सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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दिलवालों की नगरी मानी जाने वाली दिल्ली ने प्रख्यात पार्श्व गायिका आशा भोंसले का दिल तोड़ दिया। यहां आयोजित एक समारोह के दौरान दिल्ली के अंग्रेजीदां लोगों ने उन्हें बेहद उदास और निराश कर दिया और वह कहने को मजबूर हो गई कि 'पहली बार पता चला दिल्ली में केवल अंग्रेजी ही बोली जाती है।' आलम यह रहा कि आशा ताई द्वारा इस बाबत ईशारा करने के बावजूद मंच संचालक व आयोजक उनकी इच्छा को भांपने में असफल रहे। परिणाम यह हुआ कि कार्यक्रम के शुरुआत में काफी खुश दिख रही आशा ताई की भाव-भंगिमाएं गंभीर होती गई और समापन होते होते उनका मूड भी खराब हो गया। यहां तक कि आशा ने आयोजकों द्वारा

आज भी कमी महसूस होती

है स्वतंत्र पार्टी की 

आजादी के बाद जब देश प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के समाजवादी समाज रचना के रंगीन और लुभावने सपनों के पीछे भाग रहा था तब देश के राजनीतिक पटल पर एक ऐसी उदारवादी राजनीतिक पार्टी उभरी जिसने न केवल नेहरू के समाजवाद का पुरजोर विरोध  किया वरन समाजवाद के नाम पर चल रहे परमिट कोटा राज को खत्म कर मुक्त अर्थव्यवस्था  को लागू करने की वकालत की । तब  उसे राजा-महाराजाओं ,जमींदारों ,धन्ना सेठों और

पिछले दिनों मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमेटी की अत्यंत महत्वपूर्ण  बैठक में पार्टी के विचारधारा संबंधी प्रस्ताव के मसौदे को अंतिम रूप दिया । इस प्रस्ताव को अगले वर्ष होनेवाली पार्टी कांग्रेस में पेश किया जाएगा।पार्टी कांग्रेस ही माकपा की सबसे बड़ी नीति नियंता होती है।इस प्रस्ताव को इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि माकपा  बीस साल बाद एक बार फिर विचारधारा संबधी प्रस्ताव तैयार कर रही है।यह बात अलग है कि साम्यवादी आंदोलन के कई जानकार ये मानते हैं कि यह प्रस्ताव वैचारिक लीपापोती ही होगी क्योंकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों में वैचारिक साहसिकता और

पिछले दिनों स्टीवेन पिंकर जयपुर लिटरेरी फेस्टीवल में भाग लेने आए थे जहां उन्होंने अपने भाषण में जो कहा उसका लब्बोलुबाब यह था कि आदमी अब इंसान बनता जा रहा है। भयानक हिंसक युद्ध पहले से कम हो गए हैं और इसके साथ समाज में हिंसा कम होती जा रही है। उनका यह दावा नया नहीं है। उन्होंने अपनी बहुचर्चित पुस्तक – द बेटर एजिंल्स आफ अवर नेचर-व्बाय वायलेंस इज डीक्लाइंड- में भी यही दावा किया है। उससे चौंकानवाली बात यह है पिंकर इसके लिए तीन कारकों के त्रिकोण को कारणीभूत मानते हैं वे हैं –मुक्त अर्थव्यवस्था, लोकतंत्र और बाहरी विश्व से रिश्तें। जो लोग बुर्जुआ समृद्धी को पाने की

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  न होने की तुलना में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दुरुपयोग हजारों गुना बेहतर होता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आत्यंतिक महत्व को प्रतिपादित करने के लिए चार्ल्स ब्रेडला के इस उद्धरण का अक्सर हवाला दिया जाता है। लेकिन हमारे देश में उल्टी गंगा बह रही है। हमारे देश की सरकार और अदालतें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कथित दुरूपयोग को रोकने के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर ही नकेल कसने पर आमादा हैं। वे शायद यह भूल गए हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है। उसके बगैर लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हम अपने को दुनिया का सबसे

मैं समाजवाद का समर्थक नहीं हूं क्योंकि स्वतंत्रता ही मेरे लिए परम मूल्य है।उससे ऊपर कुछ नहीं । और समाजवाद बुनियादी तौरपर स्वतंत्रता के खिलाफ है। उसे होना भी चाहिए ,यह अपरिहार्य है क्योंकि समाजवाद की कोशिश किसी अप्राकृतिक चीज को अस्तित्व में लाने की है।

मनुष्य समान नहीं है। वे विशिष्ट हैं। वे समान कैसे हो सकते हैं ? सभी कवि और सभी पेंटर नहीं होते। हर व्यक्ति के पास विशिष्ट प्रतिभा होती है। कुछ लोग संगीत का सृजन कर सकते हैं और कुछ लोग धन का। मनुष्य  को अपने अनुसार बनने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता की जरूरत होती है। समाजवाद राज्य की तानाशाही है। यह

इन  दिनों देश की हर आर्थिक समस्या चाहे वह आसमान इस छूती महंगाई हो या बढ़ती बेरोजगारी या मंदी  के लिए पूंजीवाद ,नवउदारवाद और वैश्वीकरण को दोषी ठहराना नवीनतम बौद्धिक फैशन बन गया है। इस भेड़चालवाली बौद्धिकता के दौर में दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद के विचार ताजा हवा के झोंके की तरह लगते हैं। उनके विचारों की  विशेषता यह है कि वे परंपरागत चिंतन की लीक से हटकर सोचते हैं। जब राजनीतिक और बौद्धिक जगत में बहुजन या ओबीसी – दलित गठबंधन को विकल्प की तरह पेश किया जा रहा था तब उन्होंने कहा कि यह गठबंधन लंबे समय तक चल ही नहीं सकता क्योंकि खासकर ग्रामीण क्षेत्र में दलित

कैबिनेट ने खाद्य सुरक्षा बिल को रविवार को स्वीकृति दी, लेकिन भारतीय जनसाधारण को सस्ते भोजन की गारंटी देने वाले इस बिल पर मुहर लगना फिलहाल दूर की कौड़ी लगता है। फिर भी यह बिल  अभी से ही उन अर्थशास्त्रियों को भयभीत कर रहा है, जो इसे खास तौर पर इस समय सरकार पर एक बड़े आर्थिक भार के रूप में देखते हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि कैबिनेट ने इस बिल को हरी झंडी अगले साल की शुरूआत में पांच राज्यों में होने वाले चुनावों के मद्देनज़र दिखाई। भारतीय मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक विधायिका को विचार करने हेतु ज्यादा वक्त देने के लिए एक असाधारण कदम उठाते हुए,

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