शैक्षिक गुणवत्ता पर असर डालता मिड-डे मील

प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों को लाने के लिए मुफीद मानी जाने वाली मध्याह्न भोजन योजना फिलहाल उत्तर प्रदेश  के फैज़ाबाद जिले में  माध्यमिक विद्यालयों के लिए जी का जंजाल साबित हो रही है। माध्यमिक विद्यालयों में मिड-डे-मील के चक्कर मे शिक्षा व्यवस्था जहां सीधे तौर पर प्रभावित हो रही है वहीं इस योजना का क्रियान्वयन करने से बच्चों में अनुशासन की भावना का लोप होता जा रहा है।

सैकड़ों बच्चों को दोपहर का भोजन देने के चक्कर में विद्यालय प्रबंधन शैक्षणिक दृष्टिकोण से दोयम दर्जे पर पहुंचता जा रहा है। एसएसवी इंटर कालेज फैज़ाबाद के प्रधानाचार्य डा. वीरेन्द्र त्रिपाठी ने इस व्यवस्था पर पुर्नविचार की आवश्यकता जताई है।

मध्याह्न भोजन प्राधिकरण के हालिया निर्देशों के चलते राजकीय व शासकीय सहायता प्राप्त विद्यालयों के कक्षा छह से आठ के बच्चों को मिडडेमील योजना शुरू कर दी गई है। शहरी क्षेत्र के विभिन्न विद्यालयों में कक्षा छह से आठ के छात्रों की संख्या दो सौ से लेकर पांच सौ के करीब होने की वजह से बच्चों की शिक्षा पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। शहर के प्रतिष्ठित श्याम सुंदर सरस्वती विद्यालय इंटरमीडिएट कालेज के प्रधानाचार्य डा. वीरेन्द्र कुमार त्रिपाठी की मानें तो इस योजना को मूर्त रूप प्रदान करने के लिए विद्यालय के सभी कर्मचारियों का ध्यान प्राय: शिक्षण कार्य से हटकर योजना क्रियान्वयन की तरफ चला जाता है जिसके फलस्वरूप विद्यालयों का शैक्षिक वातावरण समाप्त होने लगता है। माध्यमिक विद्यालयों की दशा काफी कुछ प्राथमिक विद्यालयों की तरह होने की बात कहते हुए वह कहते हैं कि लगभग सात आठ सौ बच्चों का भोजन बनवाने और उसे वितरित कराने में ही दो से तीन घंटे का समय लगेगा तो शिक्षण कार्य आखिर कब होगा?

उन्होंने कहा कि शासन द्वारा सभी विद्यालयों को योजना संचालन के लिए बाध्य करने पर शैक्षणिक कार्य का स्तर सीधे तौर पर प्रभावित होगा। उन्होंने शासकीय विद्यालयों में इस योजना के क्रियान्वयन के पीछे विभिन्न पूंजीपतियों, राजनीतिज्ञों व शिक्षा विभाग के अधिकारियों का षडयंत्र करार दिया। डा. त्रिपाठी ने व्यक्तिगत तौर पर सुझाव दिया कि योजना पर पुर्नविचार करना चाहिए जिससे योजना का लाभ निर्धन क्षेत्रों के बच्चों को मिल सके। इसके अलावा योजना के संचालन के लिए क्षेत्रों का चयन करने, नगरीय व ग्रामीण क्षेत्र के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं लागू करने, स्वतंत्र एजेंसी के माध्यम से खाना बनाने और वितरण की व्यवस्था करने की बात कही। उनका मानना है कि यदि योजना पर आमूल पुर्नविचार नहीं किया गया तो इससे माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षा का स्तर गिरता जाएगा और योजना प्रबंधक, प्राचार्य और अध्यापकों के गले की फांस बन जाएगी।

-सुनील पाठक