मार्क्स, धर्म और ईश्वर के बीच

मार्क्स ने कहा था धर्म अफीम है। लेनिन ने कहा था धर्म केवल एक निजी मामला नहीं है। आज हमारे बीच न मार्क्स हैं न लेनिन। मगर धर्म है। मार्क्स और लेनिन के सिद्धांत पुराने पड़ चुके हैं, मगर धर्म पुराना होकर भी खत्म नहीं हुआ। यह निरंतर फैल रहा है। या कहें हम धर्म को अपनी सुरक्षा के लिए फैला रहे हैं। हम डरे हुए हैं। धर्म से अलग नहीं होना चाहते। धर्म और ईश्वर हमारा सहारा हैं। यहां हर कोई धर्म और ईश्वर की छतरी में खुद को सुरक्षित महसूस करता है।

धर्म कितना ही अफीम हो, मगर हम उसे खाने में कभी कोई कोताही नहीं बरतते। धर्म को जबरदस्ती निजी मामला बताकर अपनी धर्मांधता दूसरों पर थोपना चाहते हैं। हमें अपने मां-बाप के समक्ष नतमस्तक होने में परेशानी हो सकती है, मगर धर्म के नहीं। बेशक, सदी और समय बदल रहे हैं, मगर धर्म नहीं। धर्म की प्रवृति नहीं। धर्म की मान्यताएं-स्थापनाएं नहीं। धर्म को हमने अफीम के सहारे लड़ने-मरने का हथियार बना लिया है। धर्म के बीच गहरी मगर घातक बहस चल पड़ी है कि उसका धर्म मेरे धर्म से श्रेष्ठ कैसे? 

मक्सिम गोर्की ने कहा था ईश्वर खोजे नहीं जाते, उनका निर्माण किया जाता है। हम ईश्वर को इसलिए खोजने जाते हैं, ताकि हमारा उद्धार हो सके। हम धर्म से चिपके रहते हैं, ताकि संकट से बचे रहें। कमाल देखिए, हम 21वीं सदी में भी धर्म और ईश्वर की खोज में व्यस्त हैं। ईश्वर को प्रसन्न करने अमरनाथ तक हो आते हैं। धर्म बचा रहे इसलिए उसे बाजार से जोड़ रहे हैं। दिन के चौबीस में से 23.99 धंटे धर्म और ईश्वर की शरण में ही बिताना चाहते हैं। हमारे दिमागों में बेहद गहराई से यह भर दिया गया है कि खबरदार जो धर्म और ईश्वर से अलग हुए तो... अनर्थ हो जाएगा। अनर्थ कहने-बताने वाले खूब जमकर 'अर्थ' बटोर रहे हैं। धर्म के जानकर शानदार गाड़ियों में घूम रहे हैं। लैपटॉप की सहायता से हमारा-आपका भविष्य बांच रहे हैं। धर्म और ईश्वर उनके गुलाम हैं। उन्हें जब, जैसे, जहां, चाहें चलाएं। जनता उनके लिए पागल है। जनता उनकी भविष्यवाणी में अपना सुख खोज रही है।

मार्क्स और लेनिन की धर्म पर दी गईं स्थापनाएं अब किताबी या शाब्दिक क्रांतिकारिता से अधिक कुछ नहीं लगतीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि धर्म और ईश्वर के प्रति हमारी अंध-आस्था ने हर प्रगतिशील विचारधारा को ध्वस्त कर दिया है। धर्म इसलिए सफल हो सका क्योंकि हमने कूपमंडूकता से बाहर निकलने की कभी कोशिश ही नहीं की। जहां डर होगा, वहां ईश्वर होगा ही होगा, यह मानकर चलें।

आप मानकर चलें अब धर्म पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गया है। यह सहिष्णुता की हदों को पार कर चुका है। यहां भूख का भी धर्म है। बाजार का भी धर्म है। आतंकवाद का भी धर्म है। जाति का भी धर्म है। विचार और सोच का भी धर्म है। आज धर्म मार्क्स की अफीम से कहीं ज्यादा खतरनाक है। अब धर्म को राजनीति और आतंकवाद पाल रहे हैं।

जहां और जिससे डर लगे बस धर्म और ईश्वर की शरण में चले जाओ। यही हमें हर दम पढ़ाया और सिखाया जा रहा है। हमने अब खुद पर भरोसा करना बंद कर दिया है। क्योंकि हमारे डर के लिए धर्म और ईश्वर मौजूद हैं। धर्म और ईश्वर की वहशियत में मर जाना मंजूर है, लेकिन उसे त्यागना नहीं। हम नहीं समझ रहे मगर यह सौ फीसद सत्य है कि आतंकवाद धर्म के रास्ते ही हमारे बीच आया है। अब यह हमें निरंतर मार और परेशान कर रहा है। गजब है कि हम न धर्म को छोड़ना चाहते हैं न ईश्वर को। ऐसे में अगर मार्क्स और उनके विचार हमसे दूर हो रहे हैं तो क्या गलत कर रहे हैं! तो ऐसे ही रोते-बिलखते रहिए, जब तक धर्म और ईश्वर का डर हमारे बीच मौजूद है।

- अंशुमाली रस्तोगी