उपयोगिता सिद्ध करने में नाकाम रहा है योजना आयोगः जयतीर्थ राव

जाने माने उद्योगपति व एमफेसिस (बीपीओ) के संस्थापक जयतीर्थ राव ने देश में केंद्रीय योजना आयोग उपयोगिता को सिरे से नकार दिया है। उन्होंने कहा है कि देश में ऐसे किसी भी आयोग की कोई जरूरत नहीं है। इतना ही नहीं जयतीर्थ राव ने योजना आयोग को देश की प्रगति के लिए बाधक बताते हुए कहा कि यदि यह आयोग नहीं होता तो देश आजादी के छह दशकों में वर्तमान की तुलना में कहीं अधिक प्रगति कर चुका होता। राव प्रख्यात अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन की जन्मशती वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित संगोष्टी को संबोधित कर रहे थे। संगोष्टी का आयोजन अंतर्राष्ट्रीय थिंक टैंक संस्था सेंटर फॉर सिविल सोसायटी (सीसीएस) द्वारा किया गया था। इस दौरान आईडीएफसी प्राइवेट इक्विटी के पूर्व चेयरमैन लुईस मिरांडा व सीसीएस के प्रेसिडेंट डा. पार्थ जे. शाह आदि उपस्थित थे। इस मौके पर सीसीएस की स्थापना की 15वीं वर्षगांठ भी मनाई गई।

इंडिया हैबिटेट सेंटर में बुधवार को आयोजित “फ्रीडमैन ऑन इंडिया” विषयक संगोष्ठी के दौरान भारी संख्या में उपस्थित श्रोताओं को संबोधित करते हुए जयतीर्थ राव ने कहा कि देश की तरक्की निजीकरण की राह पर ही चलकर हो सकती है। उन्होंने कहा कि आजादी के 50 वर्ष तक योजना आयोग सिर्फ योजनाएं बनाता रहा लेकिन कभी उसे पूरा नहीं कर सका। जबकि नब्बे के दशक में सीमित उदारीकरण की राह पर ही चलकर देश ने 10 फीसदी से ज्यादा की विकास दर हासिल कर ली। लुईस मिरांडा ने कहा कि देश से भ्रष्टाचार को जड़ से मिटा पाना मुश्किल है लेकिन कुछ कड़े प्रयासों से इसपर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यदि भ्रष्टाचार पर काबू पा लिया गया तो यह देश की तरक्की में काफी सहायक होगा।

सीसीएस के प्रेसिडेंट डा. पार्थ जे शाह ने कहा मिल्टन फ्रीडमैन ने भारत के बारे में जो भविष्यवाणियां 70 के दशक में की थी वह सभी एक एक कर सही साबित हुई हैं। डा. शाह के मुताबिक जब देश लगातार बढ़ती जनसंख्या को लेकर परेशान था उस समय फ्रीडमैन ने इसे विकास के लिए जरूरी तत्व बताया था। फ्रीडमैन ने कहा था कि यदि इतनी बड़ी जनसंख्या को प्रशिक्षित कर उत्पादक कार्यों में लगा लिया जाए तो यह देश को प्रगति की ओर अग्रसर करने में सहायक होगा। पार्थ के मुताबिक देश में निजी करेंसी के संचालन की अनुमति मिलनी चाहिए ताकि बाजार में किसी एक करेंसी का एकाधिकार न हो।

- अविनाश चंद्र

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