सार्वजनिक नीति - अन्य लेख

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लगभग 3 करोड़ की आबादी वाली दिल्ली, दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले शहरों में से एक है। 1950 में दिल्ली की आबादी 10 लाख थी जो 2019 तक बढ़कर 2.96 करोड़ हो गई। अनुमान है कि वर्ष 2035 तक दिल्ली की जनसंख्या 4.3 करोड़ हो जाएगी। लेकिन नीति निर्धारकों की अदूरदर्शिता के कारण जिस तेजी से शहर की जनसंख्या में वृद्धि हुई उस तेजी से यहां के इंफ्रास्ट्रक्चर (भौतिक संरचना) में बदलाव नहीं हो सका। इस कारण अनके चुनौतियां पैदा हो गईं जैसे कि आवास, परिवहन, प्रदूषण, रोजगार, शिक्षा आदि आदि।
यदि हम दुनिया के अन्य अधिक जनसंख्या वाले बेहतर प्रबंधन युक्त शहरों की संरचना देखें तो हम पाएंगे कि

वित्तमंत्री ने खतरा न उठाकर संजीदगी दिखाई, संरक्षणवाद को पलटने में नाकाम रहीं

हमारी जैसी मंदी से निपटने के केवल दो ही तरीके हैं। एक उपभोग के जरिए और दूसरा निवेश के माध्यम से। इस बजट में दूसरा तरीका अपनाया गया है और मेरे विचार में यह सही रास्ता है। उपभोग के पहले तरीके में लोगों के हाथों में बैंक ट्रांसफर के माध्यम से पैसा देना पड़ता। वे पैसा खर्च करते, सामान इस्तेमाल करते और मांग को बढ़ाते, जिससे फैक्टरियां चलतीं और अधिक नौकरियां आतीं, जिससे और खर्च बढ़ता। इस चक्र के चलने से अर्थव्यवस्था में गति आ जाती। 

इकोनॉमिक थिंक टैंक सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी के प्रेसिडेंट पार्थ जे शाह ने कहा कि सरकार ने आर्थिक सर्वेक्षण में जिस तरह से बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों के नाम और उनके विचारों का हवाला दिया, उससे उम्मीद जगी थी कि बजट में कुछ बड़े और व्यवस्थागत बदलाव पेश किए जाएंगे। लेकिन शनिवार को पेश बजट में इन विचारकों और उनके आर्थिक दर्शनों को व्यावहारिक तौर पर उम्मीद के मुताबिक लागू नहीं किया गया। दोनों दस्तावेजों को देखने से एकबारगी यह विश्वास नहीं होता है कि दोनों दस्तावेज एक ही सरकार ने पेश किए हैं।

आर्थिक मंदी की स्थिति से जूझ रही अर्थव्यवस्था में तेजी लाने का प्रयास पिछले कई महीनों से जारी है। इस प्रयास के तहत कॉर्पोरेट टैक्स में कमी करने से उद्योगों को कुछ राहत अवश्य मिली। लेकिन बाजार में वस्तुओं की मांग अपेक्षानुरूप नहीं बढ़ी। उम्मीद की जा रही थी कि बजट में आम जनता विशेषकर कर दाताओं को बड़ी राहत दी जाएगी जिससे उनके पास पैसे बचे और बाजार में मुद्रा की आवक बढ़े। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा 5 लाख तक के वार्षिक आय वालों को जीरो टैक्स, 5 लाख से 7 लाख तक वार्षिक आय पर टैक्स को 20 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत करने की घोषणा की तो यह

अर्थव्यवस्था में लेनदेन मुख्य रूप से उत्पादक और उपभोक्ता के बीच होता है। जैसे किसान सब्जी उगाता है और एक परिवार उसकी खपत करता है। यदि परिवार का कोई सदस्य गांव जाकर लौकी खरीदे तो कठिनाई होती है, इसलिए समाज ने मंडी और दुकानदार बनाए। अब यह काम इंटरनेट के जरिए होने लगा है। कई शहरों में लोगों ने सब्जी पहुंचाने की वेबसाइट बनाई है। आप सुबह अपना ऑर्डर बुक करा सकते हैं। साइट का मालिक मंडी से सब्जी लाकर सीधे आपके घर पहुंचा देगा। सब्जी पसंद न आए तो आप लौटा सकते हैं। दुकानदार और ठेले वालों की जरूरत नहीं रह गई है। इससे छोटे ही नहीं, बड़े विक्रेता भी संकट महसूस कर रहे हैं।

देश के वर्तमान आर्थिक हालात को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यदि बैकिंग ढांचा पटरी पर आ गया तो अर्थव्यवस्था की गाड़ी को रफ्तार पकड़ने में ज्यादा देर नहीं लगेगी

अब इसमें शायद ही कोई संदेह रह गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था सुस्ती के दौर से गुजर रही है। तमाम आंकड़े इसकी पुष्टि कर ही रहे हैं, बीते सप्ताह आइएमएफ यानी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी इस आर्थिक फिसलन को रोकने के लिए सरकार से अविलंब कुछ कदम उठाने के लिए कहा है। इससे पहले 12 दिसंबर की देर रात क्रेडिट रेटिंग

हमारा सामना इस असुविधाजनक सत्य से है कि हिंदुत्व व कश्मीरियत सहित हर राष्ट्रवाद काल्पनिक है

कश्मीर के राजनीतिक दर्जे में किए गए बदलाव से कश्मीरियों में गुस्सा, भय, अलगाव और आत्म-सम्मान खोने की भावना है। कई लोगों ने कश्मीरियत को पहुंची चोट को कानूनी और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखने की कोशिश की है। लेकिन जरूरत राष्ट्रीय पहचान की दार्शनिक समझ की है। खासतौर पर कश्मीरियों और भारतीयों को इस तथ्य को समझना होगा कि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पहचानें काल्पनिक हैं। हिंदुत्व और

दिल्ली एक बार फिर से मिशन मोड में है। यह मिशन है ‘मिशन नर्सरी एडमिशन’। नवंबर के अंतिम सप्ताह में नर्सरी दाखिलों के लिए गाइडलाइंस जारी होने के साथ ही अभिभावकों की दौड़ शुरू हो गई है। दौड़ अपने बच्चों को एक अदद ‘बढ़िया’ स्कूल में दाखिला दिलाने की है। यह सिर्फ घर से ‘पसंद’ के स्कूल तक की ही दौड़ नहीं है, यह दौड़ है उन सभी संभावित विकल्पों को आजमाने की जो उन्हें मनपसंद स्कूल में दाखिला सुनिश्चित करा सके। इस दौरान अभिभावकों को जिस आर्थिक, शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है ये सिर्फ वही जानते हैं। हालांकि गाइडलाइंस जारी करते समय

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