खनन रॉयल्टी से जनजातियों को मिलेगा अधिक फायदा

आखिरकार जमीन और जंगल के अन्यायपूर्ण राष्ट्रीयकरण की नीतियों में आंशिक सुधार का रास्ता तैयार हो रहा है। मंत्रियों के एक समूह ने एक खनन विधेयक को मंजूरी दे दी है, जिसमें यह व्यवस्था की गयी है कि स्थानीय समूहों (आदिवासियों या ग्रामीणों) को कोयले के खनन से होने वाले लाभ में 26 फीसदी हिस्सेदारी दी जाएगी और अन्य खनिजों के खनन के मामले में राज्य सरकार को पिछले साल दी गई रायल्टी के बराबर राशि ग्रामीणों को भी दी जाएगी।

इसके बाद से खनन के जरिए होने वाला लाभ खनन कंपनियां, केंद्र सरकार (टैक्स के माध्यम से) और राज्य सरकरें (रॉयल्टी और स्थानीय कर) ही नहीं हथिया लेंगी, बल्कि स्थानीय नागिरकों को भी इसके मुनाफे में हिस्सेदारी मिलेगी।

यह विधेयक पुराने अतार्किक राष्ट्रीयकरण से हुए अन्याय को थोड़ा कम करेगा। कई देशों में लोगों का जहां घर होता है उस जगह की जमीन, पेड़-पौधों और वहां से प्राप्त खनिजों के वे ही मालिक होते हैं, लेकिन भारत में ऐसी व्यवस्था नहीं है। यहां ब्रिटिश हुकूमत के समय से ही राष्ट्रीयकरण की जो अन्यायपूर्ण नीति शुरू की गई उसे  आजादी के बाद भी जारी रखा गया। कुछ भूभागों को रिजर्व (प्रतिबंधित) क्षेत्र घोषित कर दिया गया, जिसके तहत आने वाली जमीन और वनस्पतियों को राष्ट्रीय संपत्ति माना गया। बाद में जमीन के अंदर पाये जाने वाले सभी प्रकार के खनिज पदार्थों को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर दिया गया। इन भूभागों पर रहने वाले लोग मुआवजे के साथ सभी प्रकार के संपत्ति के अधिकारों से वंचित हो गए।

सरकार के इस अतार्किक राष्ट्रीकरण की नीति के कारण सबसे ज्यादा प्रभावित, जंगलों में रहने वाले आदिवासी होते रहे हैं। उनसे, उनकी जमीन, जंगल और खनिज सब कुछ ले लिया गया। यहां तक कि जंगल रहित भूभाग के भी अधिग्रहण की इजाजत जमीन अधिग्रहण कानूनों के तहत दे दी गई और वहां रहने वाले लोगों को मुआवजा के रूप में जो राशि दी गई वह कृषि भूमि के तौर पर दी गई। गौर करने वाली बात है कि जमीन के अंदर विद्यमान विशाल खनिजों को नजरअंदाज कर दिया गया। इन खनिजों के बदले लोगों को जो मुआवजा मिलना चाहिए था उससे उन्हें महरूम होना पड़ा।

पिछले कुछ समय से इस अन्याय पूर्ण व्यवस्था के खिलाफ माओवादियों ने जंगली क्षेत्रों पर अपने अधिकार के लिए आवाज उठाई और इसे आंदोलन का रूप देना शुरू कर दिया। यहां इस बात का जिक्र करना लाजिमी होगा कि आदिवासियों की मूल समस्या यह नहीं है कि उनके क्षेत्रों में खनन की इजाजत दे दी गई है, बल्कि सबसे बड़ी समस्या है कि भूमि के नीचे मौजूद खनिज पर उनके अधिकारों का हनन किया गया है। उन्हें, उनके अधिकारों से महरूम कर दिया गया है। सौभाग्यवश, आदिवासियों द्वारा खनन के विरूद्ध शुरू किए गये आंदोलनों और प्रदर्शनों ने अपना असर दिखाया और सरकार को इस समस्या पर विचार करने के लिए मजबूर कर दिया। खनन का असर सिर्फ उन्हीं पर नहीं होता, जिन्हें जगह से बेदखल किया गया है, बल्कि इसका असर स्थानीय आबादी पर भी होता है। खनन से प्रदूषण फैलता है, पेड़ काट दिए जाते हैं और वनोपज पर निर्भर लोगों की जीविका खत्म होती है।

नादान बुद्धिजीवियों का मानना है कि स्थानीय जनता को खनन से प्राप्त हो रहे लाभों में हिस्सेदार बनाया जाना चाहिए। लेकिन यह हालात को भविष्य में और कठिन बना सकता है। प्रॉफिट शेयरिंग के सुझावों पर विचार करते समय इस बात पर ध्यान देना होगा कि आदिवासियों को लाभ से वंचित करने के लिए कंपनियां कई तरीके अपना सकती हैं। कोई भी धुर्त खनन कंपनी अपने सारे लाभ को स्क्रीनिंग, प्रोसेसिंग और परिवहन कार्य करने वाली कंपनी को स्थानांतरित कर सकती है और यह दिखा सकती है कि उसे खनन से लाभ हुआ ही नहीं। ऐसी सूरत में तो स्थानीय आबादी को कुछ नहीं मिलेगा, क्योंकि सम्बंधित कंपनी के बुक में तो घाटा दिखाया जाएगा।

