सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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मुझे फेविकोल का एक चर्चित विज्ञापन याद आता है जिसमें एक बस को दिखाया गया है कि कैसे बस के अंदर-बाहर और ऊपर तमाम लोग लदे हुए हैं। देश के अद्र्घशहरी तथा ग्रामीण इलाकों में यह दृश्य आम तौर पर देखा जा सकता है। विज्ञापन खत्म होता है और बस के पिछले हिस्से में फेविकोल का बोर्ड नजर आता है। हालांकि यह भारत में प्राय: नजर आने वाला एक विशिष्ट दृश्य है, वहीं यह भारतीयों के 'जुगाड़' के स्वभाव का भी परिचायक है। बस की बात करें तो उसमें जितनी सीट होती हैं, उससे कहीं अधिक लोगों को बस में बिठाया जा सकता है, इसके अलावा ढेर सारे लोग खड़े होकर और बस की छत पर बैठकर भी सफर कर सकते हैं बल्कि

असम के कई हिस्सों में आए सांप्रदायिक हिंसा में उबाल ने हमें यह सवाल पूछने को मजबूर कर दिया है –बांग्लादेशी आव्रजकों का  मुद्दा केवल भारत के लिए ही क्यों समस्या बन गया है ? इसका बिल्कुल तैयार जवाब यह है कि ज्यादातर आव्रजन अवैध है। बात सही भी है इसका गैर कानूनी होना इससे जुड़ी अर्थव्यवस्था  को भूमिगत कर देता है और इसे संगठित अपराधियों ,  भ्रष्ट नौकरशाहों और बेईमान नेताओं के हाथों में सौंप देता है जो इससे पैदा होनेवाले वोट बैंक का इस्तेमाल करते हैं।यह केंद्र और राज्य सरकारों को राजस्व के स्रोतों से वंचित कर देता है जो उसे मिलते यदि अर्थव्यवस्था कानूनी होती।

एक दूसरे मित्र ने पूछा है कि पूंजीवाद में भ्रष्टाचार, ब्लैक मार्केटिंग है, रिश्वत है। इन सबके लिए आप क्या कहते हैं?

इस सबका कारण पूंजीवाद नहीं है। इस सबका कारण पूंजी का कम होना है। जहां पूंजी कम होगी वहां भ्रष्टाचार नहीं रोका जा सकता। लोग होंगे बहुत,पूंजी होगी कम तो लोग सब तरह के रास्तें खोजेंगे पूंजी की मालकियत करने के । अगर दुनिया से भ्रष्टाचार मिटाना है तो भ्रष्टाचार मिटाने की फिक्र न करें। भ्रष्टाचार केवल बाइ प्रोडक्ट है उससे कोई लेना देना नहीं है। लेकिन सारे नेता भ्रष्टाचार मिटाने में लगे हैं। सारे साधु भ्रष्टाचार मिटाने में लगे हैं। वे

इस वर्ष मानसून बहुत कमजोर रहा जैसा 1965 में रहा था। लेकिन इस बार इसे थोड़ी बड़ी असुविधा से ज्यादा महत्व नहीं दिया जा रहा जबकि 1965 में यह दैत्याकार और भयावह आपदा थी। भारत पर अब सूखे का असर न पड़ना एक यशोगाथा है लेकिन  ऐसी जिसे आमतौर पर गलत समझा गया है।

छठे दशक में भारत अमेरिकी अनाज सहायता  पर बुरी तरह निर्भर था । यहां तक 1964 में जब मानसून बहुत अच्छा रहा तब भी भारत को 70लाख टन अनाज की सहायता लेनी पड़ी थी जो घरेलू उत्पादन के दस प्रतिशत से कहीं ज्यादा थी। उसके बाद भारत में दो साल 1965और 1966 में दो बार सूखा पड़ा और अनाज की पैदावार घटकर

आजादी के बाद के भारत की पहचान उसकी समाजवादी विचारधारा रही है लेकिन धीरे-धीरे वह बदला लेकिन 1991 के उदारवादी सुधारों को लागू करने के बाद भी वह मुक्त व्यापार और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के लिए प्रतिकूल है। कम्युनिस्ट पार्टी की दमनकारी नीति के कारण पश्चिमी उदारवाद चीन में जड़े नहीं जमा सका। इस तरह दोनों ही देशों की कोई खास विचारधारा नहीं है। लेकिन चीन भारत की तरह बेखबर नहीं है।चीन का एक स्पष्ट लक्ष्य है – आर्थिक वृद्धि और विकास और उसे हासिल करने के लिए एक  सुनिश्चित राह है ।यह बात अलग है कि उसने मुक्त बाजार के सिद्धांतों को समाजवादी विचारधारा की ओट में छुपा रखा है।

इस साल 31 जुलाई को विश्वविख्यात नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन की सौंवा जन्मदिन मनाया जाएगा। फ्रीडमैन न केवल आर्थिक वरन सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्रता को अत्यंत महत्व देनेवाले व्यक्ति थे।उनकी सोच  भारत के संदर्भ में कितनी प्रासंगिक है इस पर विचार करने की जरूरत है।

इस संदर्भ में एक बहुत दिलचस्प बात यह है कि फ्रीडमैन का भारत से बहुत गहरा रिश्ता था। 1967 में उनके नोबल पुरस्कार जीतने से बहुत पहले 1955 में प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस जाने माने अर्थशास्त्री को भारत में यहां की आर्थिक योजनाओं को मार्गदर्शन देने के

बड़े उद्योगपति नहीं छोटे और मंझोले व्यवसायी होंगे विकास के वाहक

भारत के आर्थिक संकट का मुख्य कारण है सही आर्थिक नीति का अभाव – यह कहनेवाले मिल्टन फ्रीडमैन ने भारत सरकार को दिए अपने स्मरण पत्र में बताया था कि हमारी आर्थिक नीति में असल गड़बड़ कहां है। इस संदर्भ में उन्होंने सबसे पहले निवेश नीति की आलोचना की थी जो निवेश – आउटपुट अनुपात पर बहुत ज्यादा जोर देती थी। फ्रीडमैन की दलील थी कि इन दोनों के बीच सीधा नहीं एक ढीलाढाला  संबंध है क्योंकि प्रमुख उत्पादक शक्ति भौतिक पूंजी नहीं मनुष्य होते हैं। उनका कहना था कि पूंजी की मात्रा जितनी

न संसाधनों का अभाव न क्षमता का, अभाव है सही आर्थिक नीति का

नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन बीसवी सदी के उन कुछ गिनेचुने अर्थशास्त्रियों में से थे जिन्होंने अपने समय के आर्थिक चिंतन को बहुत गहरे तक प्रभावित किया और आर्थिक विकास के राह ही बदल दी। वे आर्थिक –राजनीतिक  स्वतंत्रता के ऐसे दिग्गज दाशर्निक थे जिन्होंने मंदी से उबरने के लिए सरकारी हस्तक्षेप को अनिवार्य़ बतानेवाले केंज के आर्थिक चिंतन पर कुठारधातकर  एक बार फिर मुक्त बाजार की सोच की विजय का झंडा गाड़ा। उन्होंने अपने समय के दो सबसे शक्तिशाली

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