सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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मराठी के लोकप्रिय अखबार लोकसत्ता के आयडिया एक्सचेंज में पिछले दिनों किसान नेता और उदारवादी चिंतक शरद जोशी को बुलाया गया था । इस कार्यक्रम में अखबार के संपादकीय विभाग के लोग मेहमान के साथ विभिन्न मुद्दों पर बातचीत करते हैं। इस कार्यक्रम में शरद जोशी देश की कृषि की समस्याओं और उसके समाधान के बारे में विस्तार और बेबाकी  के साथ  अपने विचार रखे । हम लोकसत्ता से साभार इस बातचीत के अंश दो किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं । मराठी में हुई इस बातचीत का अनुवाद किया है – सतीश पेडणेकर ने। यहां प्रस्तुत है उसकी पहली किस्त -

गर्भ में भ्रूण के लिंग परीक्षण व भ्रूण के कन्या होने की दशा में जन्म लेने से पूर्व ही उसकी हत्या कर देने के कारण देश में पुरूष-महिला लिंगानुपात के बीच की खाई लगातार बढ़ती ही जा रही है। तमाम सरकारी व गैरसरकारी प्रयासों के बावजूद यह खाई कम होने का नाम नहीं ले रही है। विश्व स्तर पर हुए एक हालिया अध्ययन के मुताबिक भारत में प्रति हजार पुरुषों की तुलना में औसतन महिलाओं की संख्या मात्र 940 है। कई राज्यों में तो प्रतिहजार पुरुषों के बनिस्पत महिलाओं की संख्या के बीच 100-120 से ज्यादा का अंतर देखने को मिला है। अर्थात प्रति हजार पुरूषों के मुकाबले मात्र 880 महिलाएं। 2011 में हुई

एक तरफ जनरल तो दूसरी तरफ आडिटर जनरल सरकार के नाक में दम किए हुए हैं। कुछ समय पहले सीएजी ने इस बार  बहुचर्चित 2 जी खोटाले से छह गुना बड़े कोयला ब्लाकों की नीलामी  न करने के घोटाले का भंडाफोड करके सरकार की कार्यक्षमता और नीयत  पर  फिर सवालिया निशान लगा दिया है और एक बार फिर  इस तथ्य को रेखांकित किया है कि किस तरह सरकारी कामकाज भ्रष्टाचार का पर्याय बनता जा रहा है।

सीएजी ने – परफार्मेंस आडिट आफ कोल ब्लाक एलोकेशन – में कहा है कि सरकार ने 2004 से 2009 के बीच 155 कोयला ब्लाकों को व्यापारिक कंपनियों को आबंटित करके

सकल घरेलू उत्पाद में तेजी से वृद्धि गरीबी का सबसे कारगर इलाज है। यही मुखर  संदेश है वर्ष  2009-10 के गरीबी के बारे में आंकड़ों का।2004-05 और 2009 -2010 के बीच 8.5 प्रतिशत  प्रतिवर्ष की रेकार्ड विकास दर ने 1.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष की  रेकार्ड दर से गरीबी घटाई है। यह आंकड़ा  इससे पहले के 11वर्षों में गरीबी घटने की 0.7 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर के आंकड़े से दोगुना है।

वामपंथियों द्वारा अक्सर भ्रामक धारणा फैलाई जाती है कि तेजी से बढ़नेवाली विकास दर का लाभ केवल अमीरों को ही मिलता है गरीबों को उसका कोई लाभ नहीं मिल पाता। उपरोक्त

गरीबों द्वारा चुने विकल्पों

का सम्मान करने

की जरूरत

वाउचर और सशर्त नगदी देने के नए साधन सामाजिक सेवा प्रदाताओं में प्रतियोगिता पैदा कर सकते हैं और उपभोक्ताओं को विकल्प दे सकते हैं। सरकार स्कूलों को पैसा देने के बजाय अभिभावकों को स्कूल वाउचर देगी। जिन्हें वे शिक्षा की सेवा हासिल करते समय सरकारी या प्रायवेट स्कूलों में इस्तेमाल कर सकते हैं। अब सरकारी पैसा केवल सरकारी स्कूलों का एकाधिकार नहीं होगा। वह ऐसे किसी भी स्कूल को उपलब्ध होगा जिसे

प्रतियोगिता है महामंत्र

गुररचरण दास ने सही निदान किया है – भारत समृद्ध हो जाएगा लेकिन आनंदित नहीं होगा यदि हमने शासन पद्धति को ठीक नहीं किया।। अच्छी शासन पद्धति आर्थिक समृद्धि और आनंदपूर्ण और परिपूर्ण जीवन के के बीच की कड़ी है। सचेतन या अवचेतन रूप से लोगों और राजनीतिज्ञों में शासन पद्धति की महत्व को समझना शुरू कर दिया है। लेकिन महसूस करना एक बात है और यह जानना अलग बात है कि उसे हासिल कैसे किया जाए।

जय देसाई की एकाउंटेबिलिटी डिफीशिट (जवाबदेही की कमी )पुस्तक बहुत सही समय पर आई है जिसमें शासन विधि

मार्च 2012 के संसद के बजट की शुरूआत परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति के अभिभाषण से हुई। अभिभाषण में राष्ट्रपति ने सबसे ज्यादा बल उनकी सरकार के अन्न सुरक्षा बिल को लागू करने  के उद्देश्य पर दिया । राष्ट्रपति का भाषण सारी सरकार के लिए मार्गदर्शक होता है। इसलिए बजट भाषण में प्रणवदा भी इस मुद्दे पर बल देते यह स्वाभाविक ही था। प्रणवदा ने कहा कि इसे  सरकार पारित करवाने के लिए  कृतसंकल्प है। उन्होंने जोर देकर कहा इससे अन्न उपलब्ध कराना  कानूनी बाध्यता  (–लीगल इंटायटलमेंट) बन जाएगा। लेकिन उनके भाषण से ऐसा नहीं लगा कि अन्न सुरक्षा  संवैधानिक या

धर्मार्थ कार्य के क्षेत्र में सक्रिय ग्लोबल बिजनेस कंसल्टेंसी फर्म बेन एंड कंपनी द्वारा विगत दिनों विश्व के अनेक देशों में एक अध्ययन कराया गया। यह अध्ययन अलग-अलग राष्ट्रों के नागरिकों द्वारा किए जाने वाले धर्मार्थ कार्यों व उनकी रूचियों से संबंधित था। वैसे तो संस्था द्वारा यह अध्ययन समय-समय पर कराया जाता है और इसकी रिपोर्ट भी जारी की जाती है लेकिन संस्था द्वारा इस वर्ष जारी अध्ययन रिपोर्ट भारत के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। संस्था की रिपोर्ट में भारतीयों विशेषकर यहां के युवाओं में धर्मार्थ कार्यों के लिए दान देने की प्रवृत्ति में सकारात्मक परिवर्तन आने की बात कही गई है

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