सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

इस पेज पर विभिन्न लेखकों द्वारा विभिन्न विषयों पर लिखे गये लेख दिये गये हैं। पुरा लेख पढ़ने के लिये उसके शीर्षक पर क्लिक करें। आप लेख पर अपनी टिप्पणीयां भी भेज सकते हैं।

कोरोना वायरस संक्रमण के विस्फोट जैसी स्थिति को रोकने के उद्देश्य से 12 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लॉकडाऊन 4.0 की घोषणा की। इसके पूर्व पूरा देश लगभग दो महीने तक संपूर्ण लॉकडाऊन की स्थिति में रहा और इस दौरान सभी प्रकार की आर्थिक गतिविधियां ठप्प रहीं। सिर्फ ऐसे सेक्टर ही थोड़े बहुत सक्रिय रहें जिनमें वर्क फ्रॉम होम यानी घर से काम करने की संभावनाएं थी। जैसी कि उम्मीद थी, देश में हुई अभूतपूर्व बंदी का असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा जिससे उबारने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा करनी पड़ी। इसे नाम दिया गया

कोरोना संकट से लड़ने में भारत का प्रदर्शन कैसा रहा है और इससे हमें क्या सबक लेने चाहिए? 

चीनी जब ‘क्राइसिस’ (संकट) शब्द लिखते हैं तो दो ब्रशस्ट्रोक्स इस्तेमाल करते हैं। एक का मतलब है डर, दूसरे क अवसर। कुछ देश डर से भर जाते हैं, कुछ खुद को बेहतर बनाने के रास्ते तलाशते हैं। कोरोना ने हमारे देश की क्षमता की परीक्षा ली है। इसमें भारत का प्रदर्शन कैसा रहा और हमने अबतक क्या सीखा है?

पहला सबक है कि सरकार की शक्ति का हथौड़ा लोगों के जीवन पर सावधानीपूर्ण विनम्रता से पड़ना चाहिए। भारत का

1 और 2 अगस्त 1959 को मुंबई में हुए स्वतंत्र पार्टी के तैयारी सम्मेलन में इस 21 सूत्री कार्यक्रम को स्वीकार किया गया

1. स्वतंत्र पार्टी धर्म,जाति ,व्यवसाय और राजनीतिक भेदभाव के बगैर सभी को सामाजिक न्याय और अवसरों की समानता का वादा करती है।
2. पार्टी का मानना है लोगों की प्रगति,कल्याण और खुशी व्यक्तिगत पहल,उद्यमशीलता और ऊर्जा पर निर्भऱ करती है । पार्टी व्यक्ति को अधिकतम स्वतंत्रता और राज्य के न्यूनतम हस्तक्षेप, के पक्ष में हैं। राज्य पर केवल यह जिम्मेदारी होनी चाहिए कि असामाजिक गतिविधियों को रोके और दंडित करे तथा समाज के

धर्मसंकटः तालाबंदी हटने से संक्रमण बढ़ने का और जारी रहने से बेरोजगारी तथा भूख से लोगों के मरने का जोखिम

लॉकडाउन के बीच टेलीविजन पर एक गरीब प्रवासी श्रमिक को यह कहते सुना, ‘अगर कोरोना मुझे नहीं मारता है तो बेरोजगारी और भूख मार डालेगी’। असल में उसने सरकार के सामने उपलब्ध कठिन विकल्पों को अभिव्यक्त किया था कि ‘किसे जीना चाहिए और किसे मर जाना चाहिए?’ इस दुविधा का हल ही 4 मई को लॉक़डाउन खत्म होना तय करेगा। क्या हमें आज कोविड-19 से एक जिंदगी बचानी चाहिए, लेकिन इससे

वैश्विक स्तर पर उभरे कोविड-19 संकट की चुनौतियों से देश दो तरफा जूझ रहा है। शहरी आबादी के सामने कोविड से बचाव व पलायन की वजह से पैदा हो रही परिस्थिति से निपटने की चुनौती है, वहीँ दूसरी तरफ ग्रामीण भारत के सामने आजीविका के सुरक्षा का सवाल है। भारत की बड़ी आबादी गांवों में रहती है तथा उसकी आजीविका निर्भरता भी श्रम संबंधी उपक्रमों पर टिकी है। ऐसे में जब लॉक डाउन की वजह से श्रम के अवसर कम हो गये हैं, तब शहरों के साथ-साथ गांवों में आजीविका और नकदी का संकट पैदा होना स्वाभाविक है। यह संकट लॉक डाउन की स्थिति में आम जन के धैर्य व भरोसे को भी डिगा सकता है। लगभग एक महीने के संपूर्ण

अब जबकि कोविड-19 महामारी अपना आधा जीवन पार कर चुकी है, तब यह तर्क बेतुका लग सकता है कि यह अपनी तरह की संभवत: अंतिम महामारी साबित होगी। जब हम इससे निजात पा लेंगे- और ऐसा जरूर होगा- तब मुमकिन है कि हमारी दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर जाए, जिसमें वैश्विक महामारी और बड़े पैमाने पर होने वाली बीमारी अतीत की बात मानी जाए।

इस महामारी की चीन से आई शुरुआती खबरों के एकाध हफ्तों बाद ही मैंने जोर देकर कहा था कि ‘अगले 15 वर्षों के भीतर दुनिया कई वायरसों के खिलाफ ‘ऑन-डिमांड' टीके और उपचार करने में सक्षम होगी, यानी वायरस के सक्रिय होते ही उसका इलाज संभव हो

दिल्ली एक बार फिर से मिशन मोड में है। यह मिशन है ‘मिशन नर्सरी एडमिशन’। नवंबर के अंतिम सप्ताह में नर्सरी दाखिलों के लिए गाइडलाइंस जारी होने के साथ ही अभिभावकों की दौड़ शुरू हो गई है। दौड़ अपने बच्चों को एक अदद ‘बढ़िया’ स्कूल में दाखिला दिलाने की है। यह सिर्फ घर से ‘पसंद’ के स्कूल तक की ही दौड़ नहीं है, यह दौड़ है उन सभी संभावित विकल्पों को आजमाने की जो उन्हें मनपसंद स्कूल में दाखिला सुनिश्चित करा सके। इस दौरान अभिभावकों को जिस आर्थिक, शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है ये सिर्फ वही जानते हैं। हालांकि गाइडलाइंस जारी करते समय प्रत्येक वर्ष शिक्षा विभाग द्वारा

लगभग 3 करोड़ की आबादी वाली दिल्ली, दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले शहरों में से एक है। 1950 में दिल्ली की आबादी 10 लाख थी जो 2019 तक बढ़कर 2.96 करोड़ हो गई। अनुमान है कि वर्ष 2035 तक दिल्ली की जनसंख्या 4.3 करोड़ हो जाएगी। लेकिन नीति निर्धारकों की अदूरदर्शिता के कारण जिस तेजी से शहर की जनसंख्या में वृद्धि हुई उस तेजी से यहां के इंफ्रास्ट्रक्चर (भौतिक संरचना) में बदलाव नहीं हो सका। इस कारण अनके चुनौतियां पैदा हो गईं जैसे कि आवास, परिवहन, प्रदूषण, रोजगार, शिक्षा आदि आदि।
यदि हम दुनिया के अन्य अधिक जनसंख्या वाले बेहतर प्रबंधन युक्त शहरों की संरचना देखें तो हम पाएंगे कि

Pages