मध्यावधि चुनाव के आसार

सस्पैंस खत्म हो गया है। प्रणब मुखर्जी का अगला राष्ट्रपति बनना निश्चित लगता है। यूपीए गठबंधन के पास विजय को सुनिश्चित करने के लिए वोट कम हैं लेकिन सपा के मुलायम सिंह और बसपा की मायावती दोनों ने उनका समर्थन किया है। इससे प्रणब विजयी हो जाएंगे भले ही ममता बनर्जी यूपीए से अलग हो जाएं।

लेकिन पिछले हफ्ते का राजनीतिक घटनाचक्र इतना ऊथळ पुथल भरा था कि उसने यूपीए की कमजोरी को उजागर कर दिया और उसकी विश्वसनीयता को नुक्सान पहुंचाया ।जो भी यह सोचता है कि राष्ट्रपति चुनाव में यूपीए की जीत उसे ताकतवर  और अपनी नीतियों को लागू करने में सक्षम बनाएगी उसके बारे में यही कहा जा सकता है कि वह कमाल का आशावादी जीव है। पिछले हफ्ते की जोड़तोड़ ने यह शक पैदा कर दिया है कि सरकार अपने पूर्ण कार्यकाल2014 तक चल पाएगी या नहीं ।अन्य पार्टियां 2013 में वक्त से पहले चुनाव थोप सकतीं हैं।

गुरूवार को ममता और मुलायम ने मुखर्जी की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी को खारिज करने के लिए हाथ मिलाया और उनके बजाय तीन और लोगों के नाम सुझाएं। इससे लगा था कि सारे राजनीतिक समीकरण बदल जाएंगे। लेकिन यह  मतलब की शादी एक ही दिन चली। उसके बाद मुलायम ने पाला बदला और औपचारिक तौर पर कांग्रेस के उम्मीदवार  मुखर्जी का समर्थन करने की घोषणा की। इस घटना का वास्तविक सबक यह नहीं है कि मुलायम कांग्रेस के साथ हैं। वरन यह है कि वह जब चाहें तब बिना दया दिखाए कांग्रेस को समर्थन और जब चाहे तब उसे झटका दे सकते हैं। वे प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। लेकिन उनके लिए वक्त गुजरा जा रहा है क्योंकि वह 73 वर्ष के हो चुके हैं। इसलिए उनके लिए सबसे अच्छा और आखिरी मौका अगला लोकसभा चुनाव होगा क्योंकि कांग्रेस और भाजपा दोनों कमजोर हो रही हैं इसलिए क्षेत्रीय पार्टियों की राष्ट्रीय गठबंधन सरकार बनने का रास्ता खुल रहा है। यदि सपा लोकसभा चुनाव में अपनी विधानसभा चुनावों की सफलता को दोहरा सकी तो वह उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 60 सीटें जीत सकती हैं जो उसे संसद में सबसे बड़ी क्षेत्रीय पार्टी बना देगा। यह मुलायम सिंह के प्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे बेहतर लांचिंग पैड होगा।

याद करिए मार्च में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद जब सपा ने 224 सीटें जीतीं थीं और कांग्रेस ने केवल 28 तब चर्चा थी मुलायम सिंह मतदाताओं के कांग्रेस विरोधी रूख का लाभ उठाने के लिए आम चुनाव कराना चाहते हैं। एक वरिष्ठ राजनीतिज्ञ ने टिप्पणी की थी कि मुलायम और ममता दोनों का जल्दी लोकसभा चुनाव कराने में निहित स्वार्थ है। दोनो उस हवा का लाभ उठाना चाहते हैं जो उनके राज्यों के चुनावों में उनकी भारी जीत का कारण बनीं। उन्होंने यदि 2014 के लोकसभा चुनावों का इंतजार किया तो वह आंधी धीमी पड़ जाएगी और हो सकता कि तबतक उनकी सरकारों के खिलाफ सरकार विरोधी हवा बहना शुरू हो जाए जो उनके लिए नुक्सानदेह होगा। इसलिए तभी हथौड़ा क्यों न चलाया जाए जब लोहा गर्म हो।

इसके बावजूद सपा ने तुरंत लोकसभा चुनाव की बात से इंकार किया। लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लंबे अभियान में पार्टी की तिजोरी और कार्यकर्त्ताओं का ऊर्जा काफी कम हो चुकी है उसे फिर से भरने तक  वह यूपीए सरकार का समर्थन करना चाहती है। कांग्रेस मुलायम को अपने पक्ष में लाने के लिए लगातार कोशिश कर रही है और इसलिए उसने मुलायम की बहू डींपल यादव को कन्नौज के लोकसभा चुनाव में निर्विरोध जीत जाने दिया। इससे दोनों दल अस्थायी तौरपर करीब आए लेकिन इस कारण मुलायम सिंह की प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा खत्म नहीं हुई।

इस बीच मायावती की बसपा उत्तराखंड की कांग्रेस गठबंधन सरकार में भागीदार बन गई है। बसपा के केवल तीन विधायक होने के कारण उसका केवल एक मंत्री है। यह पुख्ता गठबंधन के लिए बहुत कमजोर आधार है। दूसरी तरफ बसपा और कांग्रेस दलित और मुस्लिम वोटों के लिए एक दूसरी की प्रतिद्वंदी है इसलिए वे स्वाभाविक दोस्त नहीं हो सकतीं। कांग्रेस भले ही  बहुत खुशी-खुशी बसपा और सपा दोनों से गठजोड करे लेकिन वह मानती है सपा उसकी बेहतर सहयोगी हो सकती है।

लेकिन ममता के मंसूबों के बारे में क्या रहा जाए? 2009 के बाद से उसकी 20 लोकसभा सीटें यूपीए का लोकसभा में बहुमत बनाए रखने में मदद करती रही हैं। इसने ममता को सरकार को ब्लैकमेल करने के लिए सक्षम बनाया। उसने बांग्लादेश के साथ तीस्ता पानी समझौता ठंढे बस्ते में डालने, मल्टी ब्रांड में रिटेल को रुकवाने, रेलवे मंत्री और रेलवे बजट बदलवाने और भूमि अधिग्रहण कानून लटकाने में भूमिका निभाई।

ममता के तेवर बताते हैं कि वह अलग होने के लिए तैयार है। ममता को शायद लगता है कि कांग्रेस और उसकी दागदार छवि से अलग होने से उसे लाभ होगा। उन्हें विश्वास है कि लोकसभा चुनाव में वह कांग्रेस के समर्थन के बगैर अपनी लोकसभा में संख्या 20 से बढ़ाकर 30 कर सकती हैं। इस वर्ष के अंत में ममता और मुलायम यह फैसला कर सकते हैं कि कांग्रेस से पल्ला झाड़ कर देश पर आम चुनाव थोपा जाए। पिछले हफ्ते उन्होंने  राष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर कांग्रेस के खिलाफ केवल 24 घंटों के लिए हाथ मिलाया था। अगली बार वे सरकार को गिराने और आम चुनाव थोपने के लिए हाध मिला सकते हैं।

- स्वामीनाथन अंकलेसरिया अय्यर