सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी एक अजीब शख्सियत है। पिछले एक दशक में वे  देश के सबसे विवादास्पद नेताओं में से रहें हैं। न उनसे नफरत करनेवालों की कमी है न ही उनके तारीफ के पुल बांधनेवालों की। कुछ लोगों की नजर में विनाश पुरूष है जिसने गुजरात में सांप्रदायिक सद्भावना के तानेबाने को नेस्तनाबूद कर दिया, जिसके हाथ निर्दोष मुसलमानों के खून से रंगे हैं। तो कुछ लोग उन्हें विकास पुरूष मानते हैं जिसने गुजरात के विकास को नई ऊचाइयां दीं उसे विकास का सर्वनाम बना दिया। इस बारें में कोई दो राय नहीं हो सकती कि सारे देश के लिए  विकास की मिसाल बनता जा रहा है गुजरात। लेकिन जेट

सस्पैंस खत्म हो गया है। प्रणब मुखर्जी का अगला राष्ट्रपति बनना निश्चित लगता है। यूपीए गठबंधन के पास विजय को सुनिश्चित करने के लिए वोट कम हैं लेकिन सपा के मुलायम सिंह और बसपा की मायावती दोनों ने उनका समर्थन किया है। इससे प्रणब विजयी हो जाएंगे भले ही ममता बनर्जी यूपीए से अलग हो जाएं।

लेकिन पिछले हफ्ते का राजनीतिक घटनाचक्र इतना ऊथळ पुथल भरा था कि उसने यूपीए की कमजोरी को उजागर कर दिया और उसकी विश्वसनीयता को नुक्सान पहुंचाया ।जो भी यह सोचता है कि राष्ट्रपति चुनाव में यूपीए की जीत उसे ताकतवर  और अपनी नीतियों को लागू करने में सक्षम बनाएगी उसके बारे

उदारवादी अर्थशास्त्री क्रिस्टोफर लिंगल पिछले दिनों भारत यात्रा पर आए हुए थे।उन्होंने सेंटर फार सिविल सोसायटी के चिंतन श्रृंखला के अतर्गत दो भाषण दिए। वे ग्वाटेमाला के विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर है इसके अलावा सेंटर फार सिविल सोसायटी में रिसर्च स्कालर हैं।राजनीतिक अर्थशास्त्र और अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र उनकी दिलचस्पी के मुख्य विषय रहे हैं।जिन्हें वे उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं पर फोकस करते हैं। उनकी सिंगापुर के राजनीतिक अर्थशास्त्र पर लिखी  Singapore's Authoritarian Capitalism: Asian Values, Free Market Illusions, and Political Dependency और  The Rise

उदारवादी अर्थशास्त्री क्रिस्टोफर लिंगल पिछले दिनों भारत यात्रा पर आए हुए थे। उन्होंने सेंटर फार सिविल सोसायटी  की चिंतन श्रृंखला के अंतर्गत दो भाषण दिए। वे ग्वाटेमाला के विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर है इसके अलावा सेंटर फार सिविल सोसायटी में रिसर्च स्कालर हैं।राजनीतिक अर्थशास्त्र और अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र उनकी दिलचस्पी के मुख्य विषय रहे हैं जिन्हें वे उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं पर फोकस करते हैं। उनकी सिंगापुर के राजनीतिक अर्थशास्त्र पर लिखी  Singapore's Authoritarian Capitalism: Asian Values, Free Market Illusions, and Political Dependency और  

नोबल पुरस्कार विजेता मिल्टन फ्रीडमैन (1912-2006)पिछली सदी के उन कुछ अर्थशास्त्रियों में से थे जिन्होंने सारी दुनिया की आर्थिक सोच और नजरिये को बहुत गहरे तक प्रभावित किया और उसे नए आयाम दिए।इस वर्ष इस महान उदारवादी अर्थशास्त्री की जन्म शताब्दी मनाई जा रही है। यहां प्रस्तुत है उनके लेखों  और पुस्तकों से लिए गए कुछ उद्धरण जो उनकी अनूठी आर्थिक दृष्टि को उजागर करते हैं।

  • इतिहास बताता है कि राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए पूंजीवाद आवश्यक शर्त्त है लेकिन यह स्पष्ट है कि यह शर्त पर्याप्त  नहीं है।
  • कौनसा समाज

नोबल पुरस्कार विजेता मिल्टन फ्रीडमैन (1912-2006)पिछली सदी के उन कुछ अर्थशास्त्रियों में से थे जिन्होंने सारी दुनिया के आर्थिक सोच और नजरिये को बहुत गहरे तक प्रभावित किया और उसे नए आयाम दिए।इस वर्ष इस महान उदारवादी अर्थशास्त्री की जन्म शताब्दी मनाई जा रही है। यहां प्रस्तुत है उनके लेखों  और पुस्तकों से लिए गए कुछ उद्धरम जो उनकी अनूठी आर्थिक दृष्टि को प्रस्तुत करते हैं।

  • जो समाज समानता को स्वतंत्रता से ज्यादा महत्व देता है उसे दोनों ही नहीं मिल पाते ।जो समाज स्वतंत्रता को समानता महत्व देता है उसे काफी मात्रा में दोनों ही मिल दाते हैं

एक मित्र ने पूछा है – कि आप समाजवाद और साम्यवाद की जो आलोचना कर रहे हैं डैमोक्रटिक समाजवाद (लोकतांत्रिक समाजवाद)  के बारे में शायद आपने विचार नहीं किया।

डेमोक्रेटिक सोशलिज्म या लोकतांत्रिक समाजवाद आत्मविरोधी शब्दों से निर्मित हुआ है जैसे कोई कहे वंध्या-पुत्र । बांझ स्त्री का बेटा, अगर कोई कहे तो जैसी गलती होगी वैसी ही यह गलती है। अगर बच्चा है तो स्त्री बांझ न रही होगी, अगर स्त्री बांझ है तो बच्चा नहीं हो सकता है। इसलिए वंध्यापुत्र शब्द तो बनता है सत्य नहीं होता है। डैमोक्रेटिक सोशलिज्म जैसी कोई चीज नहीं है, शब्दभर है। क्योंकि समाजवाद लाने

माकपा मार्क्सवादी है या मर्डरवादी? केरल में विद्रोही माकपा कार्यकर्त्ता और रिवोल्यूशनरी मार्क्सिस्ट पार्टी के नेता चंद्रशेखरन की हत्या के बाद एक बार फिर इस सवाल ने तूल पकड लिया है। चंद्रशेखरन का भूत माकपा की गर्दन पर सवार होकर उससे ही उसकी खूनी राजनीति को उजागर करवा रहा है। पिछले दिनों केरल माकपा के एक नेता मणि ने कार्कर्त्ताओं की बैटक में शेखी बघारते हुए बताया कि किस तरह माकपा अपने विरोधियों का चुन-चुन सफाया करती रही है ।इस सिलसिले में उन्होंने बताया कि किस तरह पार्टी ने तीन विरोधी नेताओं और कार्यकर्त्ताओं की हत्याएं करवाई । इसके बाद तो देश की राजनीति में तूफान खड़ा हो

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