नरेंद्र मोदी ने बताया कड़ुवा सच - व्यापार में सरकार का क्या काम ?

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी एक अजीब शख्सियत है। पिछले एक दशक में वे  देश के सबसे विवादास्पद नेताओं में से रहें हैं। न उनसे नफरत करनेवालों की कमी है न ही उनके तारीफ के पुल बांधनेवालों की। कुछ लोगों की नजर में विनाश पुरूष है जिसने गुजरात में सांप्रदायिक सद्भावना के तानेबाने को नेस्तनाबूद कर दिया, जिसके हाथ निर्दोष मुसलमानों के खून से रंगे हैं। तो कुछ लोग उन्हें विकास पुरूष मानते हैं जिसने गुजरात के विकास को नई ऊचाइयां दीं उसे विकास का सर्वनाम बना दिया। इस बारें में कोई दो राय नहीं हो सकती कि सारे देश के लिए  विकास की मिसाल बनता जा रहा है गुजरात। लेकिन जेट गति से विकास करनेवाले मोदी की विकास के बारे में सोच क्या है इसके बारे में किसी ने गहराई से कभी पड़ताल नहीं की। लेकिन पिछले दिनों अंग्रेजी के एक आर्थिक दैनिक इकानामिक टाईम्स को दिए इंटरव्यू में अपनी विकास के बारे में सोच के बारे में बहुत खुलकर बात की। इस कारण यह इंटरव्यू काफी चर्चित भी रहा। इस इंटरव्यू का शीर्षक ही बहुत चौंकानेवाला था। शीर्षक था – Govt has no business to be in business. सरकार का काम व्यापार करना नहीं है। यह शीर्षक पढ़ने पर मोदी के नेतृत्व में हुए गुजरात के तीव्र गति से विकास का राज समझ आ जाता है। यह स्पष्ट हो जाता है कि मोदी ने सही राह पकड़ ली है इसलिए राज्य का विकास संभव हो पाया है। उन्होंने यह जान लिया है कि सरकार अच्छी व्यापारी नहीं हो सकती इसलिए उसे व्यापार करने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए लेकिन उसे ऐसा अनुकूल माहौल जरूर पैदा करना चाहिए जिसमें उद्य़मशीलता फले-फूले। जब उनसे सवाल किया गया – व्यापार में सरकार की क्या भूमिका होनी चाहिए? तो उनका जवाब था – व्यापार करना सरकार का काम नहीं है। उसे फेसीलिटेटर की भूमिका निभानी चाहिए। मेरे राज्य में  निवेशकों को राजनेताओं और नौकरशाहों को रिश्वत नहीं देनी पड़ती। हमारे यहां बहुत सुनिर्धारित नीतियां है। मेरा मानना है कि हमारा देश केवल तभी तरक्की कर सकता है  जब हम लालफीताशाही को खत्म करें। निवेशकों के प्रति हमारी एक ही नीति है कि हम उनके साथ  लालफीताशाही नहीं बरतते वरन उनके लिए  केवल लाल कालीन बिछाते हैं।

