क्या है मोदी का विकास का माडल? ---(2)

वैसे मोदी के विकास माडल पर सवाल खड़े करनेवालों की कोई कमी नहीं है। उनकी सबसे बड़ी दलील यह है कि गुजरात में विकास कोई नई बात नहीं है मोदी से पहले के दो दशकों में भी अन्य मुख्यमंत्रियों के शासन में भी तेजी से विकास हुआ इसलिए केवल मोदी को विकास का श्रेय नहीं दिया जा सकता। दूसरा मोदी गुजरात के विकास की बात करते हैं लेकिन उस कालखंड में सारे देश में तेजी से विकास हो रहा था इसलिए देश का हिस्सा होने के कारण गुजरात में भी विकास हुआ इसलिए इसमें कुछ खास और कुछ अनूटा नहीं है। फिर मोदी जिस उच्च विकास दर की बात करते हैं वह तो इस कालखंड में कई और राज्यों महाराष्ट्र, तमिलनाडु और बिहार ने भी हासिल की । ऐसे में केवल मोदी को ही विकास का मसीहा या विकास पुरूष कैसे माना जा सकता है। कुछ लोग तो यह भी तर्क देते हैं कि दरअसल यह खिताब तो नीतिश कुमार को दिया जाना चाहिए जिन्होंने बिहार को चरम अव्यवस्था और पिछड़ेपन के दलदल से निकालकर वर्तमान उच्च विकासदर तक पहुंचाया। कहना न होगा कि मोदी के विरोधकों के तर्कों में भी दम है।

इस बारे में प्रख्यात अर्थशास्त्री बिबेक देवराय कहते हैं हमें यह दलील देने की इच्छा हो सकती है कि गुजरात में ऐसा कुछ खास नहीं हुआ है वह आठवी पंचवर्षीय योजना (1992-97) के समय से ही तेजी से विकास कर रहा है। हालांकि यह सही है लेकिन हमें यह मान लेना चाहिए कि जैसे-जैसे विकास होता है वैसे –वैसे उच्च विकास दर को बरकरार रखना मुश्किल होता जाता है। विकास का ह्रास होते देर नहीं लगती। तुलनात्मक रूप से गरीब राज्यों जैसे बिहार, उड़िसा, मध्यप्रदेश, असम, और झारखंड के लिए बाकी के बराबर पहुंच पाना आसान है। यदि केवल इतिहास की धारा से विकास को गति मिलती होती तो कर्नाटक को तो बहुत तेजी से विकास करना चाहिए था। उच्च विकास दर के क्षेत्र में पहुंचना महत्वपूर्ण है मगर विकास उतार-चढ़ाव को कम करना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। गुजरात की विकास दर में कम उतार चढ़ाव आए है। भारतीय स्थितियों में उतार –चढ़ाव मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र  के घटनाक्रमों के कारण आते हैं।

मोदी विकास को महत्वपूर्ण अपलब्धि माननेवाले अर्थशास्त्री इस तथ्य की तरफ ध्यान दिलाने से नहीं चूकते कि तमिलनाडु और कर्नाटक के विकास में मुख्य भूमिका सर्विस सेक्टर या आईटी की है। महाराष्ट्र के विकास का कारण है वहां का वहां देश की आर्थिक राजधानी मुंबई है। फिर महाराष्ट्र का विकास बहुत विषमतापूर्ण है वहां मुंबई ठाणे बेल्ट और पश्चिम महाराष्ट्र तो बहुत उन्नत है लेकिन बाकी महाराष्ट्र चाहे विदर्भ हो या मराठवाडा, कोंकण हो या कुछ अन्य क्षेत्र वे सब पिछड़े हुए हैं जबकि गुजरात के विकास में इतनी भारी असमानता नहीं है। फिर गुजरात के विकास के मुख्य आधार औद्योगिक औक कृषि का विकास हैं। अक्सर बड़े उद्योगपति मोदी की तारीफों के पुल बांध देते हैं। बड़े-बड़े उद्योग वहां शिफ्ट हो रहे हैं इसलिए ऐसा मान लिया जाता है कि गुजरात का विकास चंद बड़े उद्योंगों का स्थापित हो जाना भर है लेकिन यह हकीककत से कोसों दूर है

गुजरात वर्ष 2009 -10 के उद्योगों के वार्षिक सर्वे में सारे कारखाना क्षेत्र को अपने दायरे में समेटा गया है। इससे पता चलता है कि गुजरात में फैक्ट्रियों की संख्या 15576 और 9.8 प्रतिशत बढ़ी है। ये फैक्ट्रियां रसायन, रसायन उत्पाद, बुनियादी धातुएं, मशीनरी और उपकरण, नॉन मेटल मिनरल प्रोडक्ट, कपड़ा, खाद्य पदार्थ और दवा क्षेत्र के उद्योग हैं। वे सब मिलकर 12लाख लोगों को रोजगार मुहैया कराते हैं। अस्थायी आंकड़ें बताते हैं कि 2010 में फैक्ट्रियों की संख्या में 25206 तक की वृद्धि हुई है और रोजगार 13 लाख तक पहुंच गया है। गुजरात में 369 संकुलों में एक लाख तीस हजार मघ्यम और लघु उद्योग हैं। यही ढर्रा तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में भी नजर आता है। आमतौर पर क्लस्टर या संकुल उन्हें कहा जाता है जहां एक ही उत्पाद का उत्पादन सघन रूप से होता है।

वर्ष 2001 में गुजरात में 2000 मेगावाट बिजली पैदा होती थी जो उसकी अपनी जरूरत से बहुत कम थी।लेकिन 2012 के अंत में गुजरात में अतिरिक्त बिजली होगी लेकिन राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में जिस वृद्धि की उम्मीद की जा रही है उसे देखते हुए बिजली की भी मांग बढ़नेवाली है। लेकिन गुजरात केवल बिजली उत्पादन के बारे में सफलता की गाथा नहीं है वरन उसने ट्रांसमिशन और वितरण के दौरान के दौरान होनेवाले नुक्सान को भी काफी कम किया है। 2002 -03 में यह नुक्सान 35.39 प्रतिशत था जो 2006-07 में घटकर 22.20 प्रतिशत  रह गया।2010-11 में 20.13 प्रतिशत रह गया। इतना नुक्सान भी रह जाने की वजह यह है कि ट्रांसमिशन और वितरण  के दौरान के नुक्सान केवल ट्रांसमिशन और वितरण के दौरान होनेवाले नुक्सान नहीं होते उसमें बिजली चोरी और बिना मीटर की सप्लाई भी शामिल है।

इसके अलावा बिजली चोरी को आपराधिक जुर्म माननेवाला कानून बनाया गया है और उसे लागू कर दिया गया है। बिजली वितरकों को राजनीतिक दखलंदाजी से अलग रखा गया है। विशेष चैकिंग स्क्वॉड बनाए गए हैं। इसके अलावा ऐसे मीटर बनाए गए हैं जिनसे छेडछाड नहीं की जा सकती। ई ऊर्जा प्रोजेक्ट के तहत इलेक्ट्रानिक तरीके से बिल बनाने और भुगतान करने की व्यवस्था की गई है। खराब मीटर बदले गए हैं।एक बार के समझौते के तहत अनधिकृत कनेक्शनों को वैध कर दिया गया है। ज्योतिग्राम योजना के तहत सभी गांवों को तीन चरणों में बिजली सप्लाई सुनिश्चित की जाती है। (जारी)

- सतीश पेडणेकर