सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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एक तरफ जहां ये संगठन कृषि कानूनों का समर्थन करता है, वहीं इसने प्याज के निर्यात पर रोक को तत्काल समाप्त करने की मांग की है। इसने चेतावनी दी है कि यदि केंद्र सरकार उनकी इस मांग को नहीं मानती है तो वे बीजेपी के सांसदों पर प्याज फेंकेंगे।

 

सोमवार को कुछ किसान संगठनों ने कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से मुलाकात की और उन तीन कृषि कानूनों के प्रति अपना समर्थन प्रदर्शित किया जिनके विरोध में हजारों किसान दिल्ली की सीमा पर प्रदर्शन कर रहे हैं। तोमर से

पहले भारतीय गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी "राजाजी" की पुण्यतिथि पर विशेष

राजाजी को अप्रैल 1952 के प्रथम सप्ताह में मुख्यमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई, और उन्होंने कम्युनिस्टों को छोड़कर सभी समूहों के सहयोग को आमंत्रित किया। जब विधानसभा की पहली बार बैठक हुई तो सभा में विश्वास प्रस्ताव पेश करते हुए राजाजी ने यह स्पष्ट कर दिया कि कम्युनिस्ट ही वास्तव में उनके प्रमुख शत्रु हैं। राजाजी के तीखे शब्दों को यहां पुनः पेश किया गया हैः

'किसान दिवस' पर पुरूष किसानों की चर्चाएं होती हैं। जबकि, चर्चाओं की हक़दार महिला किसान भी हैं। खेती के कामों में दिया जाने वाले उनके नियमित योगदान को कमत्तर आंका जाता है। जनगणना 2011 के मुताबिक समूचे हिंदुस्तान में तकरीबन 6 करोड़ के आसपास महिला किसानों की संख्या बताई गई है। लेकिन धरातल पर उनकी संख्या कहीं ज्यादा है। बीते एकाध दशकों से ग्रामीण इलाकों के पुरूषों विशेष कर युवाओं का रुझान खेती बाड़ी के बजाय नौकरियों व व्यापार में ज्यादा बढ़ा है। उनके नौकरियों या व्यापार में चले जाने के बाद खेती बाड़ी की पूर्णता ज़िम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर ही

आंदोलन कर रहे किसानों की छवि संतों अथवा पापियों के रूप में गढ़ी जा सकती है। 1960 के दशक में जब देश भुखमरी की समस्या से जूझ रहा था तब उन्होंने हरित क्रांति की अगुवाई करके न केवल भारत को खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर बनाया बल्कि एक निर्यातक देश के तौर पर भी स्थापित किया। इसके लिए उन्हें नायक कहा जाना बिल्कुल उचित था।

लेकिन कम वर्षा वाले राज्य में चावल जैसे अत्यधिक पानी की जरूरत वाले फसलों को उगा कर पंजाब के किसानों ने भू जल स्तर को नाटकीय ढंग से कम कर दिया। इससे छोटे किसानों

किसानों को कृषि क्षेत्र में कुछेक कंपनियों का एकाधिकार न हो, कानून में ऐसे प्रावधान कराने के लिए आंदोलन करना चाहिए

प्रतिस्पर्धा युक्त मुक्त बाजार से ही किसानों को मिलेगा लाभ

पिछले 20 दिनों से देश की राजधानी दिल्ली को घेरे बैठे किसानों को हालिया कृषि सुधार कानूनों को रद्द करने के अतिरिक्त और कुछ भी मंजूर नहीं है। किसान यह तो मानते हैं कि उनके उपज के लिए एक से अधिक खरीददार का होना

वर्ष 1947 में भारत को एक विदेशी ताकत से राजनीतिक आजादी मिली थी और 1991 में भारत ने भारतीय राज्य से आर्थिक आजादी हासिल की। राजनीतिक आजादी के साथ सबको मताधिकार मिला और सभी नागरिक बराबर के भागीदार बने। बदकिस्मती से, 1991 में मिली आर्थिक आजादी का फायदा सभी नागरिकों को नहीं मिला। इसने मुख्य रुप से औपचारिक औद्योगिक क्षेत्र को लाइसेंस-परमिट-कोटा राज से मुक्ति दिलायी। आर्थिक सुधारों के दायरे में आबादी का एक बड़ा हिस्सा नहीं आया जो अपनी आजीविका औपचारिक औद्योगिक क्षेत्र के बाहर कमाता था। भारतीय समाज के सबसे निचले तबके को किसी तरह की आर्थिक आजादी नहीं

किसान आंदोलन सरकार के लिए सबक है कि सुधार थोपे न जाएं, उनपर पहले समर्थन जुटाना जरूरी है

पंजाब के किसानों के मौजूदा आंदोलन में कई सबक हैं। उनमें से एक है कि राजनीति छोटा खेल है, एक 20-20 मैच, जबकि अर्थव्यवस्था लंबा, पांच दिवसीय टेस्ट मैच है। पंजाब के किसान 20-20 खेल रहे हैं और सरकार टेस्ट मैच। इस बेमेलपन के कारण दूसरा सबक यह है कि लोकतंत्र में सुधार मुश्किल है। एक लोकवादी एक रुपए प्रतिकिलो चावल देने का वादा कर सुधारक को चुनाव में हरा सकता है।

अर्थशास्त्री और लेखक गुरचरण दास कृषि क्षेत्र में सुधार के एक बड़े पैरोकार हैं और मोदी सरकार द्वारा लागू किये गए तीन नए कृषि क़ानूनों को काफ़ी हद तक सही मानते हैं. लेकिन 'इंडिया अनबाउंड' नाम की प्रसिद्ध किताब के लेखक के अनुसार प्रधानमंत्री किसानों तक सही पैग़ाम देने में नाकाम रहे हैं. वो कहते हैं कि नरेंद्र मोदी दुनिया के सबसे बड़े कम्युनिकेटर होने के बावजूद किसानों तक अपनी बात पहुंचाने में सफल नहीं रहे.

बीबीसी से एक ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा

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