वित्त मंत्री जी कारवां क्यों लुटा?

पी चिदंबरम साहब से एक सवाल पूछने का मौका मिलता मुझे, तो मेरा उनसे यह सवाल होता- भारत का कारवां क्यों लुटा? यह सवाल मैंने चुराया है एक मशहूर शेर से, जो कुछ इस तरह है, तू इधर-उधर की न बात कर, यह बता कारवां क्यों लुटा? वित्त मंत्री के लिए यह इसलिए मुनासिब है, क्योंकि वह उस सरकार में मंत्री हैं, जिसके शासनकाल में इतना नुकसान पहुंचाया गया है इस गरीब देश की अर्थव्यवस्था को कि जीडीपी (वार्षिक वृद्धि दर), जो कुछ वर्ष पहले दौड़ रही थी नौ फीसदी की रफ्तार से, पिछले वर्ष गिरकर पांच फीसदी तक पहुंच गई है।

प्रधानमंत्री और कांग्रेस के प्रवक्ता अकसर दोष देते हैं विश्व की अर्थव्यवस्था में आई मंदी को, लेकिन सच यह है कि 2006 के बाद सोनिया गांधी को खुश करने के वास्ते अपने डॉक्टर साहब ने खर्चे ऐसे बढ़ाए हैं कि जैसे पैसा पेड़ों पर उगता हो। एक अर्थशास्त्री होने के नाते जब उनको दिखा कि हाल बद से बदतर होता गया, तब उन्होंने माना कि पैसा पेड़ों पर नहीं उगता है। उनकी समस्या यह है कि वह इतने कमजोर प्रधानमंत्री हैं कि हिम्मत नहीं हुई कभी बिगड़ती स्थिति को सुधारने की।

माना कि सोनिया जी की समाज कल्याण योजनाओं का खुलकर विरोध नहीं कर सकते थे, पर चुपके से जाकर बता तो सकते थे उन्हें कि इन योजनाओं से न गरीबी हटेगी और न ही समाज कल्याण होगा। मनरेगा जैसी योजना की उपलब्धि रही है अगर कोई तो सिर्फ यह कि खैरात पर जिंदा रहने की आदत पड़ गई है देहातों में। सो जो लोग मेहनत कर खेतों में काम किया करते थे, अब मनरेगा में छोटी-मोटी मजदूरी करना पसंद करते हैं।

मनरेगा की दूसरी उपलब्धि रही है, भ्रष्टाचार की आदत अब पंचायतों तक फैल गई है, क्योंकि जब इतना पैसा केंद्र सरकार से आना शुरू हुआ, तो सरपंचों की नीयत खराब होनी ही थी। खैरात बांटने का अगर इतना शौक था सरकार को, तो कम से कम अपने खर्चे तो कम कर सकती थी। एक अंग्रेजी दैनिक में छपी एक खबर के मुताबिक अगर सरकार अपने बाबुओं के खर्चों को पांच फीसदी कम करती है, तो 6000 करोड़ रुपयों की बचत हो सकती है। अपने 34.1 लाख मुलाजिमों के वेतन और अन्य सुविधाओं पर केंद्र सरकार का वार्षिक खर्च है 1.15 लाख करोड़ रुपये।

आगे सुनिए, बचत का एक साधन, जो मुझे पी चिदंबरम ने खुद बताया जब वह 1996 में वित्त मंत्री थे। उन्होंने कहा था कि 'सरकार के अपने खर्चे कम करना काफी आसान है, क्योंकि हर मंत्रालय के बजट से अगर आखिरी 10 आइटम निकाल दिए जाएं, तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है उस मंत्रालय के कामकाज में।' इतना आसान है अगर, तो होता क्यों नहीं है? क्योंकि इसकी मांग न हम-आप करते हैं और न ही देश के बड़े राजनेता, जिनकी सोच अकसर वामपंथी होती है।

कट्टर से कट्टर मार्क्सवादी सांसद भी चुनकर दिल्ली आने के बाद फौरन सरकारी मकान की मांग करते हैं, बिना यह सोचे कि ये मकान बने हैं शहर के उन इलाकों में, जहां सिर्फ अरबपतियों की कोठियां होती हैं, जिनकी कीमत है 150 करोड़ रुपये से भी ज्यादा। हमारे यहां क्यों नहीं सांसदों के लिए एक हॉस्टल का इंतजाम किया जा सकता है, जैसे अन्य लोकतांत्रिक देशों में होता है? क्यों न मंत्रियों के लिए राष्ट्रपति भवन के 600 एकड़ से बड़े पिछवाड़े में कोठियां बनाई जाएं? ऐसा होता है अगर, तो इन वीवीआईपी लोगों की सुरक्षा का खर्च भी कम हो जाएगा।

अंत में वापस लौटती हूं मैं उस सवाल पर, जो मैंने शुरू में पूछा था- कारवां क्यों लुटा? मेरी राय में इसलिए लुटा क्योंकि सोनिया-मनमोहन सरकार ने न सिर्फ जनता के पैसों को पानी की तरह बहाया, साथ-साथ निवेशकों पर लगाम लगाकर उनके लिए भी माहौल बिगाड़ा। पर्यावरण मंत्रालय के जरिये लाइसेंस राज ऐसा वापस आया है कि पांच लाख करोड़ की योजना रुकी हुई है पर्यावरण मंत्रालय में। यहां भी नीयत सरकार की साफ नहीं है, क्योंकि स्पष्ट कानून और नियम बनाने के बदले पर्यावरण मंत्रालय हर योजना का विश्लेषण अलग से करता है। स्थिति यह हो गई है कि मुंबई में अगर किसी इमारत या सड़क की योजना बनती है, तो इजाजत लेनी पड़ती है केंद्र सरकार से। कैसे उन्नति होगी इस गरीब देश में, कैसे न लुटेगा बार-बार भारत का कारवां?

 

- तवलीन सिंह

 अमर उजाला, 4 मार्च 2013 के अंक से साभार

http://www.amarujala.com/news/samachar/reflections/tavleen-singh/why-india-s-gdp-fell/