सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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नोबल पुरस्कार विजेता मिल्टन फ्रीडमैन (1912-2006)पिछली सदी के उन कुछ अर्थशास्त्रियों में से थे जिन्होंने सारी दुनिया के आर्थिक सोच और नजरिये को बहुत गहरे तक प्रभावित किया और उसे नए आयाम दिए।इस वर्ष इस महान उदारवादी अर्थशास्त्री की जन्म शताब्दी मनाई जा रही है। यहां प्रस्तुत है उनके लेखों  और पुस्तकों से लिए गए कुछ उद्धरम जो उनकी अनूठी आर्थिक दृष्टि को प्रस्तुत करते हैं।

  • जो समाज समानता को स्वतंत्रता से ज्यादा महत्व देता है उसे दोनों ही नहीं मिल पाते ।जो समाज स्वतंत्रता को समानता महत्व देता है उसे काफी मात्रा में दोनों ही मिल दाते हैं

एक मित्र ने पूछा है – कि आप समाजवाद और साम्यवाद की जो आलोचना कर रहे हैं डैमोक्रटिक समाजवाद (लोकतांत्रिक समाजवाद)  के बारे में शायद आपने विचार नहीं किया।

डेमोक्रेटिक सोशलिज्म या लोकतांत्रिक समाजवाद आत्मविरोधी शब्दों से निर्मित हुआ है जैसे कोई कहे वंध्या-पुत्र । बांझ स्त्री का बेटा, अगर कोई कहे तो जैसी गलती होगी वैसी ही यह गलती है। अगर बच्चा है तो स्त्री बांझ न रही होगी, अगर स्त्री बांझ है तो बच्चा नहीं हो सकता है। इसलिए वंध्यापुत्र शब्द तो बनता है सत्य नहीं होता है। डैमोक्रेटिक सोशलिज्म जैसी कोई चीज नहीं है, शब्दभर है। क्योंकि समाजवाद लाने

माकपा मार्क्सवादी है या मर्डरवादी? केरल में विद्रोही माकपा कार्यकर्त्ता और रिवोल्यूशनरी मार्क्सिस्ट पार्टी के नेता चंद्रशेखरन की हत्या के बाद एक बार फिर इस सवाल ने तूल पकड लिया है। चंद्रशेखरन का भूत माकपा की गर्दन पर सवार होकर उससे ही उसकी खूनी राजनीति को उजागर करवा रहा है। पिछले दिनों केरल माकपा के एक नेता मणि ने कार्कर्त्ताओं की बैटक में शेखी बघारते हुए बताया कि किस तरह माकपा अपने विरोधियों का चुन-चुन सफाया करती रही है ।इस सिलसिले में उन्होंने बताया कि किस तरह पार्टी ने तीन विरोधी नेताओं और कार्यकर्त्ताओं की हत्याएं करवाई । इसके बाद तो देश की राजनीति में तूफान खड़ा हो

मार्च में मैंने एक भारी जिम्मेदारी स्वीकार की - पुणे में कालेज के छात्रों के सामने पूंजीवाद की नैतिकता पर भाषण देना। जैसा कि होना था इसे कई लोगों ने नापसंद किया। मुझसे कहा गया कि पूंजीपति धोखेबाज होते हैं। वे आपका जितना शोषण कर सकते हैं  उतना शोषण करते हैं ।वे हजारों तरीके से आपसे धोखेधडी करते हैं।बनियये तो डंडी मारने और मिलावट करने के लिए कुख्यात हैं। यूरिया से लेकर किरोसीन तक जिन भी चीजो का मूल्य नियंत्रित किया जाता है वे उनकी कालाबाजारी करते हैं।  सार्वजिनक राशन दुकानों से सस्ता अनाज और शक्कर गायब कर देते हैं और उसे खुले बाजार में बेचते हैं।

डा.बाबासाहब अंबेडकर मूलत: अर्थशास्त्री थे ।उनकी सारी डिग्रियां अर्थशास्त्र की हैं।1926 में जब वे विधानमंडल में गए तो उन्होंने साहूकारी नियंत्रण कानून और एक और महत्वपूर्ण बिल पेश किया था क्योंकि इस द्रष्टा महामानव को यह लगता था कि सामान्य  आदमी आर्थिक गुलामी से मुक्त हो और आर्थिक समानता स्थापित हो। यह तभी संभव है जब निम्नवर्ग उद्योजक के रूप में उभरेगा और  अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए  अन्य उद्योगपतियों के साथ कंधे से कंधा लगा कर खड़ा होगा। इसके लिए आज मुक्त अर्थव्यवस्था ने  हमें अवसर भी प्रदान किया है। अब  दलितों को पूंजीवाद को

प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा-माओवादी ने दैनिक जागरण की ओर से उठाए गए सवालों के जैसे जवाब दिए हैं उनसे यह और अच्छे से साबित हो रहा है कि नक्सली नेता वैचारिक रूप से बुरी तरह पथभ्रष्ट हो चुके हैं और वे अपनी ही बनाई दुनिया में रह रहे हैं। वे लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त कर न केवल सत्ता हथियाने का मंसूबा पाले हुए हैं, बल्कि ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे उन्होंने सत्ता संचालन का अधिकार वैधानिक तरीके से अर्जित कर लिया है। यदि वे इस खुशफहमी में नहीं होते तो सगर्व यह नहीं कह रहे होते कि फिरौती-उगाही करना इसलिए जायज है, क्योंकि उन्हें इतने बड़े तंत्र को चलाना पड़ रहा है। वे जिसे

एक मित्र ने पूछा है कि इतने गरीब है इनकी जिम्मेदारी अमीरों पर नहीं है?

मैं आपसे कहता हूं, बिल्कुल नहीं है। इनकी जिम्मेवारी इन गरीबों पर ही है। इसको थोड़ा समझ लेना जरूरी होगा।

बड़े मजे की बात है कि किसी गांव में दस हजार गरीब हो और दो आदमी उनमें से मेहनत करके अमीर हो जाएं तो बाकी नौ हजार नौं सौ निन्यानबे लोग कहेंगे कि इन दो आदमियों ने अमीर होकर हमको गरीब कर दिया। और कोई यह नहीं पूछता कि जब ये दो आदमी अमीर नहीं थे तब तुम अमीर थे? तुम्हारे पास कोई संपत्ति थी जो इन्होंने चूस ली। नहीं तो शोषण का मतलब क्या होता है? अगर हमारे

अक्सर कहा जाता है कि हम भारतीयों में सेंस आफ ह्यूमर की भारी कमी है।हमारे सांसदों ने यह साबित कर दिया कि यह सही है। जहां तक राजनेताओं का सवाल है वे हमेशा ही कार्टूनिस्टों के निशाने पर रहे हैं आखिर क्यों न रहें? वे देश के भाग्यविधाता जो बन गए हैं और उन्होंने देश का जो हाल बनाया है उसके बारे में सभी जानते हैं। मगर इस देश में लोकतंत्र है और लोगों को अभिव्यक्ति का अधिकार मौलिक अधिकार के तौर पर मिला हुआ है इसलिए वे  व्यंग्यबाण चुपचाप झेलने को मजबूर थे। लेकिन पहला मौका मिलते ही उन्होंने कार्टूनिस्टों को निशाना बना डाला। उनके कार्टूनों को चुन-चुनकर पाठ्यपुस्तकों से निकाल

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