सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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आदि काल से ही महिलाओं को उनकी दर्द सहने की अदभुत क्षमता के कारण सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। लेकिन दर्द सहने की यह क्षमता ही कभी-कभी उनके लिए मुसीबत का सबब बन जाती है और उन्हें अपनी जान से हाथ भी धोना पड़ जाता है। हार्ट अटैक के मामले में तो यह अदभुत क्षमता और ज्यादा खतरनाक साबित होती है। जी हां, अमेरिका में हुए एक शोध में इस बात का खुलासा हुआ है कि हार्ट अटैक के कारण महिलाओं की मृत्यु की प्रतिशतता पुरूषों की मृत्यु की प्रतिशतता से कहीं ज्यादा (लगभग ४१ फीसदी) होती है। इसका कारण महिलाओं में दर्द सहने की जबरदस्त क्षमता का होना ही होता है।

अगर आप अक्सर रेल यात्रा करते हैं और आपको आपनी जान प्यारी है तो अगली बार आपको रेल में यात्रा करने से पहले दस बार सोचना चाहिए। कम से कम  अनिल काकोडकर समिति की रेलवे सुरक्षितता के बारे में आई रपट के बाद तो आपको चौकन्ना हो ही जाना चाहिए। एक तरह से रेल मंत्रालय के खिलाफ आरोपपत्र है यह रपट कि वह किस तरह रेलयात्रियों की जान के साथ खिलवाड कर रहा है। खराब और दोषपूर्ण रेलवे ट्रेक ,असुरक्षित खस्ताहाल कोच, बरसों पुराने रेलवे पुल,लिकिंग ब्रेक - यह हालत है रेलवे की सुरक्षितता की । तभी तो पचास प्रतिशत ट्रेन दु्र्घटनाएं पटरी से उतरने के कारण होती है तो 36 प्रतिशत अनमैन्ड लेवल

क्या आपको पता है, आपकी जानकारी व अनुमति के बगैर आपका मोबाइल फोन न केवल हैक कर उससे की गई बातचीत व एसएमएस की जानकारी ली जा सकती है बल्कि उससे फोन काल व एसएमएस भी किए जा सकते हैं। और तो और इसके लिए हैकर्स को आपके फोन को हाथ लगाने की भी जरूरत नही पड़ेगी। हैकर्स सात समुंदर पार बैठकर भी भारतीय मोबाइल फोन धारकों के फोन व नंबर को मनचाहे तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं। अफसोस कि ऐसी स्थिति किसी नई तकनीकी के अविष्कार की वजह से नहीं बल्कि मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों की लापरवाही के कारण उत्पन्न हुई है। पणजी में साईबर विशेषज्ञों के एक दल ने सर्विस आपरेटरों के सुरक्षित सेवा प्रदान

टाम पामर ने कई लेखों की एक अनूठी श्रृंखला तैयार की है जिसमें पूंजीवाद के नैतिक आयाम के बारे में श्रेष्ठ चिंतन को संकलित किया गया है। मुझे इस बात की खुशी है कि इस प्रस्तावना के जरिये मुझे इस बहस में योगदान करने के लिए आमंत्रित किया गया।

हालांकि 1991 के सुधारों के बाद दो दशक गुजर चुके हैं जब भारत ने खुले बाजार अपनाया था। लेकिन अब भी पूंजीवाद भारत में  अपने लिए जगह बनाने की कोशिश कर रहा है। ज्यादातर लोगों की तरह भारतीय भी मानते हैं कि बाजार कुशल तो होता है लेकिन नैतिक नहीं।लेकिन मेरा मानना बिल्कुल उल्टा है कि लोग अनैतिक हो सकते हैं और खराब

हमारी संस्कृति की अनेक खूबियों में से एक है उसका उदारवाद। हमारे ग्रंथों ने हमें सभी लैंगिक समूहों और उनकी यौन अभिरुचियों का सम्मान करने की सीख भी दी है, फिर चाहे वे हमसे भिन्न ही क्यों न हों। लेकिन इसके बावजूद आज भी हम भिन्न यौन अभिरुचियों वाले व्यक्तियों के प्रति पर्याप्त उदार और सहिष्णु नहीं हो पाते। उभयलिंगियों को तो हमने हाशिये का उपेक्षित समुदाय बना डाला है। बर्बर देशों की तरह हम 'व्यभिचारियों' को पत्थर मार-मारकर मार तो नहीं डालते, लेकिन एक तरह से उनका सामाजिक बहिष्कार जरूर कर देते हैं। उन्हें अन्य तरीकों से यंत्रणा दी जाती है और वे हमारी घृणा और हिकारत का

आंध्रप्रदेश सरकार माओवादी हिंसा पर प्रभावी ढंग से काबू पाने के लिए अपनी पीठ थपथपा सकती है। वैसे सारे देश को ही उसकी पीठ थपथपानी चाहिए। पिछले तीस वर्षों के दौरान वर्ष 2011 पहला मौका है जब राज्य में माओवादी हिंसा में  भारी कमी आई है। इस साल माओवादी हिंसा के केवल 41 मामले दर्ज हुए, छह लोगों की जानें गईं और कोई भी पुलिसवाला हिंसा का शिकार नहीं बना। यह आंकंड़े बताते है  कि माओवादी हिंसा से सबसे ज्यादा त्रस्त इस राज्य ने पिछले तीन दशकों में माओवादी हिंसा से लगातार संघर्ष करने के बाद उसपर प्रभावी तरीके से नियंत्रण पाने में महत्वपूर्ण सफलता पाई है। ऐसे समय जब हाल ही

डा.टॉम जी पॉमर पूंजीवादी दर्शन और नैतिकता के मुखर प्रवक्ता के रूप में जाने जाते हैं। वे जितने अच्छे लेखक है उतने ही प्रभावशाली वक्ता भी। उनकी पुस्तक –रियलाइजिंग फ्रीडम : लिबरेशन थ्योरी,हिस्ट्री एंड प्रैक्टिस – उनके  स्वतंत्रता संबंधी विचारों का सशक्त प्रतिपादन है।पामर आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से राजनीति शासत्र में डाक्टरेट की है  और वाशिंगटन स्थित कैटो इंस्टीटयूट में सीनियर फैलो हैं। इसके अलावा वे एटलस नेटवर्क के अंतर्राष्ट्रीय प्रोग्राम के कार्यकारी उपाध्यक्ष है। हाल ही में वे अपनी नई पुस्तक -मारलिटी आफ कैपिटलिज्म – (पूंजीवाद की

दो चुनावों में तारा चमका
तीसरे में  डूब गया

राजनीतिक और आर्थिक स्वतंत्रता के जरिये समृद्ध भारत बनाने की संकल्प प्रगट करके भारतीय राजनीति में एक नई लीक बनानेवाली नवजात स्वतंत्र पार्टी को अपनी स्थापना के ढाई साल के भीतर ही आम चुनाव की भारी चुनौती का सामना करना पड़ा और वह उस चुनौती का सामना करने में कामयाब भी रही। अपनी पहली चुनावी परीक्षा में  लगभग 8.54 प्रतिशत वोट और लोकसभा में अठारह सीटें प्राप्तकर वह देश की तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन गई। उसे सत्तारूढ कांग्रेस और संयुक्त कम्युनिस्ट पार्टी के बाद सबसे ज्यादा सीटें हासिल हुईं

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