मनरेगा - न उगलते बने न निगलते ---भाग(2)

नरेगा कि सबसे बड़ी समस्या अकुशल श्रमिको को काम मुहैया करने की भी है जो इस योजना का घोषित उद्देश्य है ! इसमें कोई ऐसी नीति नहीं है जो सार्वभौमिक रूप से रोजगार को पैदा करने कि क्षमता रखती है ! न ही इसमें कोई दीर्घकालिक नीति या योजना है ! सही मायने में यह एक अल्प अवधि परक  आकस्मिक योजना है जो सूखे या आकाल से प्रभावित  क्षेत्रों या उन भागों में चलाई जाती है जो विकास कि धारा से कही पीछे छूट गए है,लेकिन यह तो सामाजिक कार्यकर्ताओ से भरे एनएसी का अति उल्लास पूर्ण कार्य है ! जिसमे रमेश और सोनिया दोनों शामिल है ! ऐसे में यह समझ से परे है ! हालांकि इस तरह कि आपत्ति को नकार दिया गया है ! एन. सी. सक्सेना ने अपनी बातचीत में कहा है कि एनएसी की अनुशंसा को प्रधानमंत्री कार्यालय भेजा गया, जहा से इसे सारी औपचारिकताएं पूरा करने के लिए ग्रामीण मंत्रालय भेजा गया ! इसे लेकर कही कोई सवाल-जवाब या बहस नहीं हुआ ! यहाँ तक कि जो मंत्रालय इसे देखता है उसने भी ऐसा करने की जहमत नहीं उठाई ! गत छः सालों में ऐसा पहली बार हुआ कि पिछले साल की  तुलना में कार्य की मांग में तीव्र गिरावट दर्ज की गई ! २०१०-११ में ५.५७ करोड़ घरों को काम मिला ! वही २0११-१२ में यह संख्या पांच करोड़ हो गई ! यह गिरावट ११ प्रतिशत से ज्यादा है ! २००९-११ तक काम करने के औसत दिनों की संख्या ५० दिनों से ऊपर रही (वादा १०० दिन काम देने का है ) इसमे ४२-४८ दिन का उतार-चढाव होता रहा है, जो इस बात का संकेत है कि यह स्वयं स्थायी बन गई है ! शायद यह जरुरी भी है, लेकिन लम्बे समय में यह अनुत्पादक हो जाएगी ! मगर यह सरकार कि मंशा है कि अकुशल श्रम को स्थाई बनाये रखा जाये और एक बड़े जन समुदाय को स्थायी रूप से उनको विकास से दूर रखा जाए ! कहने का अर्थ यह है कि अकुशल श्रमिक कभी भी अपनी उत्पादक क्षमता बढ़ा नहीं सकता है ! ऐसे में वह हमेशा अधिक उत्पादक आर्थिक गतिविधि से दूर रहेगा ! इसलिए जयराम रमेश ने कौशल विकास पर जोर दिया है, जिसका समर्थन डीआईपीपी के अध्ययन में किया गया है !  परन्तु मनरेगा में कौशल विकास तबतक सीमित रूप में प्रयुक्त होता रहेगा, जबतक उसमे  व्याप्त आधारभूत निम्न त्रुटियों को समाप्त न किया जाएगा ! मसलन-

  1. आजीविका से संबंधित मुद्दे ! जैसे भूमि को लेकर पात्रता और उसका व्यवस्थीकरण, जंगल और जंगल की जमीन पर अधिकार का क्रियान्वयन, जबर्दस्ती जमीन अधिग्रहण !
  2. मानव क्षमता का सृजन करने वाली शिक्षा में अपर्याप्त निवेश !
  3. कृषि में अपर्याप्त निवेश, जिसने इसे स्थिर बना दिया है ! इसके साथ कृषि पर आधारित उद्योग और खाद्य प्रंसस्करण उद्योग के अभाव ने गाँव में बेरोजगारी को बढाया है ! अत: यह जरुरी है कि वर्तमान व्यवस्था नरेगा में विद्यमान दिखावटी चीजो को हटाकर इसे प्रभावी बनाए ! अभी नरेगा का जो स्वरूप प्रचलित है ! वह वोट बैंक कि राजनीती के लिए तो सही है ! मगर क्षमता निर्माण कि दृष्टि से यह ठीक नहीं है !

