द्वितीय पंचवर्षीय योजना - एक आलोचना; बड़े उद्योगों पर आवश्यकता से अधिक बल -मीनू मसानी

द्वितीय पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत जो दूसरी बात सबसे अधिक परेशान करने वाली है वह यह कि बड़े-बड़े उद्योगों को आवश्यकता से अधिक महत्व तथा प्रमुखता प्रदान की गई है। सभी प्रगतिशील तथा उद्योग प्रधान देशों के विकास का क्रम यह रहा है कि उन्होंने सर्वप्रथम उपभोक्ता-सामग्री निर्माण करने वाले कारखानों की स्थापना की। उपभोक्ता-सामग्री के अन्तर्गत आते हैं कपड़ा, जूते, श्रृंगार-सामग्री तथा अन्य जीवनोपयोगी वस्तुएं। तत्पश्चात उन्होंने उन मशीनों का निर्माण किया जिनके द्वारा दैनंदिन जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन करने वाली मशीनों का निर्माण हो सकता था। भारत की द्वितीय पंचवर्षीय योजना इस स्वाभाविक क्रम को ही उलट देना चाहती है, सर के बल खड़ा होना चाहती है। जनता के दैनंदिन जीवन के लिए उपयोगी वस्तुओं के स्थान पर "उत्पादक वस्तुओं" के निर्माण को प्रमुखता प्रदान कर योजना ने जनता के जीवन को अपेक्षानुसार सुखी-सम्पन्न बनाने के स्थान पर दुरूह ही बनाया है। लोगों पर भार कम होने की अपेक्षा बढ़ा ही है- चालू वर्ष का आय-व्यय इस बात का साक्षी है। योजना निर्देश करती है कि लोग अपनी "पेटियां कस लें", किन्तु ठीक ही कहा जाता है कि अपने देश में लोगों के पास तो पेट कसने के लिए पेटियां भी नहीं हैं। इस प्रकार के औद्योगिकीकरण का आयोजन अभी तक सोवियत रूस तथा अन्य कम्युनिस्ट देशों में ही किया गया है, जहां कि पांच वर्ष के अन्त में जनता की गाढ़ी कमाई को अगली पंचवर्षीय योजना के नाम पर छीन लिया जाता है।

(पाञ्चजन्य के  8 जुलाई, 1957 के अंक में प्रकाशित)