सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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अमेरिका की सिलीकॉन वैली और भारत के बैंगलूरू ने निश्चित ही मलेशिया के मल्टीमीडिया कॉरीडोर या टोक्यो बे के अत्याधुनिक आइटी पार्क की तुलना में जबरदस्त सफलता हासिल की है. सिलीकॉन वैली के सफल उद्यमी कंवल रेखी बता रहे हैं उद्यम, उद्योग और उद्यमिता की

बदलाव की राह दिखाते कुछ मंत्री - Read complete article...

जब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने भारत-अमेरिका परमाणु करार को आगे बढ़ाने की बात की तो कई विश्लेषकों को यह लगा कि बुश अमेरिकी परमाणु उपकरण निर्माताओं के लिए कई अरब डॉलर के ऑर्डर का रास्ता साफ करने में जुटे हैं। कई भारतीय वैज्ञानिकों ने इस करार का विरोध इसलिए किया था क्योंकि उन्हें डर था कि इससे घरेलू परमाणु ऊर्जा संयंत्र में अमेरिकी दखल बढ़ेगा।

भारत में परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने के लिए दौड़ की शुरुआत हो चुकी है। इस रेस में रूस काफी आगे है। फ्रांस की कंपनी अरेवा दूसरे नंबर पर है। अमेरिकी-जापानी उपक्रम (जीई-हिताची और तोशिबा-

आजादी के आंदोलन के दौरान हमारे नेताओं ने भारत की गरीबी के लिए औपनिवेशिक शोषण को खूब कोसा था। ब्रिटिश लोगों के आने से पहले भारत की गिनती दुनिया की शीर्ष उद्योग और कारोबारी महाशक्तियों में की जाती थी। जब ब्रिटिश गए तो भारत गरीब होकर, तुलनात्मक रूप से और भी पिछड़ गया था। भारतीयों ने इसका दोष ब्रिटेन के माथे मढ़ दिया था और इस बात को लेकर वे आश्वस्त थे कि औपनिवेशिक सत्ता खत्म होने के बाद भारत फिर अमीर बन जाएगा।

हांगकांग 1947 में भी एक उपनिवेश बना रहा। भारतीय नेताओं ने उसके साम्राज्य के बोझ तले दबे होने को लेकर अफसोस भी जताया था। आज

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