खराब नुस्खा है दवाओं को सस्ता करना

 

हाल ही में दवा मूल्य नियंत्रण आदेश के तहत 652 दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाया गया है। पहली नजर में यह फैसला आम आदमी के हित में दिखता है। इसके लागू हो जाने से दवाओं की कीमतों में औसतन 20-25 फीसदी की कमी होने की संभावना है। कुछ दवाओं की कीमतें तो 80 फीसदी तक घट सकती हैं। ये दवाएं एलर्जी, हृदय संबंधी, गैस्ट्रो-इन्टेस्टाइनल, मधुमेह, तपेदिक और कुष्ठ रोग वगैरह की हैं। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि मूल्य नियंत्रण हमेशा फायदे का सौदा नहीं होता। इसके साथ ही सरकारी हस्तक्षेप का दायरा बढ़ने से भ्रष्टाचार के नए मौके भी उत्पन्न होते हैं।

नब्बे के दशक से पहले तक बहुत सारे सामान और सेवाओं पर भारी सरकारी नियंत्रण था। टेलीफोन, सीमेंट, दोपहिया वाहन आदि पाने के लिए या तो लंबा इंतजार करना पड़ता था या फिर पहुंच वाले इंसान की मदद लेनी पड़ती थी। सामानों की कमी हो जाती थी, कालाबाजारी बढ़ जाती थी। इस बात को मानने की कोई वजह नहीं है कि उस समय के मुकाबले देश में प्रशासन के स्तर में सुधार हुआ है, इसके बदतर होने के ढेरों उदाहरण जरूर मिल जाएंगे।

दरअसल, मूल्य नियंत्रण को किसी भी अवधि में दुनिया के किसी भी हिस्से में कामयाबी नहीं मिली है। तकरीबन 35 साल पहले अमेरिका के रॉबर्ट शूटिंगर और ऐमन बटलर ने अपनी किताब “फोर्टी सेंचुरीज ऑफ वेज ऐंड प्राइस कंट्रोल्सः हाउ नॉट टू फाइट इन्फ्लेशन” में यह बताया था कि प्राचीन मिस्त्र से लेकर अब तक हमेशा ही मूल्य नियंत्रण के प्रयासों को विफलता हाथ लगी है। कीमत के नियंत्रण से संबंधित आदेश बाजार अर्थव्यवस्था के मूल सिद्धांत कहता है- कीमत का निर्धारण बाजार को करना चाहिए। कई बुद्धिजीवी कहते हैं कि बाजार नैतिक नहीं है। लेकिन यह अनैतिक भी तो नहीं है। यह नैतिक और अनैतिक के बहस से परे है, जबकि सरकारें तो अनैतिकता और असक्षमता का मिश्रण हैं।

इस आदेश का भारतीय फार्मा इंडस्ट्री के ऊपर भी काफी बुरा असर पड़ेगा, जो सरकारी अनुमानों के मुताबिक 15 फीसदी से भी अधिक की सालाना औसत विकास दर से बढ़ी है। इस आदेश को लाने वाले डिपार्टमेंट ऑफ फार्मास्युटिकल्स को वेबसाइट पर इसका दृष्टिकोण कुछ इस तरह पेश किया गया है, ‘ भारतीय फार्मास्युटिकल्स इंडस्ट्री को सक्षमता प्रदान करना, ताकि यह वैश्विक बाजार में एक अहम भूमिका निभा सके।’ लेकिन यही विभाग अपने नजरिये को मूर्त रूप देने के लिए पुरातन तरीकों, जैसे कीमत नियंत्रण आदि का सहारा ले रहा है। यह ठीक है कि जरूरतमंद गरीबों को वाजिब दाम पर इलाज मिले, इसकी व्यवस्था समाज और सरकार को करनी चाहिए, लेकिन सबको, यहां तक कि अमीरों को भी सस्ती दवा मिले, यह असल बीमारी का इलाज नहीं है।

 

- रविशंकर कपूर (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

साभारः हिंदुस्तान