बाजार, नैतिकता एवं धर्मनिरपेक्षवाद (भाग दो)

समाजवादी कानून अनैतिक है, स्वतंत्रता नैतिक है

यह देखने के बाद कि कैसे बाजार मानवीय नैतिकता के धर्म निरपेक्ष आधारों में से एक हैं, यह जानना जरूरी हो जाता है कि क्या भारत के मुख्य धर्म- हिंदू व इस्लाम - मु्क्त बाजार के खिलाफ हैं?
हिंदू धर्म बाजार की नैतिकता बताने वाला पहला धर्म था और वह भी सिर्फ दो शब्दों में- 'शुभ-लाभ' अर्थात लाभ शुभ है एवं लाभ समाज के लिए शुभ संकेत है। यह हिंदुओं की एक महान दार्शनिक खोज है, जिसे शून्य की खोज से ज्यादा वरीयता दी जानी चाहिए। पश्चिम को तो इस दर्शन का सन् 1776 तक इंतजार करना पड़ा जब नैतिक दर्शन के एक प्रोफेसर एडम स्मिथ ने यही बात एक वृहद तथा अनूठे कार्य पर आधारित ग्रंथ 'एन इन्क्वायरी इन टू द नेचर एंड कॉजेज ऑफ द वेल्थ ऑफ नेशन्स' में कही। तब से पहले ईसाई रूढ़िवादी बाजार की नैतिकता को नहीं समझ पाये थे? एडम स्मिथ ने बताया कि जब सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त तार्किक स्व-लाभ प्रभावी होता है तो कैसे एक अदृश्य हाथ समाज का भला करता है। उन्होंने बताया कि कैसे यह प्रक्रिया समाज को सम्पन्न और नैतिक बनाती है? जैसा कि लार्ड एक्टन (एक नैतिक दार्शनिक) ने भी बाद में जोड़ा - 'सत्ता (शक्ति) भ्रष्ट करती है और परमसत्ता (निरंकुश शक्ति) सर्वाधिक भ्रष्ट करती है।'

स्वतंत्रता नैतिक है, ताकत भ्रष्ट करती है

एक मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था में अगर समाज पूर्णतः लाभ देखने वाले लोगों से भरा हो तो वह नैतिक होगा। शक्तिशाली समाजवादियों ने अपनी आर्थिक पाबंदियों से समाज को भ्रष्ट कर दिया है। उन्होंने हम पर ये पाबंदियां, हमे लालच के तथाकथित दुष्प्रभाव से बचाने के लिए थोपी है। पर लालच इस चोर-तंत्र से कहीं बेहतर है।
इस्लाम धर्म भी मुक्त बाजार पर आधारित है। मोहम्मद साहब भी एक मुक्त व्यापारी थे और उनकी बेगम खादिजा भी। इस्लाम का पंचांग भी मुक्त अप्रवास (immigration) की एक घटना - मक्का से मदीना के लिए प्रस्थान से शुरू होता है। इस्लाम सक्रिय रूप से उद्यमशीलता (Entreprenuership) को बढ़ावा देता है। वह संपत्ति के अधिकारों की सुरक्षा करता है तथा इसने एडम स्मिथ से कई वर्ण पहले मुक्त व्यापार का सिद्धांत खोजा था। अनुचित लाभ पर भी इस्लाम के नियम हैं।
भारत में बिना मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था के सच्ची धर्मनिरपेक्षता नहीं आ सकती। बाजार मानवीय नैतिकता के धर्म निरपेक्ष आधारों में से एक है। इस्लाम और हिंदू धर्म, दोनों मुक्त बाजार में विश्वास रखते हैं। अगर हम इनके मतभेदों को अनदेखा कर इनकी बुनियादी समानताओं पर बल दें तो ये धर्म शान्तिमय तरीके से साथ साथ रह सकते हैं।
स्वतंत्रता नैतिकता लाती है जबकि ताकत भ्रष्ट करती है नामक धारणा को एक छोटे से वैचारिक प्रयोग में शामिल होकर समझा जा सकता है।
केलों की एक थाली लें और इसे बंदरों के समूह की तरफ ले जाएं। क्या होगा? बंदर आपके केले चुरा लेंगे। अब केलों से भरी एक, दूसरी थाली लें और किसी ऐसी जगह जाएं जहां कोई बंदर नहीं है पर बहुत से इंसान जरूर हैं (जैसे किसी एक बाजार - कनॉट प्लेस, ब्रिगेड रोड या चांदनी चौक) क्या होगा? कोई इंसान आपके केले नहीं चुराएगा। अगर उनको केले चाहिए होंगे तो वे आपसे पूछेंगे कि केलों के क्या दाम हैं? मनुष्य एक नैतिक जीव है क्योंकि उसके पास व्यापार करने का कौशल है (लेना और बदले में देना)। बंदर चोरी करता है क्योंकि वह ली हुई चीज के बदले में कुछ दे नहीं सकता।
अब यह देखने के लिए कि कैसे ताकत भ्रष्ट करती है? बाजार में कुछ देर घूमिये और ध्यान से देखिये कि हम में से बंदर कौन है? आप पुलिसवालों तथा नगरपालिका के लोगों को मुफ्त में सामान लेते हुए देखेंगे - हफ्ता वसूलने वालों का गैंग। यह लूटने-खसोटने वाले लोग हैं जो बाजार में गरीब से गरीब के भी नहीं छोड़ते। यह चोर तंत्र की जीवंत तस्वीर है।

