सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

इस पेज पर विभिन्न लेखकों द्वारा विभिन्न विषयों पर लिखे गये लेख दिये गये हैं। पुरा लेख पढ़ने के लिये उसके शीर्षक पर क्लिक करें। आप लेख पर अपनी टिप्पणीयां भी भेज सकते हैं।

जानकारी के मुताबिक पिछले पांच वर्षों के दौरान भारतीय कंपनियों ने छह बड़े राजनीतिक दलों को 4,400 करोड़ रुपये से अधिक धनराशि दान में दी है। इन दलों के नाम हैं- कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा), माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा), समाजवादी पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा)। भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा जुटाए गए ये आंकड़े टाइम्स ऑफ इंडिया समाचार पत्र द्वारा प्रकाशित किए गए हैं। राजनीतिक दलों को जिस पैमाने पर धन की आवश्यकता होती है उस लिहाज से देखा जाए तो यह धनराशि काफी कम प्रतीत होती है। लेकिन यह याद रखना होगा कि कारोबारी घरानों

मल्टी ब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश का तीखा विरोध करनेवाली भारतीय जनता पार्टी में इस मुद्दे को लेकर तीखे मतभेद पैदा होते जा रहे हैं। उसके बहुत से नेताओं को यह लगने लगा है कि मल्टी ब्रांड रिटेल में विदेशी निवेश देश के लिए लाभकारी साबित होगा। उनका मानना है कि भाजपा आज भले ही इसका विरोध कर रही हो लेकिन पहले  वह रिटेल में विदेशी पूंजी निवेश का समर्थन करती रही है।

हाल ही में जानेमाने अर्थशास्त्री ,भाजपा के नेता और उसकी आर्थिक सेल के पूर्व अध्यक्ष जगदीश शेट्टीगार ने एक एक आर्थिक समाचार पत्र को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि उनकी पार्टी सैद्धांतिक रूप

एक महानगरी में भीड़ थी। रास्ते पर लाखों लोग खड़े थे जो आतुरतापूर्वक सम्राट के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। कुछ समय पश्चात सम्राट की सवारी आई। भीड़ के सभी लोग सम्राट के वस्त्रों की चर्चा करने लगे और मजा यह कि सम्राट बिल्कुल नंग्न था । उसके शरीर पर वस्त्र थे ही नहीं। केवल एक छोटे से बच्चे को ,जो अपने बाप के कंधों पर बैठकर गया था बड़ी हैरानी हुई। उसने अपने बाप से कहा कि लोग सम्राट के सुंदर वस्त्रों की चर्चा कर रहे हैं मुझे तो सम्राट नग्न दिखाई पड़ रहा है। उसके बाप ने उससे कहा –चुप नासमझ ,कोई सुन लेगा तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी और वह बच्चे को लेकर भीड़ से बाहर हो गया।

बड़े जतन से शुरू की गई महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) एक बार फिर अर्थशास्त्रियों और मीडिया के एक बड़े वर्ग के निशाने पर है। आलोचना करने वालों में सरकार के भी कुछ लोग  शामिल हैं। इस मसले को लेकर निशाने पर हैं तीन बिंदु। एक, मनरेगा की वजह से कृषि क्षेत्र में मजदूरों की कमी हो गई है। दूसरे, इससे खेतिहर मजदूरी बढ़ गई है और इस नाते खेती करना अब आर्थिक दृष्टि से फायदेमंद नहीं रह गया है। आलोचना का तीसरा आधार यह है कि मनरेगा की वजह से मुद्रास्फीति बढ़ी है। सवाल है, आखिर ये आशंकाएं क्यों उठी है और किस हद तक वे वाजिब है?

[आधुनिक उत्पादन-व्यवस्था का मंत्र ‘लेजे फेयर’ एडम स्मिथ का मौलिक विचार नहीं था, उसने तो सिर्फ इसका समर्थन किया था. यह जानने के बावजूद आर्थिक उदारीकरण और बाजारवाद के आलोचक उसको वर्तमान पूंजीवादी अराजकता के लिए जिम्मेदार मानते हैं. कतिपय यह सही भी है. लेकिन वे भूल जाते हैं कि स्मिथ ने लोगों को यह कहकर सावधान भी किया था कि पूंजीपति उत्पादन प्रक्रिया में किसी कल्याण-भावना से नहीं, विशुद्ध स्वार्थपरता के कारण हिस्सा लेता है. इसलिए उसपर नजर रखने की जरूरत है. मगर अधिकांश देशों की सरकारें पूंजीपतियों पर नजर रखना तो दूर, उल्टे उनके हाथों की कठपुतली की तरह काम करती हैं. विद्वान

अच्छे इरादवाले कानून और गरीब
दमघोटू लाइसेंस व्यवस्था  के अलावा कई तरह के नियम भी बाधाएं खड़ी करते हैं।इनमें से कई नियमों का उद्देश्य तो अच्छा होता है लेकिन उनके नतीजे विकृत होते हैं। दिल्ली में एक कानून है कि रिक्शा को चलानेवाले और उसका मालिक एक ही व्यक्ति होना चाहिए। रिक्शा किराए पर देना गैरकानूनी है। इस कानून का मकसद मालकियत को बढ़ावा देना और रिक्शाचालकों का उन लोगों के द्वारा शोषण को रोकना है  जो कई रिक्शा खरीदकर उनको किराए पर उठाते हैं। लेकिन उन आव्रजकों का क्या जिनके पास पर्याप्त पैसे नहीं होते और जिनके पास और कोई कौशल होता भी नहीं

वर्ष 1991 के बाद आर्थिक सुधारों पर किसी भी चर्चा में एक बात अक्सर कही जाती है –अमीर अमीर हो रहे हैं और गरीब और गरीब । 1991 वह साल था जिसके बाद देश में अंदरूनी आर्थिक सुधारों के जरिये उदारीकरण की शुरूआत हुई तो दूसरी तरफ देश के बाजारों को बाहरी प्रतियोगिता के लिए खोला गया। बहुत से लोग यह महसूस करते हैं कि इस उदारीकरण और वैश्वीकरण का लाभ गरीबों को नहीं मिला।

आर्थिक स्वतंत्रता का असमान वितरण
इस आरोप को विश्व बैंक के इस आंकड़े के आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि भारत में 1994 में गरीबी की रेखा के नीचे रहनेवालों की संख्या 36

टीम अन्ना ने अनशन तोड़ते हुए घोषणा की कि अब वह राजनीतिक दल बनाएगी। यह एक लोकप्रिय जनांदोलन की असामयिक मौत है वहीं एक राजनीतिक दल के जन्म की शुरूआत।इन दोनों ही फैसलों पर मिलीजुली प्रतिक्रिया हुई है। लेकिन एक बात तो है ही किसी आंदोलन का निराश और हताश होकर अपने को राजनीतिक दल में तब्दील होने के बारे में सोचना कोई शुभ संकेत नहीं है। यह इस बात का प्रतीक है कि हमारी सरकारे बहरी हैं जो जनता की बाते सुनने को तैयार नहीं है।लेकिन अन्ना के आंदोलन के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता  क्योंकि उसे थोड़े समय के लिए ही सही जो अपार जनसमर्थन मिला उसने सरकार और राजनीतिक दलों को एक बार तो

Pages