हाल ही के समय में नरेंद्र मोदी बिरले नेता है जो बहुत खुलकर यह बात कहते हैं कि व्यापार करना सरकार के बस की बात नहीं है, वह अच्छी व्यापारी नहीं हो सकती इसलिए उसे व्यापार करने के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। यह बात कोई नई नहीं है। सभी उदारवादी चिंतक यह बात कहते रहे हैं। लेकिन हमारे देश में पिछले कुछ दशकों से समाजवाद रूपी उल्टी गंगा बह रही है। हमारे देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू  समाजवाद की प्रेतबाधा हो गई थी जिसका सजा यह देश आज तक भुगत रहा है। पं. नेहरू सोवियत संघ और चीन के समाजवाद के प्रयोग से इस कदर अभिभूत थे कि वे उसे भारत में भी दोहराने की कोशिश करते रहे। सरकार हर क्षेत्र में पांव पसारने लगी। कानून बनाने और लागू करने से बहुत आगे बढ़कर सरकार व्यापारी बन गई। उद्योग धंधे चलाने लगी। इस्पात और विमान बनाने से लेकर विमान सेवाएं चलाने से लेकर दूध बेचने तक का हर काम सरकार करने लगी। वे तो इस देश की खेती का सोवियत संघ की तर्ज पर सामूहीकीकरण करना चाहते थे यह बात अलग है कि राजाजी और कुछ इन्य स्वतंत्र पार्टी नेताओं और अन्य गणमान्य हस्तियों के तीखे विरोध के कारण उन्हें अपना इरादा त्यागना पड़ा। नहीं तो इस देश के सबसे बड़े व्यवसाय कृशि का भी सत्यानाश हो जाता। लेकिन कडुवी हकीकत यह है कि सरकार लोगों को चीजें सस्तें दामों पर उपलब्ध काराने और मजदूरों को उद्योगपतियों के शोषण से बचाने के नाम पर कृषि, व्यापार और उद्योग धंधों को अपने हाथ में लेने की कोशिश भले ही करती हो लेकिन यह सब करना सरकार के बूते की बात है नहीं। नतीजतन कारखाने और उद्योग भी सरकारी दफ्तरों की तरह चलने लगे और नौकरशाही और लालफीताशाही के अड्डे बन गए और घाटे पर घाटा उगलते रहे। इस सरकारी अक्षमता की कीमत देश की जनता को बढ़े हुए टैक्सों के तौर पर चुकानी पडीं। इससे सरकार नाम की संस्था दिनोंदिनों बदनाम होती रही। वह नकारापन, अक्षमता का पर्याय बन गई। हमारे यहां लोग अक्सर मजाक में बहुत सच्ची बात कहते हैं – जो चलती है वह कार और जो घिसटती है वह सरकार। वे ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में उन्हें कदम –कदम पर उसका अनुभव होता है।

हमारे देश में समाजवाद के नाम पर न केवल सरकारी क्षेत्र सुरसा के मुंह की तरह फैलता रहा वरन उसके नाम पर लाइसेंस कोटा राज लाकर आम लोगों की उद्यमशीलता को बधिया कर दिया गया। 1991 में देरसबेर ही सही हम समाजवाद के सपने के साथ मोहभंग होने के बाद जागे और लाइसंसेंस कोटा राज का खात्मा हुआ और आर्थिक सुधारों की वसंत बयार आई, सरकार व्यापार से हाथ खींचने लगीं। देश की उत्पादक शक्तियों को पहली बार खुलकर अपना जलवा दिखाने का अवसर मिला तो विकास दर 3-4 प्रतिशत से बड़कर 9 प्रतिशत की ऊंचाइयों को छूने लगी। इसके बावजूद हकीकत यह है कि अभी समाजवादी सोच के अवशेष अब भी बरकरार है। सरकार अब भी जनकल्याण के नाम पर व्यापार और उद्योग धंधों के क्षेत्र में है। आज भी केंद्र और राज्य सरकारें हजारों छोटें बड़े उद्योग चला रहीं हैं। और बेतहाशा घाटे और भ्रष्टाचार के बावजूद सरकारे उनसे निजात नहीं पा रहीं। जो सरकारें उन्हें बेचकर मुक्त होना चाहती है उन्हें तीखी आलोचना का शिकार बनना पड़ता है। कुछ अर्से पहले मायावती ने सरकारी चीनी मिलें बेची तो उनको भारी आलोचना का निशाना बनना पड़ा। जबकि यह सही दिशा में एक सही कदम था। जो धीरे-धीरे सभी सरकारों को उठना चाहिए। लेकिन सबसे जरूरी यह है सरकारें यह समझे कि उद्योग–धंधे. और व्यापार सरकार का काम नहीं है इसलिए उसे इस क्षेत्र में टांग नहीं अड़ानी चाहिए। उसे केवल अपने को आर्थिक गतिविधियों के लिए अनुकूल बनाने का काम करने तक सीमित करना चाहिए। नरेंद्र मोदी का हमें इसलिए शुक्रगुजार होना चाहिए क्योंकि उनहोंने इस  न केवल इस कड़ुवे सच को समझा वरन खुलकर कहा जिससे एक नई बहस पैदा हो सकती है।

-- सतीश पेडणेकर