अच्छे आचरण
मानव जाति नैतिक होने के साथ नैतिकता की रीढ़- अच्छे आचरण को भी धारण करती है। ये अच्छे आचरण इसलिए उभर कर आये क्योंकि मानव को बाजार अर्थव्यवस्था में एक-दूसरे से सहयोग की जरूरत है और अच्छे आचरण हमें इसमें मदद करते हैं। अच्छे आचरण ग्रीस (Grease) का कार्य करते हैं, और रोजमर्रा के आर्थिक विनिमय के पहियों को घर्षण रहित (lubricate) करते हैं। ध्यान दीजिए कि दुकानदार कितने मृदुभाषी होते हैं जबकि सरकारी बाबू अनिवार्य रूपेण रूखे।
सरकारी नियंत्रण से रहित एक पूर्णतः मुक्त बाजार में पुरस्कार उन लोगों के पास नहीं जायेंगे - जिनके संबंध हैं या जो बल प्रयोग (दादागीरी) करते हैं, बल्कि उन लोगों के पास जायेंगे जो अपने साथी नागरिकों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कठिन परिश्रम करते हैं और अच्छे आचरण का प्रयोग करते हैं। यही कारण है कि लखनऊ अपनी नफासत और बंगाल भद्रलोक की अपनी छवि के कारण प्रसिद्ध था। पिछले 50 वर्षों से समाजवाद के अस्तित्व से सभी आचारों-व्यवहारों को नष्ट कर दिया है।

प्रतिष्ठा
मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था में नैतिकता सभी लोगों के लिए दीर्घकालिक हितकारी होती है। चोरी और धोखधड़ी में अल्पकालिक रूप से लाभदायक लग सकती है। परंतु यह लंबे समय तक कार्य नहीं करती क्योंकि धोखेबाज और ठग जल्द ही पकड़ में आ जाते हैं और वे अपने ग्राहक गंवा बैठते हैं। इसलिए, मुक्त बाजार में नाम या प्रतिष्ठा का बहुत मुल्य है।
सभी अच्छे ब्रांड (Brand Names) प्रतिष्ठा पर आधारित हैं। अगर आप किसी चलताऊ कंपनी का माल (मान लीजिए, खुला हल्दी पाउडर) घर ले जाते हैं, तो आप पायेंगे कि वह मिलावटी है। दूसरी तरफ अगर एक नामी कंपनी शु्द्ध्ता की गारंटी देती है तो आप अपने रूपये का ठाक मिलने के प्रति निश्चिंत हैं, क्योंकि वह नामी कंपनी एक छोटे से भायदे के लिए अपनी प्रतिष्ठा धूमिल नहीं करेगी।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता, नैतिकता तथा अच्छे आचरण लाती है। दूसरी तरफ ताकत भ्रष्ट (विकृत) करती है। यह अत्यधिक शक्ति या अधिकार ही तो है जिन्होंने चोरतंत्र की रचना कर डाली। इन अधिकारों व शक्तियों को वापस छीनकर जनता को आर्थिक स्वतंत्रता दी जानी चाहिए ताकि हमारा समाज नैतिक हो सके।
मुक्त बाजार के धर्म निरपेक्ष आधार पर आधारित यह नैतिकता, संपत्ति के अधिकारों के प्रति अपनी निष्ठा के साथ हिंदू और मुस्लिमों को एक दूजे के साथ शांतिपूर्वक जीवन में मदद करेगी क्योंकि दोनों धर्म बाजार की नैतिकता पर आधारित हैं।

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साभारः 'उदारवादः राज, समाज और बाजार का नया पाठ'
लेखकः सौविक चक्रवर्ती
अनुवादकः कौशल किशोर