सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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अमेरिकी  लेखिका और चिंतक आयन रैंड  की गिनती बीसवी सदी की ऐसी हस्तियों में होती है जिन्होंने हजारों लाखों लोगों को अपने विचारों की प्रखरता से झकझोरा, उनके जीवन को नया अर्थ दिया। उनके कई उपन्यास जैसे फाउंटेन हैड,एंथम और एटलस श्रगड आदि दुनियां भर में काफी लोकप्रिय रहे ,उनकी लाखों प्रतियां बिकीं और वह अपने पाठकों की जिंदगी और सोच का हिस्सा बन गईं। अपनी अपार साहित्य संपदा के द्वारा आयन रैंड बीसवी सदी में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पूंजीवाद प्रखर प्रवक्ता बनकर उभरी । यहां प्रस्तुत है पूंजीवाद के बारे में उनके कुछ विचार –

यदि हम

आज की भारतीय राजनीति राजनीतिज्ञों से कम और सुप्रीम कोर्ट और महा लेखा नियंत्रक (सीएजी)द्वारा ज्यादा संचालित हो रही है।इसका भारतीय राजनीति पर क्या असर पड़ेगा?

जवाब यह है कि हम भारत की संवैधानिक संस्थाओं द्वारा भ्रष्ट और बेरहम राज्य के खिलाफ बगावत देख रहे हैं। एक अंतर्निहित राजनीतिक साझिश यह सुनिश्चित करती है कि सभी राजनीतिक दल बड़े पैमाने पर ऱिश्वत और भाईभतीजावाद में बड़े पैमाने पर लिप्त  होते हैं। ऐसे माहौल में नतीजे केवल न्याय से नहीं वरन पैसे, बाहुबल और प्रभाव से तय होते हैं।

भारत की संवैधानिक संस्थाओं ने अपने को

गतिरोध के देवता

आपके तर्क उनकी श्रेष्ठता के आधार पर सफल हो सकते हैं। लेकिन अगर किसी दूसरे सम्माननीय मंत्रालय का नाम ले लें तो यह बहुत बड़ी गलती होगी। आज हमारे देश में हमारी सरकार के हर सम्माननीय मंत्रालय के महान देवताओं का आदेश है कि दूसरे सम्माननीय मंत्रालय के हर प्रयास का विरोध करें,भीतरघात करें और  उसे नाकाम बनाएं।

इन सम्मानीय मंत्रालयों ने यह तय किया हुआ है कि उनमें से हरेक का दूसरे से लड़ना धर्म है। इस प्रक्रिया में भारतीय उद्योगों को गला गोटा जाएऔर देश को गतिरोध और यथास्थिति में बना कर रखा जाए।

हमारे देश के मौजूदा यथास्थिति की विडंबना यह है कि भारतीय उद्योग हमारे वर्तमान शासकों की तुलना में अंग्रेजी शासन में ज्यादा स्वतंत्र थे।परमिट कोटा राज के दौरान यह बात इतने स्पष्ट रूप से उभर कर आई फिर भी किसी को यह बात चर्चा के योग्य नहीं लगी कि 1920 में जेआरडी टाटा भारत में इस्पात उद्योग खड़ा करने में कामयाब रहे लेकिन 1956 से 1991 तक भारत के किसी नागरिक को टाटा का अनुकरण करने की इजाजत नहीं मिली।

तुगलक अभी जिंदा है

नौवें दशक में प्रधानमंत्री नरसिंहा राव ने (जिनके योगदान को बहुत ही कम करके  आंका जाता है )भारतीय

पूंजीवाद में संकट तो आते रहेंगे ,समाजवाद में न संकट होंगे न प्रगति –जयतीर्थ राव

दक्षिण भारत के उद्योगपति और देश की आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर बेबाकी से अपनी कलम चलानेवाले लेखक जयतीर्थ राव की गितनी देश के जानेमाने उदारवादी चिंतकों में होती है। देश के कई प्रमुख समाचार पत्रों में उनके लेख छपते रहते हैं। पिछले दिनों वे मिल्टन फ्रीडमैन की जन्मशती पर आयोजित समारोह में भाषण देने दिल्ली आए हुए थे। आजादी.मी के संपादक सतीश पेडणेकर ने उनसे वैश्विक  आर्थिक संकट,भारत की आर्थिक स्थिति पर बातचीत की ।यहां हम उस

लाइसेंस कोटा राज तो अंग्रेजों की तानाशाही से ज्यादा क्रूर था – राव

दक्षिण भारत के उद्योगपति और देश की आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर बेबाकी से अपनी कलम चलानेवाले लेखक जयतीर्थ राव की गितनी देश के जानेमाने उदारवादी चिंतकों में होती है। देश के कई प्रमुख समाचार पत्रों में उनके लेख छपते रहते हैं। पिछले दिनों वे मिल्टन फ्रीडमैन की जन्मशती पर आयोजित समारोह में भाषण देने दिल्ली आए हुए थे। आजादी.मी के संपादक सतीश पेडणेकर ने उनसे वैश्विक  आर्थिक संकट,भारत की आर्थिक स्थिति पर बातचीत की ।यहां हम उस बातचीत को अविकल

कोयला खदानों के आबंटन को लेकर सीएजी की रपट संसद में पेश होने के बाद यूपीए सरकार कोयले की आंच में बुरीतरह  झुलस रही है। कोयले की दलाली में उसके केवल हाथ ही काले नहीं हुए वरन मुंह भी काला हुआ है।ऐसी छीछालेदार हो रही है कि ईमानदारी  के साक्षात अवतार माने जानेवाले प्रधानमंत्री भी कटघरे में खड़े हैं। वह भी छोटे –मोटे नहीं 1लाख 86 हजार करोड़ रूपये के । इस बार एक दिन में तीन सीएजी रपटे संसद में पेश हुई और सभी में सरकारी भ्रष्टाचार को उजागर किया गया है।इसके बाद हर बार की तरह सरकार और विपक्ष के बीच आरोपों और प्रति आरोपों का शीतयुद्ध शुरू हो गया । लेकिन गंभीर बात यह है

सचमुच आज काट दी हमने
जंजीरें स्वदेश के तन की
बदल दिया इतिहास बदल दी
चाल समय की चाल पवन की 
 
देख रहा है राम राज्य का
स्वप्न आज साकेत हमारा
खूनी कफन ओढ़ लेती ह
लाश मगर दशरथ के प्रण की
 
मानव तो हो गया आज
आज़ाद दासता बंधन से पर
मज़हब के पोथों से ईश्वर का जीवन आज़ाद नहीं है।
तन तो आज स्वतंत्र हमारा, लेकिन मन आज़ाद नहीं है। 
 
हम शोणित से सींच देश के 
पतझर

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