एनईपीः मोदी सरकार ने स्कूली शिक्षा में बदलाव लाने का अवसर खो दिया!

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पांच साल का अपना कार्यकाल अगले चार महीने में पूरा करने जा रही है। लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण है कि सरकार इन पांच वर्षों में क्या हासिल करने में सफल रही। सरकार ने कई क्षेत्रों में सुधार पेश किए हैं लेकिन देश भर में स्कूली शिक्षा प्रणालियों में एक बड़ा बदलाव लाने में विफल रही है।

देश को पहली बार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968 में और दूसरी 1986 में मिली। बाद में इसे 1992 में संशोधित किया गया। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत में भारी बदलाव आया है। बदलावों को देखते हुए देश की शिक्षा नीति में आमूल चूल बदलाव करना अब अनिवार्य हो गया है।

वर्ष 2014 में भारी भरकम जनादेश हासिल कर सत्ता में आई सरकार से उम्मीद की गई थी कि वह बीमार स्कूली शिक्षा क्षेत्र में सुधार के लिए कड़े कदम उठाएगी। इसने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी के नेतृत्व में नई शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया शुरू भी की। नई नीति तैयार करने के लिए अपनाई गई यह प्रक्रिया बहुत महत्वाकांक्षी थी। इस प्रक्रिया के दौरान 13 विभिन्न विषयों के तहत इनपुट के लिए गांव, जिला और राज्य स्तर पर परामर्श कार्य शुरू किया गया। लेकिन देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाने के लिए अत्यंत जरूरी यह प्रक्रिया शुरुआत के तुरंत बाद ही खराब योजना और राजनीति की शिकार हो गई।

सबसे पहले, केवल कुछ राज्य सरकारों ने ही कंसलटेंसी मीटिंग्स का आयोजन किया, जो इस प्रक्रिया को अधूरा कर रही थीं। दूसरे, छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों और विभिन्न समुदायों से इनपुट लेने के प्रावधान की भी आलोचना की गई क्योंकि प्रक्रिया के दौरान बेकार इनपुट्स प्राप्त हुए थे। अंततः शुरुआती कंसल्टेंसी से प्राप्त हुए लगभग 60,000 इनपुट्स को सार्थक हस्तक्षेपों में संकलित किया गया जिससे इस पूरी प्रक्रिया की पवित्रता पर सवाल भी उठें।

प्रक्रिया की अव्यवहारिकता को महसूस करते हुए एमएचआरडी ने शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने के लिए वर्ष 2015 में टी. एस. आर. सुब्रह्मणियन की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति का गठन किया। समिति ने शिक्षा की स्थिति का अध्ययन करने के लिए एक नई प्रक्रिया विकसित की और परामर्श की एक विस्तृत श्रृंखला का संचालन किया। समिति ने मई 2016 में एनईपी के अपने अनुशंसित मसौदे को एमएचआरडी को सौंप दिया। इस अनुशंसित मसौदे को कभी भी एमएचआरडी द्वारा औपचारिक रूप से सार्वजनिक नहीं किया गया। लेकिन यह मसौदा बाद में लीक हो गया। 

जुलाई 2016 में प्रकाश जावड़ेकर ने स्मृति ईरानी की जगह एचआरडी की कमान संभाली। एमएचआरडी ने फिर से ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लिए कुछ इनपुट्स’ नामक दस्तावेज प्रकाशित किया और लोगों से 30 सितंबर 2016 तक सुझाव मंगाए।

जून 2017 में डॉ के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में नई शिक्षा नीति का अंतिम मसौदा तैयार करने के लिए एक नई समिति का गठन किया गया। समिति को दिसंबर 2017 तक अंतिम मसौदा प्रस्तुत करना था। हालांकि बाद में समय सीमा को 15 दिसंबर 2018 तक बढ़ा दिया गया। दुर्भाग्य से इस लेख के लिखे जाने तक इस मामले में कोई प्रगति नहीं हो सकी है। आगामी महीनों में होने वाले आम चुनावों के मद्देनजर राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बाबत कुछ ठोस कदम उठाए जा सकेंगे इसे लेकर विशेषज्ञ आशान्वित नहीं हैं।

इस प्रकार, भारी भरकम उम्मीदों और पूर्ण बहुमत के साथ आई इस सरकार ने भारत में स्कूली शिक्षा प्रणाली में एक संस्थागत परिवर्तन लाने का सुनहरा अवसर करीब करीब गंवा दिया है।

- डा. अमित चंद्रा (लेखक शिक्षा मामलों के विशेषज्ञ हैं)

फोटोः नेटवर्क18.कॉम से साभार