सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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बाजार में प्रतिस्पर्धा इंसान पर इस बात का जोरदार दबाव बनाती है कि अच्छे आचार विचार के साधारण नियमों को तोड़े और उसके लिए अच्छे तर्क भी बताए। यही वह निरपेक्षता( अपने पसंद की चीज हासिल करने के लिए खुद को धोखा देने की प्रवृति ) है, जो नैतिकता का पतन करती है। लेकिन खुली बाजार व्यवस्था की खिलाफत करने के लिए अपने आप में यह कोई तर्क नहीं है। उन लोकतांत्रिक तरीकों के बारे में भी सोचिए, जिनसे नैतिकता का पतन होता है। राजनीतिक सत्ता हासिल करने के चक्कर में भी लोगों की नौतिकता का पतन होता है। इसके लिए वह सार्वजनिक सभाओ में दूसरों पर चिल्लाते हैं, ऐसे वादे करते हैं जिन्हें वे निभा

पिछले कई दशकों के दौरान दुनिया ने ऐसे तमाम तरीके देखे हैं, जिसमें एक सक्रिय बाजार व्यवस्था के चलते भौतिक और सामाजिक प्रगति हुई है और साथ ही साथ उसी वक्त पर नैतिकता भी मजबूत हुई है। इसके ठीक उलट, वैसे लोग जो खुली बाजार व्यवस्था के विरोधी आदर्शवादी और योजनाबद्ध व्यवस्था में रहे हैं, उनका आर्थिक विकास एक ही जगह अटक गया। सिविल सोसायटी की हालत और खराब हुई और नैतिकता का पतन हुआ। हाल के दशक में योजनाबद्ध अर्थवयवस्था अपने ही विरोधाभासों के बीच खत्म हो गई। इस तरह के प्रयोग पूरी तरह से व्यवस्थागत नाकामी साबित हुए। तबाही को काफी लंबे समय तक झेलनेवाले लोग इससे छुटकारा पाने के लिए

खुली बाजार व्यवस्था प्रतिस्पर्धा की एक ऐसी जगह है, जहां इंसान का सबसे बेहतरीन बाहर आ सकता है। कंपीटिशन जोरदार है और जब अस्तित्व दांव पर लगा होता है,उस वक्त नैतिकता के लिए कोई जगह नहीं बचती,लेकिन तमाम तरह की कमियों के बावजूद खुली बाजार व्यवस्था अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए अब तक आजमाई गए तमाम व्यवस्थाओं में सबसे बेहतर हैं।

शुरुआत में ऐसा लगता था कि आत्म-रुचि के आधार पर बनी व्यवस्था व्यक्ति को नैतिक पतन की ओर ले जाएगी। अगर कामयाबी के शिखर पर पहुंचने के संघर्ष के दौरान आप अपने भाई की मदद करने के लिए पल भर भी रुकते हैं तो कंपीटिटर आपको पीछे छोड़

खुली बाजार व्यवस्था नैतिकता के कुछ पहलुओं को बर्बाद भी करती है और कुछ को बेहतर भी बनाती है। अब इसके नतीजे अच्छे हैं या बुरे या संतुलन में हैं, यह काफी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि अच्छी जिंदगी को कोई किस तरह से देखता है।

बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है कि क्या कोई यह मानने के लिए तैयार है या नहीं कि दूसरी आर्थिक व्यवस्था अच्छा कर सकती है। इस सवाल का सही जवाब केवल तभी मिल सकता है, जब हम उनकी तुलना असल विकल्पों से करें और समझें कि किस तरह अलग-अलग व्यवस्था अलग-अलग तरह के मानवीय चरित्र का विकास करती है।

यह

मैं अपने निजी अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि आज के जमाने में अगर आप किसी यूनिवर्सिटी कैंपस में खुली बाजार व्यवस्था की बात करेंगे तो आप वैश्वीकरण की आलोचनाओं के तले दब जाएंगे। छात्रों और फैकल्टी के बीचअंतरराष्ट्रीय बाजार की मुखालफत की मुख्य वजह दूसरों के हितों की चिंता है। इसके पीछे सामाजिक और नैतिक कारण है। अगर इसे सरल शब्दों में कहें तो वे मानते हैं कि वैश्वीकरण का कोई मानवीय चेहरा नहीं होता, लेकिन मैं इसके उलट सोचता हूं। मेरा मानना है कि वैश्वीकरण के चलते न केवल धन संपदा का निर्माण और विस्तार हो रहा है, बल्कि इसमें शामिल पक्षों में बेहतर नैतिक मूल्यों का विकास भी हो

एक तरफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से जूझती और दूसरी तरफ बिहार में करारी हार झेलने के बाद, कांग्रेस एक नाज़ुक दौर से गुज़र रही है. इसी माहौल के बीच पार्टी ने अपनी स्थापना के 125 वर्ष भी पूरे किये और अपना 83वां महाधिवेशन दिल्ली में आयोजित किया. भ्रष्टाचार के मामलों पर विपक्ष की घेराबंदी, बिहार में चुनावी पराजय, राहुल गांधी से जुड़े कथित विकिलीक्स खुलासे, कुछ अन्य राज्यों में  आने  वाले विधानसभा चुनाव की तय्यारी और बढ़ती महंगाई समेत कई मुद्दों पर इस अवसर पर चर्चा हुई.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने स्वीकार किया कि

चायनीज़ दबाव को ना मानते हुए, भारत ने नोर्वे में चीन के लोकतंत्र समर्थक आन्दोलनकारी लियु श्याबाओ को मिलने वाले नोबेल शांति पुरस्कार समारोह में हिस्सा लिया. ऐसा कदम उठाते हुए, भारत ने स्वतंत्रता और लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का अच्छा प्रमाण दिया. चीनी सरकार के आव्हान के चलते, रूस और पाकिस्तान समेत 15 देशों ने इस समारोह का बहिष्कार किया. ये समारोह विश्व मानवाधिकार दिवस पर मनाया गया और भारत, अमरीका, यू के और फ्रांस समेत 46 देशों इस अवसर में सम्मिलित हुए.

श्याबाओ चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के एकाधिकार को समाप्त

आजादी पत्रकारिता पुरस्कारः एक परिचय

आजादी पत्रकारिता पुरस्कार, हिंदी संचार माध्यमों (प्रिंट/इलेक्ट्रॉनिक/रेडियो) में कार्यरत (पूर्णकालीन/अंशकालीन) अथवा किसी प्रकार (लेख/स्तंभ लेखन आदि) से जुड़े उदारवादी विचारधारा के समर्थक पत्रकारों को प्रदान किया जाने वाला पुरस्कार है, जो अपने रिपोर्ट, लेख या स्तंभ के माध्यम से उदारवादी विचारधारा का प्रचार प्रसार करते हैं। यह पुरस्कार ऐसे पत्रकारों

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