सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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चार जून की रात दिल्ली के रामलीला मैदान में की गई पुलिस ज्यादतियों का विरोध करने वाले तमाम धर्माचार्य, योगाचार्य, संन्यासी और स्वयंसेवी संगठन अगर आने वाले समय में एक मंच पर एकत्र होकर अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की मांगों का समर्थन करने का तय कर लें और गांव-गांव और शहरों में फैले अपने करोड़ों समर्थकों से सरकार का विरोध करने का आह्वान कर दें तो कैसी परिस्थितियां बनेंगी?

तब क्या कोई बहस करेगा कि इन गैर-राजनीतिक लोगों से सरकार को बातचीत नहीं करनी चाहिए? तब भी क्या वही तर्क दिए जाएंगे, जो प्रणब मुखर्जी दे रहे हैं? केंद्र में बनने वाली सरकारें जिस तरह

देशभर के शहरों में रहनेवाले गरीबों के आंकड़े जुटाने के लिए एक जून से सात माह का सर्वे शुरू हो चुका है. इसके साथ ही गरीबों की पहचान के मानदंड पर बहस भी फ़िर छिड़ गयी है. यह विडंबना ही है कि तमाम योजनाओं के बावजूद गरीबों की संख्या लगातार बढ़ रही है.

शहरी गरीबों की गणना की खबरों के साथ ही गरीबी को लेकर जारी बहस फ़िर छिड़ गयी है. यह भारतीय लोकतंत्र की विडंबना ही है कि एक तरफ़ तो यह चुनावी प्रक्रिया में गरीबों की बढ़ती भागीदारी पर गर्व महसूस करती है, दूसरी तरफ़ इसी भागीदारी ने राजनीतिक और सांख्यिकीय रूप से गरीबों की पहचान को अत्यंत जटिल और

19वीं सदी में तिलक युग से देश में राजनैतिक राष्ट्रीय भावना के नवजागरण का आरम्भ हुआ| उन दिनों बंगाल में भी राष्ट्रीयता के त्रि-आयाम का उद्भव हुआ| सुरेन्द्रनाथ बनर्जी का कर्मयोग, विपिन चंद्र और महर्षि अरविन्द का ज्ञान योग और रविंद्रनाथ की देशप्रेम साधना का भक्तियोग| स्व-देश या निज-देश की भावना उन्हें पारिवारिक विरासत से प्राप्त हुई थी| भारतवर्ष के जीवन आदर्श और सांस्कृतिक श्रेष्ठता को बनाए रखने के लिए देवेंद्रनाथ ‘तत्वबोधिनी’ पत्रिका के माध्यम से हमेशा देशवासियों को ईसाई मिशनरियों के धर्मान्तरण के खरते से आगाह करने की कोशिश करते रहते थे| राष्ट्र की व्यापक समस्याओं के विषय

लोग अगर पूरी तरह स्वतंत्र हों तो सबसे ज्यादा प्रतिभावान ( और सौभाग्यशाली ) लोग सबसे सुस्त और दुर्भाग्यशाली लोगों से कहीं ज्यादा अमीर होंगे। यानी स्वतंत्रता से असमानता पैदा होगी। कम्युनिस्ट देशों ने तानाशाही नियंत्रण के जरिए समाज में समता लाने का प्रयास किया , लेकिन वह पाखंड मात्र था। इन देशों में नियम बनाने वालों और उनका पालन करने वालों के बीच ताकत की कोई समानता मौजूद नहीं थी। स्वतंत्रता और समानता के बीच का तनाव कम करने के लिए देशों को अवसरों की समानता लाने का लक्ष्य लेकर चलना होता है , परिणाम की समानता का नहीं। इसके बावजूद अर्थशास्त्री लगभग हर जगह विषमता का आकलन

मैंने ओसामा बिन लादेन की मौत का जश्न नहीं मनाया। किसी विचार को खत्म करने से कहीं ज्यादा आसान है, किसी व्यक्ति को मार देना। ओसामा की मौत के बाद भी उसके जेहाद की विचारधारा जिंदा रहेगी।

वो 9/11 का मास्टरमाइंड था और जेहाद की दुनिया का सबसे बड़ा चेहरा बन चुका था। हालांकि लंबे वक्त से वो जेहादी गतिविधियों से सीधे तौर पर नहीं जुड़ा था, लेकिन इस बीच उसने अलकायदा के विरोधी मुस्लिमों की हत्या करवाने का घृणित काम किया था।

इस सबके बावजूद ओसामा एक नये तरह के जेहाद के प्रति लोगों का आकर्षण पैदा करने में कामयाब रहा।

भारत ने पहले लोकतंत्र को अपनाया और बाद में पूंजीवाद को और यह हमारे बारे में बहुत कुछ समझाता है। भारत 1950 में सर्व मताधिकार और व्यापक मानवाधिकारों के साथ लोकतंत्र बना लेकिन 1991 में जा कर इसने बाजार की ताकतों को ज्यादा छूट दी।

हम लोगों ने कई सालों में आर्थिक सुधार की धीमी वृद्धि देखी है जिस दौरान हमने कुछ नुकसानदेह समाजवादी संस्थाओं को विखण्डित किया है। फिर भी एक विशाल कार्य-सूची है जिसे पूरा किये बिना हम खुद को एक सख्त पूंजीवादी लोकतंत्र नही कह सकते। और तो और, यह भी देखा जा सकता है कि चुनाव के दौरान नेता आज भी एक उदार आर्थिक सुधार के मंच पर

व्यापार में कुछ खास नैतिक खतरे नही है। कोई भी काम जिसमें सही या गलत में चुनाव करना पड़े उसमें नैतिक खतरा होता ही है। व्यापारी भले ही अपने काम में ज्यादा नैतिक दुविधा का सामना करता है लेकिन यह किसी राजनेता या नौकरशाह की दुविधा से ज्यादा नही होता होगा।

अलग-अलग व्यवसायों के लिए अलग-अलग एथिक्स नही चाहिए बल्कि एक ऐसा नीति-शास्त्र विकसित करना चाहिए जो सबका मार्गदर्शन करे। व्यापार नैतिकता और कुछ नही बल्कि व्यक्तिगत नैतिकता है।

व्यापार की सामाजिक जिम्मेदारी नैतिकता को ध्यान में रखते

भारत ने पहले लोकतंत्र को अपनाया और बाद में पूंजीवाद को और यह हमारे बारे में बहुत कुछ समझाता है। भारत 1950 में सर्व मताधिकार और व्यापक मानवाधिकारों के साथ लोकतंत्र बना लेकिन 1991 में जा कर इसने बाजार की ताकतों को ज्यादा छूट दी।

हम लोगों ने कई सालों में आर्थिक सुधार की धीमी वृद्धि देखी है जिस दौरान हमने कुछ नुकसानदेह समाजवादी संस्थाओं को विखण्डित किया है। फिर भी एक विशाल कार्य-सूची है जिसे पूरा किये बिना हम खुद को एक सख्त पूंजीवादी लोकतंत्र नही कह सकते। और तो और, यह भी देखा जा सकता है कि चुनाव के दौरान नेता आज भी एक उदार आर्थिक

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