सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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दो दशक पूर्व लाइसेंस, परमिट, कोटा आधारित प्रशासनिक व्यवस्था के दौर में जब अधिकांश सेवा प्रदाता कंपनियां सार्वजनिक क्षेत्र की यानि सरकारी हुआ करती थीं तब उपभोक्ताओं के लिए उन सेवाओं को हासिल करना टेढ़ी खीर हुआ करती थीं। बात चाहे हवाई जहाज की यात्रा करने की हो या टेलीफोन कनेक्शन लेने की, ऐसी सेवाएं लग्जरी की श्रेणी में शामिल हुआ करतीं थीं और स्टेटस सिंबल के तौर पर जानी जाती थीं और मध्यवर्ग के लिए ऐसा कर पाना किसी बड़े सपने के पूरा होने से कम नहीं हुआ करता था। इसके अलावा सेवा की गुणवत्ता की बात करना तो जैसे दूसरी दुनियां की बात थी। लेकिन आज

सिंगापुर में सात वर्ष तक प्रवास करने और प्रॉक्टर एंड गैम्बल लिमिटेड में काम करने के बाद दस साल पहले सन् 2007 में मैं भारत लौट आया। भारत में शिक्षा की तस्वीर बदलने की इच्छा मुझमें बलवती हो रही थी क्योंकि हमारे बच्चों को यहां मिलने वाली शिक्षा की खराब गुणवत्ता से मैं बेहद असंतुष्ट था। शिक्षा के प्रारूप को समझने के लिए मैनें भारत की गिनी चुनी लिस्टेड एजुकेशन कंपनियों में से एक – ज़ी लर्न लिमिटेड के साथ मुख्य कार्यकारी अधिकारी के तौर पर पांच वर्ष तक जुड़ा रहा। इससे मुझे शिक्षा के स्कूल और प्री स्कूल वाले प्रारूप के बारे में विस्तृत समझ प्राप्त

थिंकटैंक सेंटर फार सिविल सोसायटी (सीसीएस), उदारवादी वेबपोर्टल आजादी.मी एकबार फिर लेकर आए हैं पत्रकारों के लिए अवार्ड विनिंग कार्यक्रम ipolicy 2017. 16-18 जून 2017 तक एटलस नेटवर्क व एडलगिव के संयुक्त तत्वावधान में पत्रकारों के लिए ipolicy (लोकनीति में सर्टिफिकेट) कार्यक्रम के आयोजन के लिए इस बार उत्तराखंड के रमणीय स्थल नौकुचियाताल का चयन किया गया है। कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आवेदन करने की की अंतिम तिथि 31 मई 2017 थी जिसे बढ़ाकर अब 5 जून कर दिया गया है। इस तीन दिवसीय (दो रात, तीन दिन) आवासीय कार्यक्रम का उद्देश्य

निजी स्कूलों की मनमानी फीस बढ़ोत्तरी और उस पर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की तरफ से की जा रही कार्रवाई इन दिनों चर्चा में है। बेशक निजी स्कूलों को मनमाने ढंग से फीस में बढ़ोत्तरी को अनुमति नहीं दी जा सकती। लेकिन फीस बढ़ोतरी नियंत्रित कैसे हो इसके तरीके अलग अलग हो सकते  हैं। निजी स्कूलों के फीस नियंत्रण पर चर्चा करने से पहले एक अहम सवाल यह है कि छठवें और सातवें वेतन आयोग के बाद अध्यापकों के वेतन में जो बढ़ोत्तरी हुई है, क्या उसी अनुपात में सरकारी स्कूलों की शिक्षा का स्तर भी बढ़ा है? जब तक इन सवालों पर विचार नहीं किया जाएगा, सरकारी

प्राचीन काल में सुकीर्ति नामक एक प्रतापी राजा हुआ करता था। उसके राज्य का नाम था अनंतप्रस्थ जिसकी राजधानी थी सूर्यनगर। अनंतप्रस्थ के निवासी अपने राजा का बहुत ही आदर करते थे। आदर करते भी क्यों नहीं, राज्य के विकास और सबकी भलाई ही सुकीर्ति के जीवन का एकमात्र उद्देश्य जो था। सुकीर्ति अपने राज्य के निवासियों की भलाई के लिए दिन-रात, सुबह-शाम बिना रुके, बिना थके काम करता रहता था और अपने साथ अपने दरबारियों और मंत्रियों पर भी कड़ी निगरानी रखता था। देश में रोजगार को बढ़ावा देने के लिए राजा ने सुकीर्ति ने राजधानी सूर्यनगर के बीचोबीच एक विशाल हाट का

कुछ कारण से आधिकारिक रूप से ऐसा माना जाता है कि भारतीयों को आमोद-प्रमोद से नफरत है। कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे नेता अथवा अदालतें ऐसे आमोद-प्रमोद को खत्म करने संबंधी किसी फैसले पर एक पल भी नहीं सोचतीं। जब तक इरादा अच्छा हो तो हमें किसी भी मौज-मजे की चीज को कुचलने पर कोई आपत्ति नहीं होती। फिर चाहे उस फैसले से कुछ मूल्यवान हासिल न भी हो।

इस प्रवृत्ति का सबसे बड़ा शिकार शराब रही है। हम इसे मौज-मजे का पापपूर्ण रूप मानते हैं। हमें न जाने क्यों लगता है कि सरकार को इस पर यथासंभव लगाम लगानी

प्राइवेट स्कूल प्रत्येक वर्ष फीस में कुछ न कुछ बढ़ोतरी अवश्य करते हैं। बच्चों को मिलने वाली गुणवत्ता युक्त शिक्षा के ऐवज में आमतौर पर अभिभावकों यह स्वीकार्य भी होता है। हालांकि, हाल फिलहाल में अलग अलग मदों में होने वाली फीस वृद्धि को अनापेक्षित व अनावश्यक बताते हुए अभिभावकों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। वे अब सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करने लगे हैं।

सत्ता एवं विपक्ष सहित समस्त राजनैतिक दलों ने इस मौके को भुनाते हुए फीस नियमन व स्कूल प्रबंधन को नियंत्रित करने की तरफ कदम बढ़ा

राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे दोनों तरफ पांच सौ मीटर की दूरी पर से शराब की दुकानें हटाने का सुप्रीम कोर्ट ने आदेश क्या दिया, राज्य सरकारों ने शराब की दुकानें आबादी में लगाने की तैयारियां शुरू कर दीं। इसकी वजह से महिलाएं गुस्से में हैं। लेकिन इस फैसले ने कई सवाल भी खड़े किए हैं। मसलन यह कि क्या गारंटी है कि पांच सौ मीटर दूर होने के बावजूद शराब पीकर लोग गाड़ियां नहीं चलाएंगे। सवाल यह भी है कि क्या शराब पीकर गाड़ी चलाने वाले लोग हाईवे से पांच सौ मीटर दूर स्थित दुकानों पर नहीं जाएंगे। इस फैसले की काट ढूंढ़ी जाने लगी है। कुछ राज्यों में तो

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