सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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धर्मार्थ कार्य के क्षेत्र में सक्रिय ग्लोबल बिजनेस कंसल्टेंसी फर्म बेन एंड कंपनी द्वारा विगत दिनों विश्व के अनेक देशों में एक अध्ययन कराया गया। यह अध्ययन अलग-अलग राष्ट्रों के नागरिकों द्वारा किए जाने वाले धर्मार्थ कार्यों व उनकी रूचियों से संबंधित था। वैसे तो संस्था द्वारा यह अध्ययन समय-समय पर कराया जाता है और इसकी रिपोर्ट भी जारी की जाती है लेकिन संस्था द्वारा इस वर्ष जारी अध्ययन रिपोर्ट भारत के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। संस्था की रिपोर्ट में भारतीयों विशेषकर यहां के युवाओं में धर्मार्थ कार्यों के लिए दान देने की प्रवृत्ति में सकारात्मक परिवर्तन आने की बात कही गई है

मैंने सुना है ख्रुश्चैव के बारे में एक मजाक। ख्रुश्चैव एक पार्टी मीटिंग में बोल रहा था।बोलते वक्त वह स्टालिन की निंदा कर रहा था। तो एक आदमी ने पीछे से खड़े होकर कहा कि महाशय ,स्टैलिन के जिन कामों की आप निंदा कर रहे हैं और कह रहे हैं कि लाखों लोगों की हत्या की ,साइबेरिया भेजा ,जेल में डाला सारे मुल्क को खून में डुबो दिया।जो ये बातें आप कह हे हैं,जब स्टालिन यह सब कर रहा था तब भी आप स्टालिन के साथ थे। तब आप कहां चले गए थे।ख्रुश्चैव एक मिनिट के लिए चुप हो गया। फिर उसने कहा ,जिन महाशय ने ये बात कही है ,कृपा करके अपना नाम और पता बता दें।लेकिन वह फिर नहीं उठा।फिर ख्रुश्चैव ने

बुद्ध के जमाने में हिन्दुस्तान की आबादी दो करोड़ थी। यह आबादी दो करोड़ ही रहती ज्यादा नहीं हो सकती थी क्योंकि दस बच्चे पैदा होते थे और नौ को मरना ही पड़ता था। क्योंकि न तो भोजन था न दवा थी। न जगह थी न मकान था, न इंतजाम था। उनके शरीर को बचाने का कोई उपाय न था। पिछले डेढ सौ वर्षों में दुनिया में एक्सप्लोजन हुआ है मनुष्यजाति का। आज साढ़े तीन अरब लोग हैं। ये साढ़े तीन अरब लोग पूंजीवाद की व्यवस्था के कारण जीवित हैं अन्यथा वे जीवित नहीं रह सकते थे – पूंजीवादी व्यवस्था के बिना कल्पना से बाहर है कि साढ़े तीन अरब पृथ्वी पर जी जाएं।

पूंजीवाद ने क्या

कहा जाता है कि सुप्रसिद्ध अभिनेत्री  सराह बर्नहार्ट डिक्शनरी भी पढ़ती थी तो लोगों को इतना भावुक कर देती थी कि वे रो पड़ते थे। प्रणव मुखर्जी ने सर्विस टैक्स न लगनेवाले क्षेत्रों की सूची को तमाम ब्यौरों के साथ  पढ़ते हुए वैसा ही कमाल कर दिखाया। वित्तमंत्री ने ऐसी सूची क्यों इतने विस्तार से पढ़नी चाहिए यह एक रहस्य है।

यह अपना अस्तित्व बचाने के लिए जो भी थोड़ा बहुत किया जा सकता है वह करनेवाला बजट है। पिछले वर्ष के लिए विकास दर 8.5 प्रतिशत होने का जो अनुमान लगाया गया था वह हकीकत में 6.9 रह गई है। लगभग सालभर मुद्रास्फीति दहाई के अंकों में

पार्थ जे शाह देश के जानेमाने उदारवादी चितंक और अर्थशास्त्री है। इसके अलावा वे दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फार सिविल सोसायटी के संस्थापक और अध्य़क्ष है। अर्थशास्त्र के कई क्षेत्रों में उन्होंने महत्वपूर्ण शोधकार्य किया है। इसकेअलावा फ्रीडमैन आन इंडिया, प्रोफाइल इन करेज :डिसेंट आन इंडियन सोशलिज्म, डू कार्पोरेशन्स हैव सोशल रिसपांसिबिलिटी?, सोशल पालिसी एड चेंज आदि कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं और कई पुस्तकों का संपादन किया है। बौद्धिक हल्कों में आर्थिक स्वतंत्रता के विषय पर उनके चिंतन को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। हाल ही में सतीश पेडणेकर ने बजट पर उनकी

गुरूचरण दास देश के सुप्रसिद्ध लेखक और चिंतक है जो जिन्हें उनके बेबाक विचारों के लिए जाना जाता है। देश विदेश के अखबारों में छपनेवाली उनकी आर्थिक और अन्य विषयों पर टिप्पणियों को बहुत गंभीरता से पढ़ा जाता है। उनकी मुक्त भारत (इंडिया अनबाउंड)आजाद भारत में आ रहे आर्थिक परिवर्तनों का गहन विश्लेषण है जो उनकी दिशा को भी बहुत अचूक तरीके से इंगित करती है। उनकी एक और महत्वपूर्ण पुस्तक है - अच्छाई की कठिनाई (द डिफीकल्टी आफ बिइंग गुड)। इसके अलावा उन्होंने कई नाटक भी लिखे हैं ।हाल ही में सतीश पेड़णेकर ने उनसे केंद्रीय बजट

भारतीय जनता पार्टी के नेता जगदीश शेट्टीगार जानेमाने अर्थशास्त्री भी है। पिछले दिनों सतीश पेडणेकर ने उनसे बजट और वर्तमान आर्थिक स्थिति पर बातचीत की। प्रस्तुत है यहां उसके कुछ अंश -

पहले बजट का उद्देश्य आर्थिक नीति की दिशा तय करना था लेकिन कहा जाता है कि अब वह बैलेंस आफ बुक ही रह गया है। आपका इस बारे में क्या कहना है?

पहले भी बजट का मकसद होता था  आर्थिक नीति की दिशा तय करना आज भी वही है। लेकिन हालात कई बार ऐसे  हो जाते  है कि वह दिशा स्पष्ट नहीं हो पाती। उदाहरणार्थ अभी

पिछले  सोमवार को कपास उत्पादक किसानों और कपास व्यापारी जब अपने काम पर गए तो उन्हें पता चला कि सरकार ने खेल के दौरान ही नियम बदल दिए हैं। विदेश व्यापार माहनिदेशक ने घोषणा की कपास के  और निर्यात पर तुरंत लागू होनेवाली पाबंदी लगा दी गई है।

इससे पहले इन  सभी भले लोगों ने यही सोचा होगा कि  उन्होंने दूसरों के साथ जो योजनाएं बनाई है  अनुबंध किए हैं उसे वे पूरा करेंगे। कुछ लोगों ने यह सोचकर कर्ज भी लिया होगा कि उन्होंने अपने कपास के लिए एक मूल्य हासिल कर लिया है। दूसरी जगहों पर व्यापारियों ने यही सोचकर अपने ग्राहकों को कपड़ा और

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