सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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देश के अदिवासियों और पर्यावरण के कई हितैषी और सेंटर फार सिविल सोसायटी जैसी कई संस्थाएं लम्बे समय से बांस को घास घोषित किये जाने के लिए अभियान चलाती रहीं है। बांस समर्थको की मांग रही है कि भारतीय वन कानून (1927) को संशोधित किया जाए और कानून की धारा 2(7) में से बांस को पेड़ों की सूची से हटाया जाए. आखिर क्यों बांस को घास की श्रेणी में रखा जाना चाहिए? क्योंकि यह घास की तरह पनपता है, इसकी उत्पादकता बहुत ज्यादा है तथा इसे कई तरह के कामों में इस्तेमाल किया जाता है इसलिए जाहिर तौर पर इसमें बहुत अधिक आर्थिक संपन्नता लाने की क्षमता है। ऐसे में अगर लोगों को बांस उगाने, उसे

पिछले वर्ष केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर स्पष्ट किया है कि बांस दरअसल घास है न कि इमारती लकड़ी। उनका यह पत्र निश्चित रूप से सार्थक दिशा में उठाया गया एक कदम  था । अब नईं पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने भी बांस के दस हजार करोड़ के व्यापार को पर नौकरशाही के एकाधिकार को खत्म करने के लिए उनके कई एतराजों को खारिज कर उन्होंने बांस को  लघु वन उपज घोषित कर दिया है। इससे आदिवासियों को बांस उगाने और बेचने की अनुमति मिल जाएगी। यदि जयंती नटराजन का फैसला सचमुच जमीनी स्तरपर लागू हो सका तो इससे करोड़ों आदिवासियों के

लघु, सूक्ष्म और मझोले उद्योगों के नए मंत्री वयलार रवि ने हाल ही में कहा कि अगर स्वीडन की रिटेल कंपनी आइकिया के देश में आने से स्थानीय छोटी और सूक्ष्म इकाइयों पर असर पड़ेगा तो इस विदेशी कंपनी के लिए नियमों में बदलाव नहीं किया जाएगा। आइकिया अगले 10 से 15 सालों में देश में 1.5 अरब यूरो (10,500 करोड़ रुपये) का निवेश करने को तैयार है, बशर्ते सरकार एकल ब्रांड खुदरा में विदेशी निवेश से जुड़े कुछ नियमों में रियायत बरतने को तैयार हो। आइकिया जैसी रिटेल कंपनियों के लिए अपने माल का 30 फीसदी भारत की छोटी कंपनियों (जिनका कारोबार 5 करोड़ रुपये से कम का हो) से खरीदना अनिवार्य

प्रजा केंद्रित विकास ही सुशासन का मूल तत्व है। इतिहास गवाह कि जब –जब जन सामान्य को विकास का केंद्र और साझीदार बनाया गया, तब-तब उस राज्य ने सफलता और और समृद्धि की ऊंचाइयों को छुआ है । प्रजा की भागीदारी के बिना किसी भी राज्य ने प्रगति नहीं देखी। हमारे सभी महानायकों ने इस तथ्य को अच्छी तरह से जाना और समझा।

सदियों पहले ऐसे ही महानायक थे – छत्रपति शिवाजी महाराज । वह एक कुशल प्रशासक और सफल शासक थे। उन्होंने सुशासन के आधार पर समाज की स्थापना कर इस देश के इतिहास पर अपनी अमिट छाप छोड़ी।

यह पुस्तक

मेरे मत में भूमंडलीकरण या कंवर्जेस का विरोध करना पागलपन है। सिएटल में विरोध का जो प्रदर्शन हुआ वह पागलपन था। विरोध करनेवालों में कई श्रमिक संगठनवादी थे जो अपने बाजार की रक्षा कर रहे थे। विरोध करनेवालों की कोशिश है कि भारत के उत्पादन उनके यहां न पहुंचे। लेकिन विश्व व्यापार संगठन का प्रयास है कि सब आगे बढ़े। विश्व व्यापार से गरीब और अमीर दोनों को समान लाभ पहुंचे। इसलिए स्वदेशी के नाम पर संरक्षण चाहनेवालों की एक ही कोशिश है कि वे अपने समाज और देश को बंद रखना चाहते हैं क्योंकि ऐसे लोगों के विशेष हित होते हैं। भारत के श्रमिक संगठनों और वामपंथियों ने भी देश को विश्व

मेरे भूमंडलीकरण के संबंध में साफ विचार हैं। अर्थशास्त्र में एक पुरानी बात बतलाई जाती है । यदि व्यापार और पूंजी निवेश के आधार पर गरीब देश का संबंध अमीर देश के साथ स्थापित हो जाता है तो कालांतर में दोनों देशों का जीवन स्तर समान हो जाता है । इसे ‘थ्योरम आफ कंवर्जेंस’कहा जाता है। यह एडम स्मिथ का विचार है। 20वी सदी के नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री पाल सैमुअलसन ने  इस सिद्धांत को सिद्ध भी कर दिया था।

यह विचार सीधा सा है ; जीवनस्तर  उत्पादकता पर निर्भर करता है और उत्पादकता प्रौद्योगिकी पर निर्भर करती है। यह स्वत:सिद्ध

हमारे शिक्षाशास्त्र को परीक्षाओं को परे देखना चाहिए और छात्रों को उनके सपने पूरे करने में मदद करनी चाहिए।कई दशकों से यह बहस चल रही है कि भारत कैसी शिक्षा नीति को अपनाए।अमिर खान की फिल्म –थ्री इडियट- ने इस बहस को तेज कर दिया है।फिल्म में एक फ्लैशबैक का दृश्य है जिसमें नायक अपने पसंद की क्लासों में जाता है और वह छात्र बड़ा होकर मशहूर वैज्ञानिक बनता है। यह फिल्म शिक्षा व्यवस्था और विशेषकर परीक्षा के जरिये मूल्यांकन करने पर सवाल उठाती है।मेरी नजर में यह आलोचना सही है। हमारे देश में हम शिक्षा का जो क्लासरूम माडल अपनाते है वह आदिम किस्म का है। और हम अंधे होकर उसका

उत्तर भारत में लगातार दो दिन तक बिजली गुल होने की घटना को न तो नजरअंदाज किया जाना चाहिए और न ही इसका गलत आकलन किया जाना चाहिए। विश्लेषकों ने यही निष्कर्ष निकाला कि यह खतरा तो बना हुआ था। उन्होंने पर्यावरणीय और वन्य स्वीकृति की प्रक्रिया में होने वाली देरी को इसके लिए जिम्मेदार बताया और नियामकीय ढांचे को समाप्त करने की मांग की ताकि इस क्षेत्र की जटिलताओं को समाप्त किया जा सके। इसके साथ ही उन्होंने अपने पसंदीदा जुमले को फिर दोहराया यानी किसानों को मिलने वाली 'मुफ्त' बिजली, जिसकी वजह से राज्यों के बिजली बोर्ड भारी वित्तीय बोझ के तले दबे हैं। ये सभी विवेचनाएं सरल और गुमराह

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