सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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जिस दिन सरकार ने डीजल के दाम बढ़ाए, मैंने बड़े ध्यान से ‘आम आदमी’ की प्रतिक्रिया टीवी के समाचार चैनलों पर सुनी। सुनने के बाद इस निर्णय पर पहुंची हूं कि सोनिया-मनमोहन सरकार की सबसे बड़ी गलती अगर है, तो वह यह कि उन्होंने जनता को कभी नहीं बताया कि आर्थिक सुधार अनिवार्य क्यों हो गए थे। इस देश के आम आदमी को 1991 में नहीं बताया कि अगर वित्तमंत्री मनमोहन सिंह ने उस समय आर्थिक दिशा न बदली होती, तो संभव है कि कंगाली की नौबत आ जाती। यह नहीं बताया कभी कि पिछले दो दशक में जो खुशहाली भारत में फैली वह मुमकिन न होती अगर अर्थव्यवस्था की वार्षिक वृद्धि तीन फीसद से बढ़ कर नौ फीसद तक न

कनाडा के  फ्रेजर इंस्टीट्यूट और नई दिल्ली स्थित सेंटर फार सिविल सोसायटी द्वारा पिछले दिनों जारी की गई विश्व आर्थिक स्वतंत्रता : वार्षिक रपट 2012 दुनिया भर में आर्थिक स्वतंत्रता की स्थिति  के बारे में रपट एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।ईमानदारी से जीवन यापन करने के लिए बिना किसी अनावश्यक दखल के उत्पादन और व्यापार करने की स्वतंत्रता ही आर्थिक स्वतंत्रता का सार है।इसके अंतर्गत आते हैं संपत्ति रखने,उसका उपयोग करने और बेचने का अधिकार ,विवादों का समुचित और शीघ्र समाधान करने और अनुबंधों को लागू करने का अधिकार और जीवन और संपत्ति की संपूर्ण सुरक्षा ताकि हर कोई सुरक्षित और

शायद ही कोई ऐसा दिन हो, जब पाकिस्तान से कोई सकारात्मक खबर आती हो। धर्म के मामले में तो कोई अच्छी खबर शायद ही पढऩे या सुनने को मिले। हालांकि, इधर एक सप्ताह के भीतर वहां से ऐसी दो खबरे आई हैं, जिनसे लगता है कि पाकिस्तान सरकार ऐसा कानून लाने जा रही है जिससे अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा भड़काने में धर्म का इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके।

पिछले सप्ताह चौदह साल की ईसाई लड़की रिमशा मसीह पर ईशनिंदा का आरोप लगाने वाले मुल्ला मोहम्मद खालिद चिश्ती ने खुद ही गिरफ्तार दे दी। उस पर इसी ईशानिंदा विरोधी कानून के तहत मामला बनाया गया है। मामले में

श्रीमान यशवंत सिन्हा (और उनकी जैसी सोच वाले भाजपा के अन्य सदस्यों), क्या मैं आपको यह सुझाव देने का दुस्साहस कर सकता हूं कि आप एक संवाददाता सम्मेलन (शायद वित्त मंत्री पी चिदंबरम के साथ संयुक्त रूप से ) बुलाएं और निम्रलिखित घोषणाएं करें: पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की तर्ज पर देशभक्ति और किसी तरह पक्षधरता से मुक्त होकर भाजपा संप्रग सरकार के साथ मिलकर काम करेगी ताकि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को तत्काल लागू किया जा सके। जैसा कि आप सब अच्छी तरह जानते हैं, जीएसटी को पारित करने के  लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता होगी जिसे केंद्र और भाजपा शासित राज्यों में

आफ्टर द वेलफेयर स्टेट पुस्तक के संपादक डा.टाम पामर के मुताबिक आज के जनकल्याणकारी राज्य दुनिया में गहरा रहे - अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संकट और ऋण संकट जैसे दो बड़े आर्थिक संकटों के लिए सीधे जिम्मेदार है। इस  पुस्तक में पांच देशों  के अध्ययनकर्त्ताओं के जनकल्याणकारी राज्य पर निबंध हैं।

इस पुस्तक को  विश्व के मुक्त बाजार समर्थक थिंक टैंको के  सबसे बड़े एसोसिएशन एटलस नेटवर्क और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हिमायती और सरकार की भूमिका को सीमित रखने के लिए काम करनेवाले छात्र संगठन स्टूडेंट फार लिबर्टी ने प्रकाशित किया है।एटलस और एसएलएफ ने

देरसबेर ही सही मनमोहन सरकार  ने राजनीतिक दुस्साहस दिखाकर खुदरा व्यापार के क्षेत्र में विदेशी कंपनियों को लिए दरवाजे खोल दिए। इसके साथ कई तरह के विवादों के लिए भी दरवाजें के लिए भी दरवाजे खुल गए हैं। एक तरफ जहां इसे सरकार द्वारा आर्थिक सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया जा रहा है। सारा उद्योग जगत भी इसके पक्ष में हैं वहीं विपक्ष  हर सरकारी नीति का विरोध करने की अपने रवैये के तहत इसका पुरजोर विरोध कर रहा है । उसका तर्क है कि सरकार का यह फैसला करोड़ों लोगों को रोजगार देनेवाले खुदरा क्षेत्र के लिए तबाही का पैगाम लेकर आया है।जब विदेशों की दैत्याकार खुदरा

केवल भारतीयों के बीच ही नहीं, पूरे विश्व में इस बात के खूब हल्ले है कि भारत एक महाशक्ति बन रहा है। हर दिन पाश्चात्य मीडिया में कोई न कोई खबर दिखाई पड़ती है, जिसमें भारत को भविष्य की महाशक्ति के रूप में दर्शाया जाता है। जाहिर है, ये बातें एक ऐसे देश को मीठी ही लगेंगी जिसे बीसवीं सदी में हताश राष्ट्र बताया जाता था। इस हताशा का मुख्य कारण हमारा खराब आर्थिक प्रदर्शन था, किंतु सुधारों की वजह से अब भारत की अवस्था बदल गई है और आज भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।

सवाल है कि महाशक्ति है क्या बला? मेरे विचार में महानता के

संस्कृति का प्रभाव होता है या व्यवस्था का यह तय करने के लिए किसी समाजशास्त्रीय ,मनोविज्ञानीय,समाजशास्त्रीय या अर्थशास्त्रीय सिद्धांत को स्थापित कर पाना मुश्किल है। यह कह पाना मुश्किल है कि संस्कृति या व्यवस्था लोगों जिनमें शासक और शासित दोनों ही शामिल है की रोजमर्रा की गतिविधियों को किस हद तक प्रभावित करती है। संस्कृति और व्यवस्था दोनों ही गतिशील होते हैं।वे लगातार विकसित होते हैं,अंतर्क्रिया करते हैं ।दोनों ही मानवीय कर्म की उपज हैं । व्यवस्था उन लोगों की संस्कृति से प्रभावित होती है जो उसे बनाते हैं। लेकिन व्यवस्था भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि किस तरह की संस्कृति

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