सकेगा। लेकिन जब राजनीति के कारण एमएसपी वैश्विक कीमतों से ऊपर हो जाता है तो अनाज गोदामों में बेकार पड़े रह जाते हैं। इसके बाद ये न तो भारतीयों के और न ही दुनिया के और लोगों के खाने के काम आते हैं। किसानों को ऐसी चीजों को पैदा करने के लिए सब्सिडी प्रदान करना बेवकूफी ही है जो न तो भारतीयों के काम आते हों और न ही दुनिया के काम आते हों। एमएसपी को बरकरार रखिए लेकिन हर हाल में इसे वैश्विक कीमतों से जुड़ा होना चाहिए। सभी विशेषज्ञ इस बात से इत्तेफ़ाक रखते हैं कि बड़ी तादात में किसानों को कृषि कार्य से बाहर निकलना होगा जिससे खेतों का आकार और उससे होने वाली आय दोनों में वृद्धि हो सके। दूसरी बात ये कि पंजाब के किसानों को उच्च कीमतों वाले फलों, सब्जियों और दुग्ध के उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इससे चावल और गेंहू के उत्पादन में भारी मात्रा में खपत होने वाले पानी की आवश्यकता नहीं रहेगी और पराली जलाने के मामलों में भी कमी आएगी। 

लेकिन यह सब दीर्घ कालीन लक्ष्य हैं। अभी के लिए, मोदी को आंदोलनकारियों को इंतज़ार कराना चाहिए। आंदोलनकारियों को गर्माहट भरी मुस्कुराहट देनी चाहिए, उन्हें बताना चाहिए कि वे हृदय से उनके साथ हैं। उन्हें एमएसपी जारी रहने का विश्वास दिलाना चाहिए और किसानों को विपक्षी राजनेताओं के द्वारा भ्रमित किये जाने के प्रति जागरुक भी करना चाहिए। वास्तव में रबि की फसल के दौरान बतौर बोनस बड़ी मात्रा में गेंहू की खरीद करनी चाहिए। उन्हें किसानों को नरम शब्दों के साथ प्रेरित करना चाहिए लेकिन सुधार के अपने समझदारी भरे फैसले के साथ दृढ़ता से खड़े रहना चाहिए।

- आज़ादी.मी

स्वामीनाथन अय्यर