व्यंग्यः ताकतवर मीडिया युग और चींटी व टिड्डे की कहानी

यह कहानी तब की है जब मुंबई में दलाल स्ट्रीट नाम की कोई जगह नहीं हुआ करती थी। उस समय यहां एक रिज क्षेत्र हुआ करता था, जिसमें तमाम कटीले पेड़ों व झुरमुटों के साथ ही साथ रसीले फलदार पेड़ व रंगीन फूलों के पौधे भी बहुतायत हुआ करते थे। रिज क्षेत्र में अन्य छोटे मोटे जानवरों व पशु पक्षियों के साथ चींटियों व टिड्डों की भी काफी संख्या पायी जाती थी। चींटी जहां सर्दी व बारिश के मौसम में होने वाली परेशानी व खाने की कमी को ध्यान में रखते हुए गर्मी के मौसम में चिलचिलाती धूप की परवाह न करते हुए घर की मरम्मत व खाना जुटाने में लगी रहती। जबकि टिड्डा अपनी मस्तमौला प्रव्रति के अनुरूप खाओ पीओ ऐश करो में विश्वाश करता। लगे हाथ वह चींटी की खिंचाई भी करता और उसे मूर्ख मानता।
 
जब बारिश और उसके बाद सर्दी आती तो चींटी अपने घर में आराम से रहती जबकि टिड्डा भोजन व आश्रय के अभाव में भूख व सर्दी के कारण म्रत्यु को प्राप्त होता।
 
ताकतवर मीडिया युग में कहानी का भारतीय संस्करण:
 
तपती गर्मी में चींटी को काम करता देख टिड्डा अब भी हंसता और उसे मूर्ख कहता जबकि चींटी भविष्य की परेशानियों को ध्यान में रखते हुए पूर्ववत मेहनत करती रहती। एक बार फिर सर्दी का मौसम आता है। टिड्डा सर्दी में कंपकंपाता है जबकि चींटी गर्म कमरे में स्वादिष्ट व्यंजनों का लुत्फ उठाती है। इस बार टिड्डा एक प्रेस कांफ्रेंस करता है और सभी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय टीवी चैनलों को आमंत्रित कर समाज में व्याप्त असमानता की ओर ध्यानाकर्षण कराता है। वह मांग करता है कि क्यों समाज का एक तबका छत के अभाव में सड़क पर भूखों मरे जबकि दूसरा वर्ग मौज करे।
 
इंडिया टीवी,  एनडीटीवी,  बीबीसी  व  सीएनएन कंपकपाते टिड्डे व इनसेट में चींटी के आराम से अनेक स्वादिष्ट व्यंजनों के लुत्फ उठाने के इस अमानीव व्यवहार का लाइव फुटेज प्राइम टाइम पर दिखाते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस शुरू हो जाती है। पूरा विश्व चकित रह जाता है।
 
अरुंधति राय चींटी  के  घर के सामने विरोध प्रदर्शन करने लगती हैं।
 
मेधा पाटेकर सर्दियों के दौरान टिड्डों को गर्म रखने व खाना उपलब्ध कराने की मांग के साथ अन्य भूखे टिड्डों के संग भूख हड़ताल पर बैठ जाती हैं।
 
मायावती ने इसे देश में दलितों के साथ सदियों से होते आए अन्याय के रूप में परिभाषित किया।
 
एमनेस्टी इंटरनेशनल और कोफी अन्नान द्वारा इस भेदभाव व टिड्डे के मूलभूत अधिकारों का हनन बताते  हुए इस अन्याय केलिए भारत सरकार की वैश्विक तौर पर आलोचनाशुरू कर दी गई।
 
टिड्डे के मौलिक अधिकारों को कायम रखनेके लिए इंटरनेट पर ऑनलाइन याचिकाओं की बाढ़ आ गई।
 
विपक्ष ने संसद का बहिष्कार करना शुरू कर दिया। वाम दलों ने मामले की न्यायिक जांच कराने की मांग को लेकर बंगाल व केरल में प्रदेश बंद का आह्ववान कर दिया।
 
केरल में सीपीएम ने टिड्डे व चींटी के बीच के आर्थिक स्तर को पाटने व समानता स्थापित करने के लिए तत्काल प्रस्ताव पास कर एक कानून बना दिया जिसके तहत चींटी के गर्मी में कठिन परिश्रम करने पर रोक लगा दी गई।
 
लालू प्रसाद ने सभी भारतीय रेल गाड़ियों में टिड्डों के लिए कोच आरक्षित करने व बजट में नए टिड्डी रथ चलाने की घोषणा कर दी।
 
इस बाबत गठित विशेष  न्यायिक समिति ने 'टिड्डों  के खिलाफ आतंकवाद की रोकथामअधिनियम'[POTAGA], पारित कर दिया जो सर्दियों के मौसम शुरू होने से लेकर गर्मी आने तक प्रभावी रहेगा।
 
कपिल सिब्बल ने शैक्षिक संस्थानों व सरकारी नौकरियों में टिड्डों  के लिए विशेष आरक्षण का प्रावधान कर दिया।
 
चींटी को POTAGA का पालन करने में नाकाम रहने का दोषी पाया गया व पूर्व में किए गए उसके अनुपालन के लिए जुर्माना लगाया गया। चींटी के पास जुर्माना चुकाने के लिए कुछ न होने पर उसके घर को जब्त कर लिया गया। एनडीटीवी द्वारा सजीव प्रसारित एक समारोह के दौरान सरकार द्वारा चींटी के घऱ को टिड्डे को सौंप दिया गया।
 
अरुंधति राय ने इसे न्याय की जीत कहा।
 
लालू के मुताबिक यह सामाजिक न्याय है।
 
सीपीएम ने इसे 'दबे कुचलों को पुनरुत्थान की क्रांतिकारी शुरूआत' की संज्ञा दी।
 
कोफी अन्नान टिड्डे को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने के लिए आमंत्रित करते हैं।
 
कई साल बाद ....
 
इस घटना के बाद चींटियों का समूह अमेरिका को पलायन कर गया और वहां के सिलिकन वैली में एक बहु अरब डॉलर कंपनी की स्थापना की. उधर, आरक्षण होने के बावजूद भारत में प्रतिवर्ष सैकड़ों टिड्डे अब भी भूख से मर जाते हैं।
 
...... और
 
कठिन परिश्रमी चींटियों को खोने और अकर्मठ टिड्डों को बिठाकर खिलाने के परिणामस्वरूप भारत अभी भी एक विकासशील देश है ...!
 
 
- आजादी.मी
 

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