सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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हमारे देश में जनतंत्र के स्वस्थ विकास के मार्ग में कौन-कौन सी बाधाएं हैं? इस प्रश्न के उत्तर में सबसे पहली बाधा है हमारे मतदाताओं की प्रकृति। इस तथ्य को भुलाया नहीं जा सकता कि हमारे मतदाताओं का बहुमत अशिक्षित है और उसका परिणाम हमारी सम्पूर्ण राजनीति एवं व्यवस्था पर पड़े बिना नहीं रह सकता। इसका परिणाम राजनीतिज्ञों, उनके व्यवहार, उनके कार्यों और कार्य करने की विधि के स्तर पर बहुत ही स्पष्ट है। मैं समझता हूं कि इसके ऊपर हमने गम्भीर विचार नहीं किया। संविधान सभा के सदस्य के नाते, मुझे स्मरण है, मैंने कभी दो मिनट भी यह सोचने में नहीं लगाए कि वयस्क मताधिकार होना चाहिए अथवा नहीं

बहुत मैला है ये सूरज
किसी दरिया के पानी में
उसे धोकर सजाएँ फिर
 
गगन में चाँद भी
कुछ धुँधला-धुँधला है
मिटा के इस के सारे दाग-धब्बे
जगमगाएँ फिर
 
हवाएं सो रहीं हैं पर्वतों पर
पाँव फैलाए
जगा के इन को नीचे लाएँ
पेड़ों में बसाएँ फिर
 
धमाके कच्ची नींदों में
उड़ा देते हैं बच्चों को
धमाके खत्म कर के
लोरियों को गुनगुनाएँ फिर
 
वो

वॉशिंगटन डीसी में भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु एक सच बात कह गए। उन्होंने वहां उपस्थित अपने श्रोताओं से कहा कि उनकी सरकार की निर्णय क्षमता पंगु हो चुकी है और २०१४ के चुनावों तक किसी तरह के सुधारों की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। अलबत्ता, बाद में उन्होंने इस बयान का खंडन किया, क्योंकि इससे उन्हीं की सरकार की फजीहत हो रही थी, लेकिन सच्चाई तो यही है कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा, जो भारत में पिछले दो सालों से नहीं कहा जा रहा था। वॉशिंगटन में बसु के श्रोता हैरान थे कि भारत जैसा जीवंत लोकतंत्र, जो एक उभरती हुई आर्थिक ताकत है और जिसकी सिविल सोसायटी ऊर्जावान है, की

राष्ट्रीय आय में पांच प्रतिशत प्रति वर्ष की वृद्धि पूरीतरह संभव है।भारत में वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान के विशाल संसाधन उपलब्ध हैं जिनका दोहन नहीं हुआ है। 150 साल पहले अमेरिका की आर्थिक  भी ऐसी ही थी क्योंकि वहां भी ऐसे संसाधन मौजूद थे जिनका दोहन नहीं हुआ था। इसलिए बुनियादी मुद्दा यह है कि कैसे ऐसी सामाजिक और आर्थिक संरचना बनाई जाए जो इन संभावनाओं के वास्तविकता में बदले। इसके लिए बुनियादी जरूरत है कि निरंतर और मंथर गति से विस्तारित होनेवाला मौद्रिक ढांचा,शिक्षण और प्रशिक्षण की अवसरों का भारी विस्तार ,परिवहन और संचार की सुविधाओं में सुधार और किसानों,उद्योगपतियों और

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा भारत का निवेश का माहौल असंतोषजनक है और कई क्षेत्रों में विदेशी निवेश को सीमित करता है।–टाइम –पत्रिका ने एक आवरण कथा छापी जिसमें प्रधानमंत्री को फिसड्डी कहा ।इस पर कई भारतीयों ने तीखी प्रतिक्रिया दी जिसे बचकाना ही कहा जा सकता है।

इस तरह की आलोचना बहुत आम है ।बहुत सारे भारतीय कई बरसों से यही बात कह रहे हैं।इसलिए इसमें कोई नई बात नहीं है।फिर भी बहुत से भारतीय  आक्रोश प्रगट कर रहे हैं षड़यंत्र के सिद्दांत को भी पेश कर रहे हैं।यह सब  किसी बिगडैल बच्चे के गुस्सेभरे आंसू  जैसा है ।लेकिन इस बच्चे को अब

पिछले हफ्ते तीन कपड़ा मिलों से हटाए गए 26 बच्चों को गिरफ्तार किया गया और बचपन बचाओ आंदोलन ने उन्हें सरकारी  बाल कल्याण गृहों में रखा।

लेख में उनके लिए बचाया गया शब्द का इस्तेमाल किया गया। लेकिन उन्हें किससे बचाया गया ? लेख में बताया गया है कि कई बच्चे भाग निकले जो पकड़े गए वे रो रहे थे। क्या उन्हें खाई से निकाल कर कुए में धकेला जा रहा है।

कोई बाल मजदूरी का समर्थन नहीं करना चाहता खासकर जब बच्चे कठोर और खतरनाक स्थितियों में काम कर रहे हों। लेकिन जिस देश में बड़े पैमाने पर गरीबी हो वहां बाल मजदूरी विरोधी कानून और

प्रभावशाली व्यक्तित्व और ओजस्वी वक्तृत्व के धनी प्रकाश जावड़ेकर भारतीय जनता पार्टी के  राष्ट्रीय प्रवक्ता भी हैं और महाराष्ट्र से  राज्यसभा के सांसद भी।  हाल ही में सतीश पेड़णेकर ने उनसे देश में गहराते आर्थिक संकट और उसके बारे में उनकी पार्टी के नजरिये के बारे में बात की ।यहां हम उस बातचीत को अविकल प्रस्तुत कर रहे हैं।

देश में बहुत तेजी से आर्थिक संकट गहरा रहा है। क्या यह विश्व के कई देशों में फैल रहे आर्थिक संकट के प्रभाव के कारण है या  देश की सरकार की गलत नीतियों के कारण।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब वित्तमंत्री भी बन गए हैं। उनका वित्तमंत्री के रूप में पहला कार्यकाल(1991-96) आर्थिक सुधार का महत्वपूर्ण कालखंड़ था जिसने भारत को अंतर्राष्ट्रीय भिखारी से संभावित महाशक्ति में बदल दिया। क्या मनमोहन सिंह के वित्तमंत्री के रूप में दूसरा कार्यकाल में भी वैसे ही साहसिक सुधार देखने को मिलेंगे?

इसके आसार नहीं हैं। मनमोहन सिंह आठ वर्ष तक प्रधानमंत्री के तौरपर बिल्कुल शक्तिहीन रहे हैं। यह सब उनके वित्तमंत्री बनने के बाद बदल नहीं जाएगा क्योंकि वास्तविक सत्ता तो सोनिया गांधी के हाथों में है।

उनकी आर्थिक

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