सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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लोग अगर पूरी तरह स्वतंत्र हों तो सबसे ज्यादा प्रतिभावान ( और सौभाग्यशाली ) लोग सबसे सुस्त और दुर्भाग्यशाली लोगों से कहीं ज्यादा अमीर होंगे। यानी स्वतंत्रता से असमानता पैदा होगी। कम्युनिस्ट देशों ने तानाशाही नियंत्रण के जरिए समाज में समता लाने का प्रयास किया , लेकिन वह पाखंड मात्र था। इन देशों में नियम बनाने वालों और उनका पालन करने वालों के बीच ताकत की कोई समानता मौजूद नहीं थी। स्वतंत्रता और समानता के बीच का तनाव कम करने के लिए देशों को अवसरों की समानता लाने का लक्ष्य लेकर चलना होता है , परिणाम की समानता का नहीं। इसके बावजूद अर्थशास्त्री लगभग हर जगह विषमता का आकलन

मैंने ओसामा बिन लादेन की मौत का जश्न नहीं मनाया। किसी विचार को खत्म करने से कहीं ज्यादा आसान है, किसी व्यक्ति को मार देना। ओसामा की मौत के बाद भी उसके जेहाद की विचारधारा जिंदा रहेगी।

वो 9/11 का मास्टरमाइंड था और जेहाद की दुनिया का सबसे बड़ा चेहरा बन चुका था। हालांकि लंबे वक्त से वो जेहादी गतिविधियों से सीधे तौर पर नहीं जुड़ा था, लेकिन इस बीच उसने अलकायदा के विरोधी मुस्लिमों की हत्या करवाने का घृणित काम किया था।

इस सबके बावजूद ओसामा एक नये तरह के जेहाद के प्रति लोगों का आकर्षण पैदा करने में कामयाब रहा।

भारत ने पहले लोकतंत्र को अपनाया और बाद में पूंजीवाद को और यह हमारे बारे में बहुत कुछ समझाता है। भारत 1950 में सर्व मताधिकार और व्यापक मानवाधिकारों के साथ लोकतंत्र बना लेकिन 1991 में जा कर इसने बाजार की ताकतों को ज्यादा छूट दी।

हम लोगों ने कई सालों में आर्थिक सुधार की धीमी वृद्धि देखी है जिस दौरान हमने कुछ नुकसानदेह समाजवादी संस्थाओं को विखण्डित किया है। फिर भी एक विशाल कार्य-सूची है जिसे पूरा किये बिना हम खुद को एक सख्त पूंजीवादी लोकतंत्र नही कह सकते। और तो और, यह भी देखा जा सकता है कि चुनाव के दौरान नेता आज भी एक उदार आर्थिक सुधार के मंच पर

व्यापार में कुछ खास नैतिक खतरे नही है। कोई भी काम जिसमें सही या गलत में चुनाव करना पड़े उसमें नैतिक खतरा होता ही है। व्यापारी भले ही अपने काम में ज्यादा नैतिक दुविधा का सामना करता है लेकिन यह किसी राजनेता या नौकरशाह की दुविधा से ज्यादा नही होता होगा।

अलग-अलग व्यवसायों के लिए अलग-अलग एथिक्स नही चाहिए बल्कि एक ऐसा नीति-शास्त्र विकसित करना चाहिए जो सबका मार्गदर्शन करे। व्यापार नैतिकता और कुछ नही बल्कि व्यक्तिगत नैतिकता है।

व्यापार की सामाजिक जिम्मेदारी नैतिकता को ध्यान में रखते

भारत ने पहले लोकतंत्र को अपनाया और बाद में पूंजीवाद को और यह हमारे बारे में बहुत कुछ समझाता है। भारत 1950 में सर्व मताधिकार और व्यापक मानवाधिकारों के साथ लोकतंत्र बना लेकिन 1991 में जा कर इसने बाजार की ताकतों को ज्यादा छूट दी।

हम लोगों ने कई सालों में आर्थिक सुधार की धीमी वृद्धि देखी है जिस दौरान हमने कुछ नुकसानदेह समाजवादी संस्थाओं को विखण्डित किया है। फिर भी एक विशाल कार्य-सूची है जिसे पूरा किये बिना हम खुद को एक सख्त पूंजीवादी लोकतंत्र नही कह सकते। और तो और, यह भी देखा जा सकता है कि चुनाव के दौरान नेता आज भी एक उदार आर्थिक

यदि आतंकवाद का सहारा लेने वाले साधु-संतों का तर्क यह है कि उनका आतंकवाद सिर्फ जवाबी आतंकवाद है, तो मैं कहूंगा कि यह तर्क बहुत बोदा है। आप जवाब किसे दे रहे हैं? बेकसूर मुसलमानों को? आपको जवाब देना है तो उन कसूरवार मुसलमान आतंकवादियों को दीजिए, जो बेकसूर हिंदुओं को मारने पर आमादा हैं। आतंकवाद कोई करे, किधर से भी करे, मरने वाले सब लोग बेकसूर होते हैं।

क्या आतंक का कोई रंग होता है? कोई मजहब होता है? होता तो नहीं है, लेकिन मुख-सुख के लिए लोग उसका वैसा नामकरण कर देते हैं। यह नामकरण बड़ा विनाशकारी सिद्ध होता है। कुछ सिरफिरों का उन्माद

माओवादी हिंसा से जुड़ी खबरों को लेकर बहुत चिंतित ना हों। झारखंड सरकार और वहां के लोग आगे बढ़ने को तत्पर हैं और पूरी संभावना है कि राज्य 10 फीसदी की विकास दर हासिल कर ले।

पिछले कुछ महीनों के दौरान मैंने अपना काफी समय झारखंड में बिताया है। इस दौरान मैं वहां नए साल के जश्न में भी शरीक हुआ। झारखंड का मतलब रांची, धनबाद, बोकारो या जमशेदपुर ही नहीं है। मैंने सड़क और रेल मार्ग के जरिए खूंटी, गुमला, लोहरदग्गा, लातेहर, पलामू, पश्चिमी सिंहभूम, देवघर, दुमका और पाकुर की यात्रा की। जो लोग झारखंड से भली-भांति परिचित नहीं है उनके लिए इनमें से कुछ नाम अनजाने

हमारा पिछला दशक मूल्यों के कंफ्यूजन का दशक था। मैं उम्मीद करता हूं कि आगामी दस सालों में हम अपने मूल्यों को लेकर सुस्पष्ट हो पाएंगे। खास तौर पर हमारी नई पीढ़ी के लिए यह बहुत जरूरी है। जब मूल्य स्पष्ट और निर्धारित होते हैं तो हम लोगों को यह बता सकते हैं कि उनके जीवन का लक्ष्य क्या होना चाहिए। तमाम घोटाले और घपले मूल्यों के अभाव में ही होते हैं।

नए दशक की दहलीज पर खड़े होकर एक कॉलम लिखना चुनौतीभरा काम है। एक सीमित स्थान में पिछले दस सालों का लुब्बेलुआब पेश करना या आगामी दस सालों के बारे में पूर्वानुमान लगाना आसान नहीं। बहरहाल, मैं अपना ध्यान

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