इस योजना को वापस लेना जैसा कि कहा गया है, मुश्किल है पर इनकी मान्यताओ पर पुनर्विचार किया जा सकता है ! इसकी मान्यता है कि -

  1. गरीबो के लिए सिर्फ अकुशल दैहिक कार्य ही सही !
  2. परिसंपत्तियों के सृजन कार्य में ठेकेदारों को शामिल करना और गरीबो को उनकी आजीविका से वंचित करना !
  3. काम मांगने वाले को उसके आवास से पांच किमी. की परिधि में काम मुहैया करना !
  4. स्कीम तभी सफल होगी, जब श्रमिक और मेटेरियल कंपोनेंट का अनुपात ६० : ४० का हो !
  5. ग्रामसभा योजना निर्माण और सभी कार्यो के क्रियान्वयन के लिए सशक्त है !
  6. सोशल ऑडिटिंग ग्राम-सभा करेगी, क्योंकि लोकतंत्र नीचे से कार्य करता है और अशक्त तथा लाभ से वंचित समूह अपना अधिकार जानते है ! इनके अन्दर स्थानीय प्रशासन और सरपंच से अपने अधिकारों के लिए लड़ने की क्षमता होती है !
  7. वही पुरानी परंपरा अपनायी गई है, जो रोजगार योजनाओ में पहले विफल हो चुकी है ! मसलन- कलेक्टर, बीडीओ और सरपंच कार्यो को बांटते है !

जयराम रमेश अपने 'मनरेगा' २.० में इन्ही समस्याओ का समाधान करना चाहते है ! इसलिए उन्होंने इसमें ३० नए कार्यक्रम को शामिल किया है !यथा प्रत्येक पंचायत में शौचालय कि सुविधा और छह दिशा-निर्देश ! नए निर्देश में ग्रामसभा की अनुमति जरुरी कर दी गयी  है ! इसके साथ केवल उन्ही कार्यो पर विचार किया जाएगा, जिससे टिकाऊ परिंसंपत्ति का सृजन हो सके, जबकि शुरू में परिसंपत्ति का सृजन करना एक उद्देश्य था ! न कि एक आवश्यक शर्त ! इसमें दो राय नहीं है कि नई शुरुआत बेहतर है ! मगर नरेगा में अभी वही डिलीवरी तंत्र मौजूद है जो यह सोचने पर बाध्य करता है कि मनरेगा २.० कोई बहुत बड़ा अंतर उत्पन्न नहीं कर पाएगा ! इसपर एकबार नए सिरे से विचार करना होगा ! इसमें उद्देश्य की स्पष्टता की जरुरत है ! क्या यह एक ऐसी योजना है जो गाँव वालों को काम के नाम पर खुश रहने के लिए बनाई गई, ताकि इनका वोट मिल सके या जिसका कोई अर्थ नहीं है या फिर  इसकी कोई दीर्घकालीक प्रासंगिकता नहीं है या क्या इस स्कीम का अर्थ आजीविका के अवसर उत्पन्न करना है?

यहाँ एक उदहारण पर विचार करते है ! इस समय खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश  (एफडीआई ) को लेने के लिए तर्क दिया जाता है कि इसके आने से ग्रामीण आपूर्ति की चेन मजबूत होगी ! इसको मजबूत करने के लिए पांच बिलियन डॉलर कि जरुरत कुछ वर्षो मे ही है जो भारत के पास उपलब्ध नहीं है, लेकिन औसतन नरेगा से एक साल में ३०,००० करोड़ रूपए खर्च हो जाते है, जो पांच बिलियन डॉलर से कही अधिक है ! इसके अतिरिक्त दिखाने के लिए बहुत काम है ! क्या होता यदि नरेगा पुरे भारत के प्रत्येक पंचायत में कोल्ड स्टोरेज चेन या अनाजो के रख-रखाव के लिए गोदाम का निर्माण करवाता ? अब स्कीम अक्षमता के निम्नतम स्तर तक पहुच चुकी है ! ऐसे में सोनिया को इस पेचीदी समस्या का नया उत्तर ढूढना चाहिए ! यह सोचना चाहिए कि 'नरेगा के साथ क्या किया जाए !'

उन्हें आजीविका के मुद्दे को आगे रखकर सशुरूआत  करनी चाहिए ! यदि ग्रामीणों को उनके जमीन और जंगल के अधिकार प्रदान कर दिए जाए तो ढेरो समस्याओ का समाधान हो जाएगा इसके बाद क्षमता निर्माण पर व्यय करना होगा ! मसलन शिक्षा पर ! यही नहीं कृषि और उससे संबंधित क्षेत्रो में वास्तविक रोजगार का सूजन करना होगा ! पर क्या सोनिया गांधी इस दीर्घकालिक नजरिए के लिए तैयार है?

- प्रशांत मोहंती
(गवर्नेस नाऊ का यह लेख अनुवाद होकर प्रथम प्रवक्ता पत्रिका में छपा था। हम वहीं से इसे साभार ले रहे हैं।)