धंधा है पर गंदा... बिल्कुल नहीं (भाग एक)

इलाहाबाद में इन दिनों महाकुंभ मेले की धूम मची है। महाकुंभ में स्नान कर अपने सभी दुखों से निवारण करने की चाह में देशभर के लोग अपने अपने काम-धंधे और रोजगार से छुट्टी लेकर यहां महीने भर डेरा जमाए रहते हैं। अल सुबह से ही संगम के तीरे डेरा डाले रहने के बावजूद त्रिवेणी के संगम स्थल पर मन भरकर डुबकी लगाने की इच्छा कुछेक लोगों को ही प्राप्त होता है। बाकी बस किसी प्रकार दूर किनारे से ही डुबकी लगा अपने को तृप्त मान लेते हैं।

ठीक ऐसा ही एक महाकुंभ राजधानी दिल्ली में भी लगता है। इलाहाबाद में तो कुंभ छह वर्ष व 12 वर्ष के अंतराल पर लगता है लेकिन राजधानी में यह कुंभ प्रतिवर्ष लगता है। यहां भी लोग बाग नौकरी, व्यवसाय व अन्य गतिविधियों से अवकाश लेकर पूरी तन्मयता से इस कुंभ में डुबकी लगाने की इच्छा पालते हैं। हालांकि अधिकांश के हिस्से कुछ छींटे आ जाएं वही काफी है और उन्हें भी बस इसी से अपने को तृप्त मान लेने को मजबूर होना पड़ता है।

हम बात कर रहे हैं दिल्ली के एक बड़े कुंभ “मिशन एडमिशन” की। प्रत्येक वर्ष जनवरी की शुरूआत से महीने के अंततक चलने वाले इस कुंभ का केंद्र यहां के गिनेचुने निजी व कुछेक सरकारी (केंद्रीय विद्यालय, प्रतिभा विद्यालय व सर्वोदय विद्यालय) स्कूल होते हैं जिनमें अपने नौनिहालों का दाखिला कराने की इच्छा पाले लोग नौकरी, व्यवसाय आदि से पूर्णतया या आंशिक तौर पर अवकाश लेकर गणेश परिक्रमा करते रहते हैं। लेकिन कुछ भाग्यशाली, प्रभावशाली और धनबलशाली लोगों को ही इच्छा पूरी हो पाती है। बाकी, इधर-उधर, छोटे-मोटे स्कूलों में अपने बच्चों को दाखिला दिला मजबूरीवश अपने को तृप्त मान लेते हैं।

हममे से अधिकांश इस बात से पूरा इत्तेफाक रखते हैं कि निजी स्कूल अब व्यवसाय का केंद्र बन कर रह गए हैं और स्कूल संचालक मुनाफे के लिए यह व्यवसाय कर रहे हैं। लेकिन मजे की बात यह है कि सेवाभाव के साथ खोले गए अधिकांश सरकारी स्कूलों की सेवा लेना कोई पसंद नहीं करता, यहां तक कि आर्थिक रूप से कमजोर (ईडब्लूएस) वर्ग का व्यक्ति भी। और उपर वर्णित कुछेक सरकारी स्कूलों में अपने नौनिहालों का दाखिला कराने के इच्छुक लोगों को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष तौर पर उतना ही परेशान होना पड़ता है या लगभग उतनी ही जेब ढीली करनी पड़ती है जितनी कि अच्छे निजी स्कूल में दाखिले के लिए।

अब सोंचने की बात यह है कि निजी स्कूल यदि व्यवसाय है तो अन्य व्यवसायों की तरह मांग की अधिकता की दशा में उत्पादन (नए स्कूल खोलना) में वृद्धि क्यों नहीं की जाती? जबकि अर्थशास्त्र की साधारण सी भी समझ रखने वाला व्यक्ति भी यह अच्छी तरह जानता है कि यदि उसके उत्पाद की मांग अधिक है तो इसका अधिक उत्पादन कर वह अपने लाभ को और ज्यादा बढ़ा सकता है। इसके अतिरिक्त दूसरा व्यवसायी भी उस क्षेत्र विशेष में मांग की अधिकता को देखते हुए अपना व्यवसाय शुरू कर सकता है। बाजार के नियम के मुताबिक भी प्रतिस्पर्धियों की संख्या बढ़ने से उत्पाद की कीमत में कमी आती है और उपभोक्ता को अधिकम संतुष्टि भी प्राप्त होती है। दूसरी बात, यदि स्कूल खोलना व्यवसाय नहीं है तो क्यों? स्कूल के संचालन में यदि फायदा न हो तो निजी स्कूल संचालक आखिर स्कूल क्यों खोलेंगे? इसके अतिरिक्त, यदि सरकार निजी स्कूल संचालकों को व्यवसाय करने से रोकना चाहती ही है तो बड़ी तादात में अच्छे स्कूल क्यों नहीं खोलती ताकि लोग महंगे स्कूलों में जाने के लिए बाध्य ही न हों, और धंधा चौपट होने की दशा में निजी स्कूल संचालकों को अपना व्यवसाय बंद करने को मजबूर हो जाना पड़े?

जारी है........
शेष अगले अंक में...
- अविनाश चंद्र

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