सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब वित्तमंत्री भी बन गए हैं। उनका वित्तमंत्री के रूप में पहला कार्यकाल(1991-96) आर्थिक सुधार का महत्वपूर्ण कालखंड़ था जिसने भारत को अंतर्राष्ट्रीय भिखारी से संभावित महाशक्ति में बदल दिया। क्या मनमोहन सिंह के वित्तमंत्री के रूप में दूसरा कार्यकाल में भी वैसे ही साहसिक सुधार देखने को मिलेंगे?

इसके आसार नहीं हैं। मनमोहन सिंह आठ वर्ष तक प्रधानमंत्री के तौरपर बिल्कुल शक्तिहीन रहे हैं। यह सब उनके वित्तमंत्री बनने के बाद बदल नहीं जाएगा क्योंकि वास्तविक सत्ता तो सोनिया गांधी के हाथों में है।

उनकी आर्थिक

एक मित्र ने पूछा है कि समाजवाद –परार्थवाद, अलट्रुइस्टीक व्यवस्था है, पूंजीवाद –स्वार्थवादी, सेल्फिश व्यवस्था है। आप परार्थवादी व्यवस्था का विरोध करते हैं और स्वार्थ की व्यवस्था का समर्थन करते हैं। इसका क्या कारण है?

सबसे पहले तो बात यह ध्यान में लेने जैसी है कि इस जगत में न तो कोई परार्थवादी पैदा हुआ है न हो सकता। इसका कोई उपाय ही नहीं है । परार्थवाद एक असंभावना है। और इस सत्य को जितना टीक से समझा जा सके उतना पाखंड से बचा जा सकता है। परार्थवाद के नामपर सिवाय पाखंड के कुछ भी नहीं है।असल में मनुष्य की चेतना मूलता स्वार्थी है और उचित भी है ,अनुचित

भारत का सबसे अभागा प्रधानमंत्री कौन है ? शायद नरसिंहा राव । आज नरसिंहा राव का 91 वें वा जन्मदिन है लेकिन अखबारों में एक आंध्रप्रदेश सरकार को छोड़ दें तो नरसिंहा राव को याद करनेवाला कोई विज्ञापन नजर नहीं आया। न उनकी स्मृति में कोई कार्यक्रम , न किसी  जनकल्याणकारी योजना की शुरूआत। उनकी पार्टी जो आज सरकार में हैं वह भी उन्हें भूल गई। कुछ लोगों का तो मानना है कि उनकी पार्टी तो जानबूझकर उनकी उपेक्षा कर रही है क्योंकि वे गांधी नेहरू खानदान के तो हैं नहीं । उनकी पार्टी के कुछ लोग तो उन्हें खलनायक की तरह पेश करते रहे। तभी तो उनके स्मृति में कोई राष्ट्रीय स्मारक नहीं बना ,

मिस्र में राष्ट्रपति पद के लिए  मुस्लिम ब्रदरहुड के उम्मीदवार मुर्सी की जीत ने एक  फिर यह बात साबित कर दी कि दुनियाभर के लोग जिसे लोकतंत्रिक बयार या  अरब वसंत समझ रहे थे वह इस्लामी कट्टरतावाद की आंधी या इस्लामवाद की कड़ाके की ठंड है। वैसै मिस्र, ट्युनिशिया कुछ अन्य देशों में संसदीय चुनावों में इस्लामवादियों की भारी जीत  के बाद ही इसके स्पष्ट संकेत मिलने लगे थे। पिछले कुछ समय से अरब देशों में बदलाव की आंधी चल रही थी।

एकदम -अब तख्त गिराए जाएंगे अब ताज उछाले जाएंगे –कविता का मंजर दिखाई दे रहा था।शुरूआत में तो दुनियाभर के

दुनियाभर के माओवादियों का मानना है कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है।लेकिन शायद माओवादी नेताओं को बंदूक थमाने के लिए पर्याप्त बालिग शूरमा नहीं मिल रहे हैं इसलिए वेबच्चों को बंदूक थमाकर सत्ता पाना चाहते हैं।लेकिन दुर्भाग्य से माओवादी प्रभावित  इलाकों में  जिन बच्चों को इस उम्र में स्कूल में होना चाहिए था वे वे माओवादी क्रांतियुद्ध के सैनिक बनकर क्रांतियुद्ध लड़ रहे हैं।खेलने कूदने और ढ़ने लिखने की  उम्र में उनमें से कई खूंख्वार और दुस्साहसी बन चुके हैं।

हाल ही में  संयुक्त राष्ट्र महासचिव की बच्चे और सशस्त्र संघर्ष पर सुरक्षा

मैं उन लोगों में शामिल नहीं हूं जो सब्जियां और खाने-पीने की दूसरी चीजें खरीदने बाजार जाते हैं। दरअसल मेरा मौजूदा पेशा मुझे इस सुविधा की इजाजत नहीं देता, लेकिन मुझे याद है कि जब मैं बच्चा था तो अपनी मम्मी और आंटी के साथ अक्सर बाजार जाता था। मुझे यह भी याद है कि तब मुझे कितनी बोरियत होती थी, क्योंकि मम्मी और आंटी को सब्जियां और फल छांटने में घंटों लगते थे। वे बड़ी रुचि के साथ सब्जियों और खाने-पीने की गुणवत्ता पर बहस करती थीं और खामियों की ओर इशारा करती थीं और सबसे बढि़या क्वालिटी पर जोर देती थीं। वे लगातार अलग विक्रेताओं की सब्जियों और फलों की तुलना करती रहती थीं। जब यह सब होता था उस समय मेरे

एक मित्र ने पूछा है कि आप यह मानते हैं कि विनोबाजी के सर्वोदय से समाजवाद आ सकेगा?

विनोबाजी का सर्वोदय हो या गांधीजी का, समाजवाद उससे नहीं आ सकेगा क्योंकि सर्वोदय की पूरी धारणा ही मनुष्य को आदिम व्यवस्ता की तरफ लौटाने की है। सर्वोदय की धारणा ही पूंजीवाद की विरोधी है। लेकिन पूंजीवाद से आगे ले जाने के लिए नहीं समाजवाद से पीछे ले जाने के लिए है। पूंजीवाद से दो तरह से छुटकारा हो सकता है। या तो पूंजीवाद से आगे जाएं या पूंजीवाद से पीछे लौट जाएं। लौटना कुछ लोगों को सदा सरल मालूम होता है औक आकर्षक भी। लेकिन पीछे लौटना न तो संभव है नही उचित ही। जाना सदा

जब से मुक्त अर्थव्यवस्था की शुरूआत हुई है पाठकों के कानों पर बार-बार एडम स्मिथ नामक अर्थशास्त्री का नाम बार-बार पड़ने लगा  है। मराठी साहित्य में जो स्थान ज्ञानेश्वरी का है वही स्थान अर्थशास्त्र में उनके द्वारा 1776 में लिखी गई पुस्तक `राष्ट्र की संपत्ति`(Wealth of Nations) नामक पुस्तक का है। स्मिथ ने श्रम विभाजन, विशेषज्ञता जैसे प्राथमिक सिद्धांतों से लेकर मूल्य, बाजार, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, और मुक्त अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों जैसे महत्वपूर्ण आर्थिक मुद्दों पर अत्यंत प्रवाहपूर्ण भाषा में और विस्तारपूर्वक उस पुस्तक में अपने विचार प्रगट किए हैं। व यह कहा जा सकता है

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