सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के जरिये छह से चौदह साल के हर बच्चे के लिए शिक्षा तक पहुंच का विस्तार करना,गुणवत्ता बढ़ाना और भागीदारी सुनिश्चित करना शिक्षा के अधिकार कानून का बहुत बड़ा वायदा है। इस कानून के तहत नियम बनाना राज्यों के हाथों में है और राज्य इस महान वायदे को पूरा करने के लिए नियम बना रहे हैं।

हम जब शिक्षा का अधिकार कानून की दूसरी वर्षगांठ मना रहे हैं तब 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से गोवा और कर्नाटक को छोड़कर शेष  33 राज्यों ने नियमों को अधिसूचित कर दिया है। हालांकि गंभीर आशंकाएं थी कि कानून के कुछ प्रावधान उस मकसद में

शिक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार की महत्वपूर्ण पहल थी शिक्षा का अधिकार कानून 2009।इस क्षेत्र के कई पर्यवेक्षकों और विशेषज्ञों की दलील थी कि  इस कानून में कई प्रमुख समस्याएं हैं।यह कानून बच्चों और अभिभावकों के हितों पर फोकस करने के बजाय सार्वजनिक क्षेत्र के आश्रित सेवा प्रदाताओं के हितों पर फोकस करता है। शैक्षणिक प्रक्रिया के साधनों पर ज्यादा ध्यान देता है भले ही उसके नतीजे कुछ भी हों। यह उन प्रायवेट स्कूलों को दंडित करता है जिनके पास साधनों की कमी होती है इस बात का खयाल किए बगैर कि सरकारी स्कूलों के मुकाबले इन स्कूलों की पढ़ाई के नतीजे

आठवे दशक में कई वर्षों तक भारतीय अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्र की प्रासंगिकता पर बहस होती रही। यह माना गया कि आजादी के बाद के शुरूआती वर्षों में निजी क्षेत्र के पास लोहा,इस्पात,भारी मशीनरी,मशीन टूल्स और रेलवे वैगन या बड़े बांध,बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन और वितरण संयंत्र में निवेश करने के लिए संसाधन नहीं थे।केवल सरकार ही देश या विदेश से ऐसे संसाधन जुटा सकती थी। यही बात एयरलाइन्स ,एयरपोर्ट,और लक्जरी होटलों पर भी लागू होती थी। लेकिन 1980-81 में भारत की बचत दर 18.4 प्रतिशत तक पहुंच गई और उसकी विदेशी निवेश को आकर्षित करने की क्षमता भी बढ़ी।

इन दिनों उत्तर प्रदेश के रोजगार केंद्रों के दिन फिर गए हैं पिछले कई वर्षों से उजाड़ पड़े रहनेवाले रोजगार केंद्रो में फिर लंबी-लंबी कतारें लगने लगी हैं। उजाड़ पड़े रहने की वजह यह थी कि  सरकार के पास देने के लिए नौकरियां हैं कहां। जब रोजगार केंद्रों में नौकरियां मिलती नहीं तो भला लोग जाएं किस लिए। सरकार के पास देने के लिए नौकरियां अब भी नहीं है लेकिन नई सरकार नई रोशनी लेकर आई है। उसका वायदा है कि (हम रोजगार नहीं दे सकते तो क्या) बेरोजगारी का भत्ता देंगे। लोग भी यह सोचकर खुश हैं कि भागते भूत की लंगोटी भली। सरकार से जो भी मिल जाए बुरा क्या

कभी कम्युनिस्ट पार्टियां भारत में कम्युनिस्ट क्रांति का सपना देखते हुए नारा लगाती थी लालकिले पर लाल निशान मांग रहा है हिन्दुस्तान। लेकिन वक्त के सितम तो देखिए कुछ ही दशकों में देश का कम्युनिस्ट आंदोलन टुकड़े टुकड़े होकर बिखर गया ।कभी देश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाली कम्युनिस्ट पार्टियां इतनी कमजोरहो चुकी है कि अब वे राजनीति के हाशिये पर पहुंच चुकी हैं। हाल ही में देश की दो प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टीयों का महाअधिवेशन जिसे कांग्रेस कहा जाता है संपन्न हुआ।भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस पटना में हुई  तो मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की केरल के

मार्क्स और ऐंजिल्स  पश्चिम बंगाल के पाठ्यक्रम से हटाए जाएंगे- यह खबर पिछले दिनों सारे मीडिया की सुर्खियों में छाई रही। अकादमिक और बौद्धिक हल्कों में इसे लेकर तीखी प्रतिक्रिया हुई। इसे इसतरह से पेश किया गया कि ममता बनर्जी राजनीतिक प्रतिशोध की भावना से ग्रस्त होकर विश्व के मान्य इतिहास को अपने ढंग से तोड़ना मरोड़ना चाहती हैं। जब इसे लेकर तीखा विवाद हुआ तो  पश्चिम बंगाल के शिक्षामंत्री ने सफाई दी कि ऐसा कुछ नहीं है केवल पाठ्यपुस्तकों में से सोवियत क्रांति वाले अध्याय को हटाया जा रहा है। उसके बजाय उसमें भारत के इतिहास से जुड़ी जानकारी डाली जा रही है। इसके अलावा

मेरे प्रिय आत्मन !

एक मित्र ने पूछा है कि पूंजीवाद तो स्वार्थ की व्यवस्था है फिर भी आप उसका समर्थन कर रहे हैं ?

इस संबंध में थोड़ी सी बात समझ लेना जरूरी है। पहली बात तो यह है कि आजतक मनुष्य को जो गलत बातें सीखायी गई हैं उनमें से एक गलत बात यह है कि अपने लिए जीना बुरा है। मनुष्य पैदा ही इसलिए होता है कि अपने लिए जिये ! मनुष्य को समझाया जाता रहा है कि दूसरों के लिए जियो,अपने लिए जीना बुरा है।बाप बेटे के लिए जिये और बेटा फिर अपने बेटे के लिए जिये ; और इस तरह से न बाप जी पाए न बेटा जी पाये।समाज के लिए जियो,राष्ट्र के लिए

मराठी के लोकप्रिय अखबार लोकसत्ता के आयडिया एक्सचेंज में पिछले दिनों किसान नेता और उदारवादी चिंतक शरद जोशी को बुलाया गया था । इस कार्यक्रम में अखबार के संपादकीय विभाग के लोग मेहमान के साथ विभिन्न मुद्दों पर बातचीत करते हैं। इस कार्यक्रम में शरद जोशी देश की कृषि की समस्याओं और उसके समाधान के बारे में विस्तार और बेबाकी के साथ अपने विचार रखे । हम लोकसत्ता से साभार इस बातचीत के अंश दो किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं। मराठी में हुई इस बातचीत का अनुवाद किया है – सतीश पेडणेकर ने। यहां प्रस्तुत है उसकी दूसरी किस्त -

अभिजित

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