सौभाग्यवश योजना आयोग ने प्रॉफिट शेयरिंग के प्रस्ताव का विरोध किया है। उद्योग जगत का कहना है कि प्रॉफिट शेयरिंग से विदेशी निवेशकों में एक भय पैदा होगा, वे निवेश करने से हिचकेंगे। प्रॉफिट शेयरिंग से विदेशी या घरेलू ईमानदार कंपनियों की बजाय बेईमान और धोखेबाज कंपनियों को ज्यादा फायदा होगा। भारत में ऐसे आदर्श विचारों की कमी नहीं है, जिसका लाभ आखिरकार धोखेबाजों को ही मिलता है। प्रोफिट शेयरिंग ऐसे ही विचारों में से एक है।

इस मसले पर काफी विचार विमर्श करने के बाद मंत्री-समूह के बीच यह सहमति बनी कि कोयले के खनन में स्थानीय लोगों को लाभ में हिस्सेदारी दी जाए। इसके पीछे मंत्री समूह की दलील थी कि चूंकि कोयला खनन के क्षेत्र में अधिकतर सरकारी कंपनियां हैं और वे अपने बुक में गलत तरीके से घाटा नहीं दिखायेंगी। उनकी इस सोच को नादानी ही कहा जा सकता है। इसके अलावा बहुत सारी स्टील कंपनियां, पावर और सीमेंट कंपनियों के पास अपनी अलग कोयला खानें हैं, जो शायद खनन के लिए अलग खाता नहीं रखेंगे और खनन से सम्बंधित लाभ नहीं देंगे। एक न एक दिन निजी कंपनियों को कायले के खनन की इजाजत दे दी जाएगी और तब धोखेबाज और धुर्त कंपनियां प्रॉफिट शेयरिंग के फॉर्मूले में अपनी करतूत जरूर दिखायेंगी और इसका खामियाजा ईमानदारी पूर्वक खनन कार्यों में लगी कंपनियां भुगतेंगी। और अंततः इससे स्थानीय लोगों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा।

कोयले को छोड़कर बाकी खनिजों के लिए रॉयल्टी भुगतान योजना ज्यादा सही है। राज्य सरकारों को काफी समय से खनिज रॉयल्टी प्राप्त होती रही है। लेकिन इस राशि को मुआवजे के रूप में स्थानीय लोगों को वितरित करने और विकास कार्यों पर खर्च करने की बजाय राज्य सरकारों ने इन पैसों से अपनी तिजोरियां भरीं। स्थानीय स्तर पर इन पैसों से कोई परिवर्तन नहीं हुआ। इसलिए काफी दिनों से स्थानीय लोगों को सीधे रॉयल्टी देने की मांग की जा रही थी, जो कि राज्य सरकार को मिलने वाले रॉयल्टी से अलग हो और यह सीधे जिला और मंडल स्तर पर अलग कोष में जमा हो एवं इसका इस्तेमाल स्थानीय विकास के लिए हो। रॉयल्टी के रूप में प्राप्त होने वाली धन राशि का एक हिस्सा ग्रामीणों को सीधे दिया जाये एवं बाकी पैसे को स्थानीय विकास जैसे सड़क, स्कूल, अस्तपताल आदि पर खर्च किया जाये।

एक समस्या: 26 फीसदी प्रॉफिट शेयरिंग का जो प्रस्ताव दिया गया है, उससे लोगों को 9,000 करोड़ रुपये प्राप्त होंगे, जबकि रॉयल्टी से लोगों को महज 2,600 करोड़ रुपये मिलेंगे। समाधान: लोगों को मिलने वाली रॉयल्टी को राज्य सरकार को प्राप्त होने वाली रॉयल्टी का 3.5 गुणा कर दें और इसे भविष्य में इन खनिजों की वैश्विक कीमतों के आधार पर परिवर्ति करें। वर्तमान रॉयल्टी की जो दर है वह बेहद कम है। इन दिनों कमोडिटी की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है और खनन कंपनियों को इसका भरपूर लाभ मिला है। वे आराम से ज्यादा रॉयल्टी देने में सक्षम हैं। किसी सरकारी आदेश या फैसले के बजाय इन कंपनियों का तो यह नैतिक फर्ज बनता है कि वे रॉयल्टी दरों में इजाफा करें क्योंकि अब उन्हें पहले के मुकाबले ज्यादा फायदा हो रहा है।

ग्रामीणों को प्राप्त होने वाली रॉयल्टी की राशि प्रॉफिट शेयरिंग से अलग किराया से प्राप्त होने वाली आय की तरह होगी। आप चाहें तो आदिवासियों से पूछ कर देख लें उन्हें सुनिश्चित रेंटल (किराया) इनकम, प्रॉफिट शेयरिंग के कॉन्सेप्ट से ज्यादा मुफीद लगेगा, क्योंकि प्रॉफिट शेयरिंग में उन्हे भारी लाभ की मृग-मरीचिका तो दिखेगी लेकिन भ्रष्ट और धुर्त खनन कंपनियों के तिकड़मों के आगे उन्हें अधिकतर समय लाभ रहित भी रहना पड़ सकता है। हालांकि यह व्यवस्था भोले-भाले आदिवासियों की संपत्तियों के राष्ट्रीयकरण से हुए अन्याय को खत्म तो नहीं करता, लेकिन यह इस घोर अन्याय का एक आंशिक समाधान जरूर हो सकता है। इसका एक फायदा यह भी होगा कि स्थानीय लोग खनन को विकास के स्रोत के रूप में देखेंगे न कि तबाही के कारण के रूप में।

- स्वामीनाथन अय्यर
साभार: स्वामीनॉमिक्स.ऑर्ग

स्वामीनाथन अय्यर